लोकतंत्र में लोक की चिंता

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नईदुनिया ने यह पहल इसलिए की क्योंकि देश के संसदीय इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना पर जनमानस को प्रतिबिम्बित करना पत्र ने अपनी जिम्मेदारी समझी और चाहा कि आमजन काले रंग के इस उपयोग का सही अर्थ समझें। नईदुनिया इससे पहले भी 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा आपातकाल लगाने की घोषणा का विरोध अपनी तरह से कर चुका है। उस समय पत्र ने अपना संपादकीय स्थान रिक्त छोड़ दिया था।

एक क्षेत्रीय स्तर के समाचार-पत्र ने संसद के इस घटनाक्रम पर अपनी साहसिक पहल कर यह जताने की भी कोशिश की है कि हिंदी के अखबार भी अलग प्रयोग करने की सोच और क्षमता रखते हैं।

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मनमोहन सरकार ने विश्वास मत तो जीत लिया लेकिन मंगलवार को लोकसभा में लोकतंत्र जिस तरह से शर्मसार हुआ उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है। संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र के स्थान पर 'नोटतंत्र' का जो घिनौना रूप देखने को मिला, उसे समूचे देश ने टीवी और अन्य संचार माध्यमों के जरिए देखा। इस मामले को समूची दुनिया के मीडिया में भदेखा।
आप सभी जानते हैं कि इसी क्रम में देश के सभी समाचार-पत्रों में लोकतंत्र के इस क्षरण पर अपनी टिप्पणी दी गई और देश की राजधानी से लगाकर स्थानीय स्तर तक समाचार-पत्रों में अपनी प्रतिक्रिया दी गई।इंदौर से प्रकाशित होने वाले नईदुनिया ने भी इस शर्मनाक स्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने मुखपृष्ठ पर देश के छायाकारों (सांसदों) द्वारा खींची गई तस्वीर प्रकाशित की। यह तस्वीर है एक आयताकार खाली स्थान, जो पूरी तरह से काला है और शायद यह कहता है कि संसद अब खरीद-फरोख्‍त का भी केन्द्र बन गई है।
इसलिए हमने वेबदुनिया पर नईदुनिया की इस पहल पर लोगों के विचार जानने का उपक्रम किया है और हम चाहते हैं कि सभी लोग इस प्रयोग पर अपनी प्रतिक्रिया दें और बताएँ कि वे इस प्रस्तुतिकरण पर क्या सोचते हैं? क्या वे चाहेंगे कि लोकतंत्र में इस तरह की घटनाओं पर इस प्रकार की पहल सार्थक है? तो कलम उठाइए और लिख भेजिए कि समाचार-पत्र के इस प्रयोग से आपको क्या संदेश मिला और आप इस ज्ञान के आलोक में किस तरह का समाचार पत्र देखना चाहते हैं?

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