एक जरूरी कोना-किताबी कोना

इस बार ब्लॉग चर्चा में हिन्दी किताबों का ब्लॉग

WD
एक ऐसे ब्लॉग पर क्यों लिखा जाए जिस पर सवा चार महीनों से कोई नई पोस्ट नहीं है, लेकिन हिन्दी का सबसे सम्माननीय और बड़ा पोर्टल होने के नाते वेबदुनिया और एक पुस्तक प्रेमी होने के नाते मैं इस पर एक जिम्मेदारी की तरह लिखना चाहता हूँ। इसलिए कि हिन्दी समाज के लिए यह एक जरूरी ब्लॉग है

एक ऐसे समय में जब हमारा ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास बारह सौ रुपए के जूते खरीदने के लिए एक पल नहीं गँवाता और ढाई सौ रुपए की किताब खरीदने के लिए जिसकी पेशानी पर बल आ जाते हों तब यह एक प्यारा-प्यासा कोना हमारे लिए किताबों पर कुछ पुस्तक प्रेमियों को इकट्ठा कर किताबों पर बातें करता है। यहाँ आलोचना या समीक्षा का कोई पेशेवराना अंदाज नहीं है बल्कि किताबों पर अपने मन की सहज-सरल बातें हैं। किताबीलाल का यह ब्लॉग है किताबी कोना।

हिन्दी किताबों का यह कोना कहता है कि आजादी के बाद की प्रकाशित चर्चित, दिलचस्प किताबें... जो सामाजिक-दुर्भाग्य से अब विलुप्तप्राय हैं- उन्हें सहेजने-सँजोने, याद करने का एक छोटा-सा प्रयास है।
  एक ऐसे ब्लॉग पर क्यों लिखा जाए जिस पर सवा चार महीनों से कोई नई पोस्ट नहीं है, लेकिन हिन्दी का सबसे सम्माननीय और बड़ा पोर्टल होने के नाते वेबदुनिया और एक पुस्तक प्रेमी होने के नाते मैं इस पर एक जिम्मेदारी की तरह लिखना चाहता हूँ।      


इस प्रयास की खूब तारीफ की जाना चाहिए लेकिन किताबीलाल के इस कोने के नौ तोपची हैं फिर भी कुछ अच्छी पोस्ट होने के बावजूद यहाँ सन्नाटा पसरा है। हिन्दी का संसार फैला-पनपा है। समकालीन हिन्दी साहित्य में एक साथ जितनी पीढ़ियाँ सक्रिय हैं, यह शायद अभूतपूर्व है। पुरानी किताबों के नए संस्करणों के साथ कई विधाओं में नई किताबें खूब छप रही हैं। बावजूद इसके यहाँ पसरे सन्नाटे का क्या अर्थ लगाया जा सकता है? इसका तीखा अहसास किताबीलाल को है।

इसीलिए उन्होंने लिखा है कि इस ब्लॉग में अपनी आखिरी पोस्ट (http://kitabikona.blogspot.com/2008/04/blog-post.html) पर आई एक प्रतिक्रिया के जवाब मेभैया चंद्रभूषण ने ज़रा झल्लाई आवाज़ में हिन्दकिताबी कोने की दिनोंदिन बेहाल होते हाल की शिकायत दर्ज़ करवाई थी... और ग़लत नहीकरवाई थी... इन गुज़रे चंद महीनों में अपने किताबी कोने की स्थिति कमोबेश वैसी हहो चली है जैसे छोटे शहरों में (या कहें, अब तो हर जगह?) हिन्दी किताबों की दुकान पउपलब्ध साहित्यिक दोने में जैसे सुख कम, टोटके और टोने ज़्यादा मिलते हैं ...तो कुउसी अंदाज़ में बीच-बीच में हम कुछ टोने-टोटकों से किताबी कोने को जियाए हुए हैं... इस तरह किताबी कोना जीता रहेगा, मगर कुछ उसी तरह जीता रहेगा जैसे बहुत सारराष्ट्रीयकृत बैंकों की सालाना हिन्दी पत्रिकाएँ जीती रहती होंगी?...

रवींद्र व्यास|
बावजूद इस पोस्ट का सन्नाटा बरकरार है। यहाँ पोस्ट किए गए कमेंट्स भी बताते हैं कि इसे नियमित होना चाहिए। ब्लॉग चर्चा में इस ब्लॉग को शामिल करने का हमारा मकसद भी यही है कुछ दबाव हम भी बनाएँ ताकि इस ब्लॉग पर कुछ हलचल हो। खैर। इस ब्लॉग पर आपको किताबों पर बातें तो मिलेंगी ही लेकिन कुछ अधिक आत्मीय ढंग से। ये बातें एक सहृदय पाठक की बातें हैं।

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