महबूबा की इस अपील का मतलब क्या है...

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती एक ही साथ भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तान से अपील की है कि जम्मू-कश्मीर को जंग का अखाड़ा मत बनाइए। उन्होंने कहा है कि सीमा पर खून की होली चल रही है। महबूबा ने नए पुलिस कांस्‍टेबलों की पासिंग आउट परेड में शिरकत करते हुए ये बातें कहीं। महबूबा ने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश को विकास के रास्ते पर चलना चाहिए, लेकिन हमारे राज्य में इसका ठीक उल्टा हो रहा है।

उन्‍होंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री और पाकिस्तान से अपील करती हूं कि जम्मू और कश्मीर को जंग का अखाड़ा मत बनाइए, दोस्ती का पुल बनाइए। पहली नजर में ऐसा लगता है कि महबूबा मुफ्ती भावुक होकर ऐसी अपील कर रही हैं जिनके पीछे खून-खराबा का अंत और शांति स्थापित करने की मानवीय कामना है। देश का एक-एक व्यक्ति चाहेगा कि जम्मू कश्मीर के अंदर एवं उससे लगी नियंत्रण रेखा एवं अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शांति स्थापित हो। लेकिन क्या यह एकपक्षीय तरीक से संभव है? अगर भारत के चाहने से यह संभव होता तो कब का हो चुका होता। जम्मू कश्मीर के लोग आज शांति और अमन की जिन्दगी जी रहे होते तथा भारत और पाकिस्तान दोस्ती की मिसाल होते। ऐसा नहीं हुआ तो उसमें भारत कहीं भी कारण नहीं है।

यहीं पर महबूबा की अपील पर प्रश्न खड़ा हो जाता है। वो जम्मू कश्मीर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं। इस नाते उनको प्रदेश के अंदर तथा सीमा पर जो कुछ हो रहा है उसका और उसके पीछे की ताकतों के बारे में पूरा सच पता है। बावजूद इसके यदि वो एक ही सांस में भारत के प्रधानमंत्री और पाकिस्तान का नाम लेतीं हैं तो इसे क्या कहा जा सकता है? क्या अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम का उल्लंघन भारत कर रहा है? अगर नहीं तो फिर भारतीय प्रधानमंत्री से अपील
क्यों? यह प्रश्न इसलिए बनता है, क्योंकि 19 जनवरी से बिना किसी उकसावे के जिस तरह पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी हुई है और वह भी रिहायशी इलाके में वर्तमान समस्या उससे पैदा हुई है।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगने वाले पांच जिलों जम्मू, कठुआ, सांबा, पूंछ और राजौरी में पाकिस्तान की गोलीबारी से 11 जानें जा चुकी हैं। इनमें छह नागरिक, तीन सेना के और दो बीएसएफ जवान शामिल हैं। स्वयं जम्मू कश्मीर पुलिस जो महबूबा के अंडर में काम करती है उसका बयान है कि अखनूर से लेकर आरएसपुरा तक पाकिस्तानी रेंजर्स ने बिना किसी कारण के अंधाधुंध गोलाबारी कर भारतीय नागरिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। रिहायशी इलाकों में की गई अंधाधुंध गोलाबारी में कई मवेशी भी मारे गए हैं।

आज हालात यह हैं कि जम्मू कश्मीर पुलिस स्वयं लाउडस्पीकर से लोगों को अपना इलाका छोड़ने की अपील कर रही है। वास्तव में पाकिस्तान की ओर से लगातार गोलाबारी से हालात बिगड़ने के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस ने रेड अलर्ट जारी किया है और सीमावर्ती इलाकों के बाशिंदों से अपने-अपने इलाकों से जाने को कहा है। जम्मू कश्मीर पुलिस ने एक परामर्श में कहा कि प्रशासन ने समूचे इलाके (जम्मू क्षेत्र) में रेड अलर्ट जारी किया है और लोगों को वहां से जाने को कहा है। आज का सच यह है कि जम्मू के सीमावर्ती इलाकों में अनेक गांव सुनसान हो गए हैं। इलाके में लगातार गोलाबारी से बुरी तरह परेशान लोग सुरक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं।

संघर्ष विराम उल्लंघन के चलते सीमावर्ती बस्तियों से करीब 50,000 से अधिक लोगों को पलायन करना पड़ा है। लोगों को उनकी बस्तियों से निकालकर सुरक्षित जगह पहुंचाना भी इस समय एक चुनौती बन गया है। जब रिहायशी इलाकों पर अंधाधुंध गोलीबारी होगी तो फिर लोगों को निकालना स्वाभाविक ही कठिन हो जाता है। पता नहीं किसे कब गोली लग जाए, कहां गोला गिर जाए.....। ऐसा हो भी रहा है। लोग निकलेंगे तो अपना कुछ सामान तथा अपने मवेशियों को लेकर ही जाएंगे। अपने स्थाई वास से किसी के लिए अचानक पलायन करना कितना कठिन हो सकता है इसका अनुमान आप स्वतः लगा सकते हैं, वह भी सीमा पार से हो रही अंधाधुंध गोलीबारी के बीच।

