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रूह के इलाके में ले जाता रहमान का संगीत

ब्लॉग चर्चा में गोल्डन ग्लोब के रहमान की चर्चा

रवींद्र व्यास|
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के मान एआर को अवॉर्ड मिला तो जाहिर है दूसरे दिन तमाम ने तमाम खबरों को दरकिनार कर राग-रहमान गाया और अखबारों के पन्ने उनके कसीदे में पढ़े गए स्तुति गान से भरे पड़े थे। यह हो भी क्यों न?

आखिर रहमान के संगीत ने विश्वव्यापी फलक पर भारतीय संगीत की गूँज पैदा की और उसकी खुशबू ने सबको बावला कर दिया। हिंदी में रोजा फिल्म से लोग उन्हें जानने लगे थे, मानने लगे थे। उस फिल्म के गीत छोटी-सी आशा, आसमान को छूने की आशा ने धूम मचा दी थी। इसके बोल तो मधुर थे ही लेकिन इसे जिस कोमल और प्यारी धुन में बाँधा गया था, वह लाजवाब थी।

इसके बाद रहमान उस राह निकल गए जहाँ रूहें गुनगुनाती हैं और उनकी नशीली और कशिश भरी धुनों में राहगीर अपना रास्ता भूलकर रूहानी इलाके में मगन हो जाते हैं। रोजा के बाद तो कई ऐसी फिल्में हैं जिनमें रहमान ने संगीत देकर न केवल अपनी प्रयोगधर्मिता का चमत्कार दिखाया बल्कि भारतीय संगीत की जड़ों से रस लेकर उसकी भारतीय खुशबू को कायम रखा।

उनके संगीत में दुनिया के कई संगीत की खूबियाँ सुनाई दे सकती हैं लेकिन इसके बावजूद वह कितना ठेठ हमारा ही संगीत है। अब हिंदुस्तान में ही नहीं, उनके दीवाने संसार में हैं। तो फिर ब्लॉग की दुनिया इससे कैसे पीछे रह सकती थी। उनके संगीत के कुछ दीवाने यहाँ भी मौजूद हैं।

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ने इस अवॉर्ड के बहाने के गीत जय हो जय हो पर लिखते हुए कहा है कि - या खुदा। या रहमान। हिंदू होकर मुस्लिम हो गए। मुस्लिम होकर सूफी हो गए। सूफी होकर मस्त मौला। हे मौला। कहाँ से पाया इतना जादू। साजों को बाँधकर डमरू से हाँक देने का फन। गोल्डन ग्लोब मुबारक। रहमान। आज भी थिरकता है मन में कहीं चुपके से। दिल है छोटा सा...छोटी सी आशा।

कहने की जरूरत नहीं इस भाववादी टिप्पणी में रहमान के लिए अथाह प्रेम और श्रद्धा है और उनके सूफियाना अंदाज का नोटिस लिया गया है। इसी तरह हिंदुयुग्म ब्लॉग पर रहमान को करोड़ों भारतीयों का सलाम शीर्षक से पोस्ट लिखी गई है। इसमें कहा गया है कि रहमान नामचीन लोगों के साथ नहीं बल्कि उन लोगों के साथ काम करना चाहते हैं जो रचनात्मक हों। इस पोस्ट में उनके मित्र जी. भरत के साथ उनके किए गए काम को याद किया गया है।

वंदे मातरम् से लेकर माँ तुझे सलाम एलबम की तारीफ की गई है। यही नहीं इस ब्लॉग पर रहमान के बचपन का एक बेहद सुंदर फोटो भी दिया गया है। ख्वाब का दर ब्लॉग पर पंकज पाराशर लिखते हैं कि गोल्ड़न ग्लोब की बात ही कुछ और है। वे यह भी रेखांकित करते हैं कि इसके पहले रहमान को क्रिटिक अवॉर्ड मिल चुका था लेकिन गोल्डन ग्लोब से उनकी प्रतिष्ठा ज्यादा बढ़ी है। कबाड़खाना पर भी गुलजार के गीत का विश्लेषण पढ़ा जा सकता है।
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