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माँ की यादों के सघन रेशमी आँचल में

इस बार 'शेष है अवशेष' ब्लॉग की चर्चा

रवींद्र व्यास|
<a class="storyTags" href="/search?cx=015955889424990834868:ptvgsjrogw0&cof=FORID:9&ie=UTF-8&sa=search&siteurl=http://hindi.webdunia.com&q=%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%89%E0%A4%97" target="_blank">ब्लॉग </a>चर्चा
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ब्लॉग की दुनिया में अनुराग अन्वेषी का ब्लॉग 'शेष है अवशेष' एक अलहदा ब्लॉग है। और यह ब्लॉग भूलने के विरुद्ध है। यह ब्लॉग याद रखने का है। इस ब्लॉग पर अनुराग अपनी माँ को याद करते हैं। बार-बार याद करते हैं। कई तरह से याद करते हैं। जीवन की धूप-छाँव में याद रखते हैं। यहाँ वे अपनी माँ को उन दिनों में ज्यादा याद रखते हैं जब वे एक जानलेवा बीमारी से जूझ रही थीं। ये यादें आशा-निराशा के बीच किसी-किसी लहरों की तरह आती-जाती आपको भी भिगो जाती हैं।

माँ की ये यादें वे बंद खिड़कियाँ खोल देती हैं जहाँ से हवाएँ, धूप, खुशबू सब माँ की दुनिया से होकर आपके कमरे तक आ जाती हैं। इनके साथ वे धूसर रंग और धीरे-धीरे गहरा होता अँधेरा भी आकर किसी कोने में बैठ जाता है जिसमें बेहद पीड़ादायक यादें अपनी आँखें खोलकर हमें देखने लगती हैं। यह ब्लॉग अनुराग ने अपनी स्वर्गीय माँ श्रीमती शैलप्रिया के रचनाकर्म और उनकी स्मृतियों पर एकाग्र किया है लेकिन इसकी खूबी यह है कि इस पर अनुराग के भाई और बहन ने भी अपनी तरह से अपनी माँ को याद किया। अनुराग के पिता श्री विद्याभूषणजी ने भी अपनी जीवन संगिनी के संस्मरण दर्ज किए हैं।

वस्तुतः इस ब्लॉग को पढ़ना दुनिया के उस रिश्ते के महीन रेशों को समझना-बूझना और महसूसना है जो माँ-बेटे का रिश्ता होता है। अनुराग के इस ब्लॉग को पढ़ना इस बात पर फिर से भरोसा कर लेना है कि इस सब कुछ भुला दिए जाने वाले संसार में अभी भी सब कुछ याद कर लिया जाना भी शेष है। सब कुछ खत्म हो जाने के बावजूद माँ के जरिये, माँ की यादों के जरिये सब कुछ बचा लिया जाना भी बचा रहेगा।

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माँ से जुड़ी हर छोटी-बड़ी यादों को बचा लिया जाना एक मूल्य को भी बचा लिया जाना है। एक रिश्ते के त्याग और तपस्या को ऊँचा स्थान देना या कि माँ की कविताएँ पोस्ट कर माँ के रचनाकर्म को सम्मान देना है। इस ब्लॉग के पीछे जो भाव और श्रद्धा छिपी है वह बताती है कि अपनी माँ को किस तरह से बेटे-बेटी याद करते हैं और उन यादों को अपनी मन-मंजूषा में सँजोए हुए हैं।

अनुराग अपनी एक पोस्ट में लिखते हैं कि - शायद कुछ और लिखने के इरादे से यह लेख शुरू किया था, मगर कुछ और लिखता चला गया। माँ तक पहुँचने की कोशिश कई बार की, मगर हर बार डर गया। उसके आसपास से, अगल-बगल से निकल गया।

क्या ऐसा ही होता है? जिसे हम जानते हैं, उसके बारे में बताना मुश्किल होता है। क्योंकि जानना शायद शब्दों से परे की क्रिया है। या मन के कई दरवाजे ऐसे होते हैं, जिनकी कुंजी शब्दों के पास भी नहीं होती। शब्द दस्तक देते हैं, और लौट आते हैं।

माँ.. बस... माँ... है। इससे ज्यादा बताना मेरे लिए मुमकिन नहीं! और वे अपने पराग भइया (प्रियदर्शन) के संस्मरण भी पोस्ट करते हैं। एक पोस्ट में प्रियदर्शन ने अपनी माँ पर मार्मिक संस्मरण लिखे हैं।
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