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अनुकूलित राष्ट्रपति की कड़ी में कोविंद

Author अनिल जैन|
हमारे देश में आजादी के बाद से अब तक यही देखा गया है कि राष्ट्रपति चाहे राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला हो या गैरराजनीतिक पृष्ठभूमि वाला- सरकार के साथ उसका रिश्ता कुछ अपवादों को छोड़कर आमतौर पर सामंजस्यपूर्ण ही रहा है। 
 
जो राजनीतिक दल सत्ता में होता है उसकी भी कोशिश यही रहती है कि वह राष्ट्रपति के पद पर ऐसे व्यक्ति को बैठाए, जो हर तरह से उसके अनुकूल हो और किसी भी मामले में संविधान प्रदत्त अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सरकार या प्रधानमंत्री के लिए कोई परेशानी खड़ी न करे। इस लिहाज से देश का नया राष्ट्रपति चुनने के लिए सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ने बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार बनाकर कोई अनोखा या हैरानी वाला काम नहीं किया है, जैसा कि कई विश्लेषक इसे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं।
 
पेशे से वकील रहे रामनाथ कोविंद दलित समुदाय से आते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि राजनीति में उनकी पहचान कभी भी दलित चेतना से युक्त नेता की नहीं रही, जैसी कि मौजूदा दौर में मायावती या रामविलास पासवान की है। राजनीति में 3 दशक से सक्रिय रहने के बावजूद वे जनाधार वाले नेता के रूप में अपने को स्थापित करने में भी नाकाम रहे हैं। उन्होंने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव भी लड़े लेकिन कभी जीत नहीं पाए। संसद में 2 बार पहुंचे लेकिन पिछले दरवाजे यानी राज्यसभा से। 12 वर्षों के दौरान संसद के उच्च सदन में भी उन्होंने कभी अपने होने का अहसास ही नहीं कराया। 
 
मीडिया की नजरों में भी कायदे से वे पार्टी का प्रवक्ता बनाए जाने के बाद ही आए। पिछले लोकसभा चुनाव में वे उत्तरप्रदेश के जालौन संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाने लायक नहीं समझा था। केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ अपने पुराने रिश्तों के चलते वे राज्यपाल बनने में जरूर कामयाब हो गए थे।
 
पूछा जा सकता है कि इतनी साधारण राजनीतिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद आखिर उन्हें किस आधार पर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए मोदी ने चुना होगा? दरअसल, पहले 3 राष्ट्रपतियों डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ. जाकिर हुसैन के बाद आमतौर पर राष्ट्रपति पद के लिए ऐसे व्यक्ति को ही सत्तारुढ़ दल और खासकर प्रधानमंत्री द्वारा तरजीह दी जाने लगी, जो उसके लिए किसी भी तरह से हानिकारक न बन सके और सरकार के हर फैसले को आंखें मूंदकर हरी झंडी दे दे। इसीलिए अपने यहां ज्यादातर राष्ट्रपति 'रबर स्टैंप' ही माने गए। 
 
हालांकि इस सिलसिले में 1997 में संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान 10वें राष्ट्रपति चुने गए केआर नारायणन निश्चित रूप से अपवाद कहे जा सकते हैं जिन्होंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिससे कि उन पर सरकार का 'रबर स्टैंप' होने का ठप्पा लगे। हालांकि इसके चलते तत्कालीन वाजपेयी सरकार के साथ उनके रिश्तों में हल्का-सा तनाव भी आया लेकिन कुल मिलाकर उनका कार्यकाल पूरी तरह विवादों से परे रहा। तो इस प्रकार नारायणन और प्रारंभिक 3 राष्ट्रपतियों के अलावा कमोबेश सभी राष्ट्रपतियों ने सरकार के हर उचित-अनुचित फैसलों पर अपनी मंजूरी की मुहर लगाने का ही काम किया। 
 