प्रशासन ने जम्मू क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा से लगे इलाकों में 300 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों को बंद कर दिया है। यह नौबत क्यों आई है? साफ है कि समस्या हमारी ओर से है ही नहीं। जो कुछ है वह पाकिस्तान की ओर से है। इसमें यदि महबूबा मुफ्ती एक साथ भारत के प्रधानमंत्री एवं पाकिस्तान का नाम लेती हैं तो उनके इरादे पर संदेह होना स्वाभाविक है। अगर इसकी जगह वो पाकिस्तान को दुत्कारतीं तो देश को अच्छा लगता एवं यह व्यावहारिक भी होता। यदि वो पाकिस्तान को ललकारते हुए कहतीं कि आप इस तरह बिना उकसावे के हमारी ओर गोलीबारी करेंगे तो फिर हमें भी आपको आपकी भाषा में जवाब देने को मजबूर होना पड़ेगा तो उनको पूरे भारत का समर्थन मिलता।

इसके विपरीत महबूबा के बयान से ऐसी ध्वनि निकलती है मानो इसमें भारत भी पाकिस्तान की तरह बराबर का हिस्सेदार है। मोदी विकास की बात अवश्य करते हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि कोई हम पर गोलीबारी करे और हम उसको जवाब में केवल फूल भेजें। भारत ने दोस्ती की भी कोशिश की लेकिन अपने नागरिकों और जवानों की कीमत पर नहीं। क्या महबूबा यह नहीं जानतीं कि पाकिस्तान ने पिछले वर्ष 860 बार युद्धविराम का उल्लंघन किया? यह अपने-आप में एक रिकॉर्ड है। कोई देश इतनी बड़ी संख्या में युद्धविराम का उल्लंघन करे यानी बिना उकसावे के गोलीबारी करे तो फिर उसके साथ दोस्ती का पुल कैसे बन सकता है जिसकी अपील महबूबा कर रहीं हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही दक्षिण एशिया के सारे नेताओं को आमंत्रित कर शुरुआत ही दोस्ती के पैगाम से की थी।

क्या हुआ उसका परिणाम? बिना पूर्व कार्यक्रम के केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जन्म दिवस पर लाहौर चले गए और उनके घर पर बैठकर बातचीत की, उनकी मां के चरण छुए। इससे ज्यादा दोस्ती का पुल बनाने के लिए कोई कर सकता है? लेकिन जवाब में जब उड़ी होगा, पठानकोट होगा, गुरुदासपुर होगा तो दोस्ती का पुल नहीं बन सकता। इससे तो बने बनाए पुल ढह जाएंगे, और वही हुआ है। वास्तव में महबूबा को समझना होगा कि भारत पाकिस्तान प्रेरित और हिंसावाद से पीड़ित होकर मजबूरी में हिंसक जवाब देता है। हमें सर्जिकल स्ट्राइक क्यों करना पड़ा? आप यदि आतंकवादियों को बाजाब्ता प्रशिक्षण देने के लिए शिविर सहित सारी सुविधाएं देंगे..उनको घुसपैठ कराने के लिए गोलीबारी करेंगे और जब तक उनकी घुसपैठ न हो जाए उन्हें आश्रय भी देंगे तो ऐसी कार्रवाई करनी होगी।

यह अपनी रक्षा के लिए हिंसक होना है। पाकिस्तान ने भारत के पास तीन ही विकल्प छोड़े हैं, या तो आप आतंकवादियों एवं उनकी सेना, रेंजर की मार झेलिए या फिर इनका हिंसक प्रतिकार करिए या उनके होने वाले हमले का पूर्वानुमान कर उसे रोकने के लिए कार्रवाई कर दीजिए। इसमें दोस्ती का विकल्प है ही नही। यही भारत कर रहा है। अभी ही भारत ने पाकिस्तानी गोलीबारी का माकूल जवाब दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भारत द्वारा पाकिस्तान के सात जवानों को मार गिराने, अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे पाकिस्तान की चार सीमा चौकियों को तबाह करने तथा वहां की सेना का एक पेट्रोलियम डिपो नष्ट करने की सूचना है।

पाकिस्तान मीडिया में कहा जा रहा है कि भारत की गोलीबारी में अनेक आम नागरिक मारे गए और काफी बड़े इलाके में तबाही हुई। अगर पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आता तो ऐसी कार्रवाई हमें और करनी पड़ेगी। बीएसएफ के महानिदेशक केके शर्मा ने साफ कहा है कि बीएसएफ कभी शुरुआत नहीं करती, लेकिन हमला हो तो जवाब देना हमें आता है। ऐसी स्थिति में महबूबा की यह अपील हर दृष्टि से केवल अस्वीकार्य नहीं है, आपत्तिजनक भी है।

हिंसा और अशांति पैदा करने के मामले में पाकिस्तान एक विकृत मानसिकता वाले खलनायक की तरह है, जिससे आज की स्थिति में दोस्ती का पुल संभव नहीं। जब तक वह कश्मीर में हिंसा पैदा करके उसे भारत से अलग करने की अपनी खतरनाक सोच से बाहर नहीं आता उसके रवैए में परिवर्तन मुश्किल है। महबूबा यह बात अच्छी तरह जानतीं हैं। बावजूद इसके यदि वो इस तरह दोनों देशों को एक ही पलड़े में रखकर अपील कर रही हैं तो फिर उनसे पूछना ही होगा कि मेडम, आपका इरादा क्या है।

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