संजय गुप्ता का एक ही फिल्म में दस छोटी कहानियाँ कहने का अंदाज दर्शकों को पसंद नहीं आया और फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया। दर्शकों की इस प्रतिक्रिया से अब निर्माता-निर्देशक शायद ही निकट भविष्य में इस तरह का प्रयास करें। ‘दस कहानियाँ’ को न बड़े शहरों में पसंद किया गया और न ही छोटे शहरों में।
इसी के साथ प्रदर्शित हुई ‘खोया-खोया चाँद’ के हाल तो और बुरे रहे। बॉलीवुड की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में 50 और 60 के दशक का चित्रण किया गया। कहानी कहने का अंदाज बेहद धीमा होने से जिन दर्शकों ने भी यह फिल्म देखी वे बुरी तरह बोर हुए।
यूँ भी शाइनी आहूजा और सोहा अली खान के नाम पर दर्शक महँगे टिकट खरीदना शायद ही पसंद करें। सुधीर मिश्रा की यह फिल्म न कला फिल्म पसंद करने वालों को अच्छी लगी और न ही कमर्शियल फिल्म पसंद करने वालों को।
‘फील द टच’, ‘गरूड़ा’ (डब) और ‘कैरेबियन वीर’ (डब) जैसी फिल्में कुछ शहरों में प्रदर्शित हुईं। इस तरह की फिल्मों से किसी भी किस्म की आशा करना बेकार है।
14 दिसंबर को प्रदर्शित ‘स्ट्रेंजर्स’ के हाल पहले शो से ही बुरे हैं। अधिकांश जगह पहले शो में गिनती के दर्शक उपस्थित थे। हॉलीवुड की फिल्म ‘आई एम लीजेंड’ और इसका हिंदी वर्जन ‘जिंदा हूँ मैं’ भी साथ में प्रदर्शित हुए। इस फिल्म की ओपनिंग भी कमजोर रही। दूसरे सप्ताह में ‘आजा नच ले’ के कलैक्शन में और ज्यादा गिरावट दर्ज हुई। यहीं हाल ‘गोल’ का भी रहा। ‘ओम शांति ओम’ भी अब अधिकांश दर्शकों ने देख ली है।
सारी निगाहें अब आगामी सप्ताह में प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘वेलकम’ और ‘तारे जमीन पर’ टिकी हुई है। इन दोनों फिल्मों का दर्शकों में जबरदस्त क्रेज है और उम्मीद है कि इन फिल्मों को जबरदस्त ‘ओपनिंग’ मिलेगी। शायद वर्ष 2007 जाते-जाते बॉलीवुड के सफल फिल्मों के खाते में कुछ और नाम दर्ज करवा सकता है।
टॉप फाइव फिल्म्स (7 से 14 दिसम्बर 2007) 1) दस कहानियाँ (पहला सप्ताह) 2) आजा नच ले (दूसरा सप्ताह) 3) खोया-खोया चाँद (पहला सप्ताह) 4) ओम शांति ओम (पाँचवाँ सप्ताह) 5) जब वी मेट (सातवाँ सप्ताह)
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