आँख गीली किए बगैर कुछ शब्द

अफजल साहब की याद में

देवास की टेकरी पर चढ़ते-चढ़ते आप अपोलो पर कहाँ चढ़ गए? क्या, चाँद पर जाकर लैण्डस्केप करने की तैयारी कर रहे हैं? उधर दूसरे छोर पर वे हँसे। हँसी हमेशा की तरह 'सहजता' से ही शुरू हुई, लेकिन उसका आखिरी छोर फूलती साँस में उलझ गया
मुझे आवाज की शिनाख्त में हस्ब-मामूल-सा वक्त लगा। साफ हो गया, आवाज अफजल साहब की है। फोन पर उनकी आवाज हमेशा से ही ऐसी लगती थी, जैसे तेजी से किसी दिशा में जाते हुए, बीच में एकाएक कहीं से फोन उठाकर, उन्होंने मेरा नंबर लगा दिया है। लेकिन, सहसा ध्यान गया कि वह 'लाँग-रिंग' नहीं थी। अतः निश्चय ही वे देवास से नहीं बोल रहे हैं। मैंने प्रतिप्रश्न किया- 'कहाँ से बोल रहे हैं, आप?' 'अपोलो से।' उधर से उन्होंने कहा।

देवास की टेकरी पर चढ़ते-चढ़ते आप अपोलो पर कहाँ चढ़ गए? क्या, चाँद पर जाकर लैण्डस्केप करने की तैयारी कर रहे हैं? बतरस को बढ़ाने की इच्छा से मैंने उनसे आदतन विनोद किया। उधर दूसरे छोर पर वे हँसे। हँसी हमेशा की तरह 'सहजता' से ही शुरू हुई, लेकिन उसका आखिरी छोर फूलती साँस में उलझ गया। हँसी बीच रास्ते में लुढ़ककर गिर गई।

बाद इसके, साँस को जैसे वे यत्नपूर्वक संभाल कर बोले- 'मैं यहाँ अपोलो 'अस्पताल' में हूँ, भई। पर, चिंता की कोई बात नहीं है, अभी। तुम धूप में भटकते मत आना, तुम पहले ही दुबले-पतले और नाजुक हो। क्वाँर की धूप है, यार। बीमार कर देगी। इत्मीनान से आना। इकट्ठा। निरात से।

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मैं संशय से घिर आया। मुझे लगा, साँस की आवाज़ के पीछे छुपी भाषा कह रही है कि अब 'निरात' से पहुँचने का वक्त बकाया नहीं है, क्योंकि कुछ साल पहले उन्हें 'पक्षाघात' ने लगभग दबोच ही लिया था, लेकिन, तुरन्त उपचार मिल जाने के कारण सिर्फ चेहरे के दाईं ओर थोड़ा 'असर' आ गया था, जिसके चलते तेज रोशनी में उनकी उस तरफ की आँख चुँधियाने लगती थी। जैसे, वे दाईं पलक को मूँदना चाहते हों।

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- प्रभु जोशी सुबह घर से दफ्तर के लिए निकल ही रहा था कि फोन की घंटी एकाएक बजी। एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ मैंने रिसीवर उठाकर कान से लगाया तो दूसरे छोर से प्रश्न आया 'क्या कर रहे हो, तुम?'
प्रश्न ऐसे बेसाख्ता और इत्मीनान के साथ पूछा गया था, सीधा-सीधा गालिबन फोन करने वाले के लिए, 'इधर फोन उठा रहे आदमी' को अपना नाम इत्यादि बताने की कोई दरक़ार या जरूरत नहीं है। फूलते फेफड़े की हाँफती-सी आवाज थी, जैसे कई सारी सीढ़ियाँ एक ही साँस में तय करके आखिरी सीढ़ी पर पहुँचकर बोला गया हो। बोलते हुए पूरे वाक्य में, एक साँस से दूसरी साँस लेने के बीच, बार-बार खाली जगह छूट जाती थी।
मैं लगे हाथ घर से निकलकर बाहर आ गया। बाहर अक्टूबर की वही चमकीली धूप थी, जिसमें मैंने अफजल साहब को घंटों खड़े-खड़े देवास की गलियों, चौराहों और शिकस्ता मकानों वाली बस्तियों के लैण्डस्केप्स करते देखा था। पिछले सालों से लगातार उनसे मैं आग्रह करता आ रहा था 'मैं आप पर दूरदर्शन के लिए एक फिल्म बनाना चाहता हूँ।' लेकिन, वे कहते थे 'अक्टूबर में शूटिंग करना। मैं देवास को धूप में पेंट करूँगा और तुम उसको शूट करना। तब लगेगा, आर्टिस्ट एट वर्क।'

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