ब्लॉग की दुनिया में बीता हुआ साल

इस ब्लॉग चर्चा में कुछ चर्चित ब्लॉगों की चर्चा

WDWD
बीत चुका। जाते-जाते वह एक अधूरी कहानी की तरह कुछ-कुछ खरोंचे, कुछ धोखे, कुछ हादसे छोड़ गया है। वह अपने पीछे अधूरे सपने, अधूरी इच्छाएँ भी छोड़ गया है। वह अपने पीछे उन अधूरी इच्छाओं और अधूरे सपनों को पूरा करने का जज्बा भी छो़ड़ गया है। सपनों को पूरा करने की ताकत भी छोड़ गया है। अपने पीछे कई अच्छी-बुरी स्मृतियाँ छोड़ गया है। इन स्मृतियों की धुंध से गुजरते हुए हम पाते हैं कि यह मनुष्य की ताकत ही है और जिजीविषा ही है कि वह तमाम हादसों-दुर्घटनाओं से मिली खरोंचों-घावों को सहलाता हुआ आने वाली चुनौतियों के लिए अपने को तैयार करता है।

इस बीते में जो कुछ भी हुआ उसे की दुनिया ने किसी भी माध्यम की तुलना में बेहतर ढंग से नोटिस लेने की पूरी कोशिश की है। चाहे बिहार में बाढ़ हो या में आतंकवादी हमला, चाहे विधानसभा चुनाव हों या साम्प्रदायिकता, चाहे फिल्में हों या संगीत, चाहे साहित्य हो या कोई अन्य मुद्दा, तमाम पर इनको बेहतर ढंग से नोटिस लिया गया है। इस बीते साल में ब्लॉग की दुनिया ने यह फिर से साबित किया है कि वह किसी भी माध्यम की तुलना में उतना ही त्वरित, जागरूक, विचारोत्तेजक और इंटरेक्टिव है जितना कोई भी अच्छा माध्यम।

ब्लॉग की खुलती अनंत खिड़कियाँ ये साबित करती हैं कि अब पेशेवर लोग ही नहीं आम लोग भी अपने समय की हलचलों और मुद्दों पर अपने मन की कच्ची-पक्की बातों को कहने के लिए बेचैन हैं और इस ब्लॉग की दुनिया ने उनकी अभिव्यक्ति के लिए बेहतर माध्यम मुहैया कराया है। यह ब्लॉग की ही ताकत है कि आज पत्र-पत्रिकाओं में कई अच्छे ब्लॉगों की बातें हो रही हैं। अच्छे ब्लॉगों की समीक्षाएँ हो रही हैं। साहित्यिक लघुपत्रिका में अविनाश इंटरनेट का मोहल्ला कॉलम में चुने ब्लॉगों पर मासिक टिप्पणी करते हैं और उनकी संतुलित समीक्षा भी करते हैं। कस्बा के रवीश कुमार दैनिक हिन्दुस्तान में अपने साप्ताहिक कॉलम ब्लॉग वार्ता में ब्लॉगों पर लिखते रहे हैं। यह ब्लॉग की ही ताकत है कि अमिताभ बच्चन से लेकर मनोज वाजपेई तक ब्लॉगर बन गए हैं।

यही कारण है कि रोज-ब-रोज नए ब्लॉगर अपने मन की बेचैनी को कई तरह से और कई स्तरों पर अभिव्यक्त कर रहे हैं। इधर जिन नए-पुराने ब्लॉग्स ने अपनी चमक कायम रखी है उनमें अविनाश का मोहल्ला है। इस ब्लॉग पर बिहार की बाढ़ को लेकर बेहतरीन पोस्ट पढ़ने को मिली हैं। फिर साम्प्रदायिकता पर अच्छी-खासी बहसें हुईं और लोगों ने इस पर अच्छे-बुरे कमेंट कर इस बहस को आगे बढ़ाया। कबाड़खाना ने पिछले साल विदेशी कवियों के कई बेहतरीन अनुवाद पढ़वाए। ख्यात अनुवादक अशोक पांडे ने मारिया स्वेतायेवा और अख्मातोवा की कविताओं के बेहतरीन अनुवाद पोस्ट किए जिन्हें खासा सराहा गया।