इस सिलसिले में 5वें राष्ट्रपति डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद सबसे निकृष्ट उदाहरण माने जा सकते हैं, जिन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधी रात के वक्त नींद से जगाकर देश में आंतरिक आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप लागू करने की अधिसूचना पर दस्तखत कराए थे। ऐसे राष्ट्रपतियों की कड़ी में ज्ञानी जैलसिंह का उल्लेख भी किया जा सकता है जिन्होंने राष्ट्रपति बनने के बाद शर्मनाक बयान देते हुए कहा था- 'मेरी नेता अगर मुझे झाड़ू लगाने का आदेश देती तो मैं वह भी करता लेकिन उन्होंने तो मुझे राष्ट्रपति बना दिया।’
 
केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान 11वें राष्ट्पति के तौर पर अराजनीतिक और संवैधानिक मामलों के निहायत गैर-जानकार एक वैज्ञानिक-नौकरशाह डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का चयन कर जरूर देश को यह संदेश देने की असफल कोशिश की थी कि वह राष्ट्रपति के पद को राजनीति से परे मानती है। 
 
दरअसल, उस समय गुजरात की अभूतपूर्व मुस्लिम विरोधी हिंसा से भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि देश में ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में एक अनुदार और उग्रपंथी राजनीतिक जमात की बन रही थी जिसे धोने के लिए राष्ट्रपति पद के लिए उसे कलाम से बेहतर मुस्लिम चेहरा नहीं मिल सकता था। भाजपा और संघ ने अपने राजनीतिक निहितार्थों के तहत डॉ. कलाम को 'राष्ट्रवादी और देशभक्त मुसलमान’ के रूप में भी खूब प्रचारित किया। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह प्रचार देश के मुसलमानों के प्रति एक तरह की दुर्भावना से प्रेरित था। 
 
डॉ. कलाम निस्संदेह भले व्यक्ति थे और उन्हें राष्ट्रपति बनाकर उनकी इसी भलमनसाहत का तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने भरपूर फायदा भी उठाया। कलाम के खाते में दर्ज विवादित फैसलों में सबसे चर्चित है बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अधिसूचना को मंजूरी देना। इस सिलसिले में संसद के एक संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए उनके द्वारा भारत जैसे विविधता वाले देश के लिए की गई 2 दलीय व्यवस्था की पैरवी भी उल्लेखनीय है।
 
जिस तरह कलाम या डॉ. जाकिर हुसैन के बाद बने सभी राष्ट्रपति अपने-अपने समय की सरकारों के लिए अनुकूलित साबित हुए उसी कड़ी में अब सत्ताधारी दल ने अनुकूलित दलित चेहरे के तौर पर रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है। हालांकि कोविंद को डॉ. कलाम की तरह अराजनीतिक और संवैधानिक मामलों का गैर-जानकार नहीं कहा जा सकता। वे बेशक राजनीतिक व्यक्ति हैं और संवैधानिक मामलों की भी बेहतर समझ रखते हैं। मगर वे अपने राजनीतिक कुनबे की हिन्दुत्ववादी विचारधारा के प्रति पूरी तरह निष्ठावान हैं।
 
भाजपा और संघ में भी उनका शुमार किसी गुट विशेष में नहीं किया जाता है। इस पृष्ठभूमि के चलते जाहिर है कि राष्ट्रपति के रूप में सरकार के लिए वे राजकाज चलाने में तो पूरी तरह अनुकूल रहेंगे ही, साथ ही दलित चेहरे के तौर पर वे आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं। 
 
इस समय देश के विभिन्न हिस्सों खासकर उत्तर भारत में भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं की दलित विरोधी हिंसक गतिविधियों से भाजपा की छवि राजनीतिक तौर पर दलित-विरोधी पार्टी की बन रही है। दलित विरोधी हिंसक घटनाओं की चर्चा अंतरराष्ट्रीय प्रचार माध्यमों में भी हो रही है जिससे विदेशों में भाजपा की ही नहीं, देश की छवि पर भी बट्टा लग रहा है। 
 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए आगामी 2 साल के भीतर लगभग आधा दर्जन राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी पार्टी को इस छवि से मुक्त करना बेहद जरूरी है। इस लिहाज से भी कोविंद दलित चेहरे के रूप में भाजपा और प्रधानमंत्री के लिए बेहद अनुकूल साबित हो सकते हैं।
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