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हारमोनियम से निकलते हमारे समय के राग-विराग

ब्लॉग चर्चा में इस बार अनिल यादव का हारमोनियम

रवींद्र व्यास|
blog charcha
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एक ब्लॉग है हारमोनियम। इससे समय के सुर निकलते हैं। कम बजता है, लेकिन जब भी बजता है अच्छा बजता है। इसमें समय का राग भी है, विराग भी है। इस राग-विराग में दुःख भी है, सुख भी है। यात्रा भी है और यात्रा के दुःख भी हैं और सुख भी हैं। यात्रा में चीजों को देखने का अंदाज भी अनूठा है। इनमें कहने का ढंग कहानीकार के कहने का ढंग है।

किसी यात्रा को याद करते हुए स्मृतियाँ एक लय में खुलती हैं। इस लय में कुछ चरित्र हैं, कुछ दृश्य हैं और इनमें थरथराती संवेदनाएँ हैं, तंज हैं, कभी-कभी झीना-सा अवसाद भी झलकता रहता है। कुछ पोस्ट पर नजर मारें तो लगता है कोई अच्छी कहानी पढ़ी जा रही है। इसमें एक कहानीकार बैठा है, जो अपनी निगाह में हर छोटी-बड़ी बात को कोई अर्थ देना चाहता है, दे रहा है। कभी- कभी कोई पोस्ट इस तरह लिखी गई है कि आप उसमें से कोई अर्थ निकालें। बस कह दिया गया है।

एक पत्रकार का ब्लॉग है। ब्लॉगर हैं अनिल यादव। वे सचेत, सजग हैं। इतने कि किसी अखबार में छपे एक फोटो के इतनी खूबसूरती के साथ टुकड़े-टुकड़े करते हैं कि हर टुकड़ा एक अर्थ देते हुए कोई बड़ा अर्थ कहता जान पड़ता है। जैसे उनकी एक पोस्ट देखी जा सकती है- सारनाथ की गाजरवाली। वे एक फोटो को देखते हैं, जिसमें सारनाथ में एक यूरोपीय युवती गाजरवाली से गाजर लेकर पैसे नहीं देती और चलती बनती है। गाजरवाली उस पर झूम जाती है कि पैसे दे।

इसे खूबसूरत पकड़ते हैं और देश की मिश्रित पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में हाशिए पर अपनी रोटी-पानी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को केंद्र में लाने की कोशिश करते हैं। वे लिखते हैं- अखबार में छपे फोटो में परम आधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी। कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था, लेकिन गाजरवाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुँही विदेशिन के लिए दो रुपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा, लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है- कुप्पी में डाले गए दो रुपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।

है न मार्मिक टिप्पणी। लेकिन क्या यह सिर्फ एक टिप्पणी है? जाहिर है नहीं। यह इस पत्रकार की वह निगाह है जो उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता को गहरे से रेखांकित करती है। निश्चित ही किसी के लिए भी वह फोटो सिर्फ एक दिलचस्पी जगाता हो, कोई कौतूहल जगाता हो, लेकिन अनिल अपनी सचेत निगाह से उसे एक सामाजिक यथार्थ की परत में बदल देते हैं। इसी पोस्ट में उनकी इस टिप्पणी पर गौर किया जाना चाहिए- यहाँ कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का।

क्या ललमुँही विदेशिन से गुत्थमगुत्था गाजरवाली पर अब भी हँसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झाँसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हँसा जाएगा। वाकई, क्या ऐसा कोई रिश्ता है?

हारमोनियम में एसपी सिंह की पत्रकारिता को लेकर भी दिलचस्प टिप्पणी यहाँ देखी जा सकती है। वे एसपी की पत्रकारिता को याद करते हैं, उनसे अपनी मुलाकात को याद करते हैं और एसपी की गैरहाजिरी का मतलब शीर्षक पोस्ट में वे लिखते हैं कि अगर कोई बदलाव आना है इलेक्ट्रानिक, प्रिंट, इंटरनेट पत्रकारिता में तो पहले उस पूँजी के चरित्र, नीयत और अकीदे में आएगा (क्या वाकई), जिसके बूते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सुगंधित, पौष्टिक बिस्कुट खाने वाला या लोकतंत्र का रखवाला यह कुकुर (वॉच डॉग) पलता है।
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