  ब्लॉग की खुलती अनंत खिड़कियाँ ये साबित करती हैं कि अब पेशेवर लोग ही नहीं आम लोग भी अपने समय की हलचलों और मुद्दों पर अपने मन की कच्ची-पक्की बातों को कहने के लिए बेचैन हैं और इस ब्लॉग की दुनिया ने उनकी अभिव्यक्ति के लिए बेहतर माध्यम मुहैया कराया है।      
इसी तरह अनुराग वत्स के ब्लॉग ने एक सुविचारित पत्रिका के रूप में अपने ब्लॉग को आगे बढ़ाया और उन्हें नए-पुराने साहित्यकारों का खासा सहयोग मिला। इस ब्लॉग ने अपने कुछ अच्छे स्तम्भों के जरिये हिन्दी-गैर हिन्दी और विदेशी साहित्य पर अच्छी पोस्टें पढ़वाईं। इनमें ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कुँवर नारायण पर पाँच नए-पुराने साहित्यकारों की टिप्पणियाँ, हेराल्ड पिंटर और अर्नेस्तो कार्देनाल की मर्लिन मुनरो पर कविताएँ खासतौर पर रेखांकित की जाना चाहिए।

फिर नए कवियों को भी उन्होंने प्रस्तुत किया जिनमें निशांत से लेकर गीत चतुर्वैदी, तुषार धवल जैसे कवि शामिल हैं। इसी तरह युवा कवि और अनुवादक शिरीष कुमार मौर्य ने येहूदा अमीखाई से लेकर नाजिम हिकमत तक की कविताओं के अनुवाद पढ़वाए। अनहद नाद तो पिछले तीन सालों से बेहतरीन कविताएँ पढ़वा रहा है।

कहानीकार गीत चतुर्वेदी के ब्लॉग वैतागवाड़ी ने बेहतरीन पोस्ट से अपनी अलग पहचान बनाई। इसके साथ ही प्रत्यक्षा ने अपने रचनात्मक गद्य से अपने ब्लॉग को पहचान दी। शायदा ने अपने ब्लॉग मातिल्दा में छू लेने वाले गद्य से लोगों को प्रभावित किया।

इधर फिल्मों को लेकर प्रमोद सिंह के ब्लॉग सिलेमा सिलेमा पर सारगर्भित टिप्पणियाँ पढ़ने को मिलीं। उन्होंने हिन्दी के साथ ही यूरोपीय सिनेमा पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ दीं और अच्छे सिनेमा को देखने की इच्छा पैदा की। इसी तरह दिनेश श्रीनेत ने इंडियन बाइस्कोप के जरिये निहायत ही निजी कोनों से और भावपूर्ण अंदाज से सिनेमा को देखने की एक बेहतर कोशिश की। महेन के चित्रपट ब्लॉग पर सिनेमा को लेकर अच्छी सामग्री पढ़ने को मिल रही है।

जहाँ तक राजनीति को लेकर ब्लॉग का सवाल है तो अफलातून के ब्लॉग समाजवादी जनपरिषद, नसीरुद्दीन के ढाई आखर, अनिल रघुराज के एक हिन्दुस्तानी की डायरी, अनिल यादव के हारमोनियम, प्रमोदसिंह के अजदक और हाशिया का जिक्र किया जाना चाहिए।

रवींद्र व्यास|
संगीत को लेकर टूटी हुई, बिखरी हुई आवाज, सुरपेटी, श्रोता बिरादरी, कबाड़खाना, ठुमरी, पारूल चाँद पुखराज का जिक्र होना चाहिए जहाँ सुगम संगीत से लेकर क्लासिकल संगीत को सुना जा सकता है। रंजना भाटिया का अमृता प्रीतम को समर्पित ब्लॉग ने भी ध्यान खींचा है। जहाँ तक खेल का सवाल है, एनपी सिंह का ब्लॉग खेल जिंदगी है सबसे अच्छा ब्लॉग है। इधर वास्तु, ज्योतिष, फोटोग्राफी जैसे विषयों पर भी ब्लॉग शुरू हुए हैं और आशा की जाना चाहिए कि ब्लॉग की दुनिया में 2009 ज्यादा तेवर और तैयारी के साथ सामने आएगा।

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