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आग तो लोगों के दिलों में भी धधक रही है

हमले की घटना पर विभिन्न ब्लॉगरों के विचार

रवींद्र व्यास|
WDWD
जल रहा है। कई लोग मारे गए हैं, कई घायल होकर चीख रहे हैं। उनके जख्मों की मरहम-पट्टी हो रही है। पुलिस के बाद अब हमारे जाँबाज सैनिक आतंकवादियों से जूझ रहे हैं। यह आग देर-सवेर बुझा दी जाएगी लेकिन इस हमले को लेकर देशवासियों के दिलों में जो आग धधक रही है वह शायद आसानी से ठंडी नहीं होगी।

उनमें जबर्दस्त गुस्सा है। आतंकवादी हमले से पूरा देश व्यथित है। गुस्साए लोग हर तेवर और भाषा में अपना यह गुस्सा व्यक्त कर रहे हैं। इस गुस्से में उनका दुःख तो शामिल ही है, उन परिवारों का दुःख भी शामिल है जो इस हमले में मारे गए हैं।

इनमें उनका वह गुस्सा भी शामिल है जो देश की राजनीति और नेताओं पर बरस रहा है लेकिन यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता इस पर भी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। निश्चित ही यह हमला मुंबई पर ही नहीं, ताज और ओबेराय पर ही नहीं, देश के स्वाभिमान पर भी हुआ है।

जिस तरह से मीडिया में इस हमले की तमाम कोणों से रिपोर्ट की जा रही है और भिन्न-भिन्न नजरिए से इसका विश्लेषण किया जा रहा है ठीक उसी स्तर पर इंटरनेट व ब्लॉग की दुनिया में भी उसी तेवर के साथ गुस्सा जाहिर किया जा रहा है।

इसका निशाना एक तरफ हमारे राजनेता हैं तो दूसरी तरफ और पाकिस्तान भी हैं। इसमें शिवराज पाटिल पर सबसे ज्यादा गुस्सा है जो हमले होने के कई घंटों बाद मुंबई पहुँचे। उन्हें इस हमले में लोगों के उड़े चीथड़ों ने कतई परेशान नहीं किया, वे तो परेशान रहे कि मुंबई जाते हुए अपने सूटकेस में कौन-सा सफारी सूट रखें, जो उन पर फबे।

गुस्सा राज ठाकरे पर भी है जो आमची मुंबई के अपने प्रेम की बदौलत हाल ही में सुर्खियों में थे और उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपने ही देशवासियों पर हमले किए थे। लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मनमोहनसिंह तक अपने-अपने बयानों से अपनी-अपनी राजनीति का ढोल बजा रहे हैं।
  जिस तरह से मीडिया में इस हमले की तमाम कोणों से रिपोर्ट की जा रही है और भिन्न-भिन्न नजरिए से इसका विश्लेषण किया जा रहा है ठीक उसी स्तर पर इंटरनेट व ब्लॉग की दुनिया में भी उसी तेवर के साथ गुस्सा जाहिर किया जा रहा है।      
इस पूरे परिदृश्य को लेकर इंटरनेट की दुनिया में भी आग उगली जा रही है।

शिवराज पाटिल का अंतिम कलंक शीर्षक पोस्ट में वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर कहते हैं- अभी कुछ दिन पहले शिवराज पाटिल ने बयान दिया था कि आतंकवादी घटनाएँ इतनी नहीं हो रही जितनी का प्रचार किया जा रहा है।

उन्होंने अपने अफसरों से मेहनत करवाकर एनडीए सरकार के दौरान के आँकड़े निकलवाए थे और इन्हें पेश करते हुए कहा था कि देश में जितने लोग आतंकवादी हिंसा में एनडीए के शासन में मारे गए हैं, उनकी तुलना में यूपीए सरकार के दौरान कम मौतें हुई हैं।

इंसान की जिंदगी को चिल्लर की तरह गिनने वाले अपने देश के गृहमंत्री पर हमें पता नहीं अब भी शर्म क्यों नहीं आती? शिवराज पाटिल देश की सुरक्षा और गुप्तचर एजेंसियों के भी जिम्मेदार हैं और जिस तरह का हमला मुंबई में हुआ है उसकी तैयारी एक-दो दिन में या एक-दो सप्ताह में भी नहीं हो सकती।

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इतनी तैयारी से हुए हमले का पता भी अगर भारत की गुप्तचर एजेंसियाँ नहीं लगा सकीं और उन्हें पता तो छोड़िए, अंदाजा तक नहीं लगा तो शिवराज पाटिल को लाल बत्ती की गाड़ी में बैठने और उसमें तिरंगा झंडा फहराने का कोई हक नहीं हैं। जिसको तिरंगे से ज्यादा अपने सफारी सूट की परवाह हो, वह सफारी सूट पहनकर रिटायर क्यों नहीं हो जाता?

शिवराज पाटिल पर ये भी गुस्सा उतारते हैं। हितचिंतक में संजीव कुमार सिन्हा लिखते हैं- भारत के नालायक गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने देशवासियों का जीना हराम कर दिया है। उनके हाथ निर्दोष लोगों के खून से लाल हो गए हैं। स्वाभिमानी भारत में उन्होंने भय और दहशत का माहौल कायम कर दिया है।

इसी तरह राज ठाकरे पर भी गुस्सा उतारा गया है। लूज शंटिंग की ब्लॉगर दीप्ति इस मौके पर राज ठाकरे को आड़े हाथों लेती हुई सवाल करती हैं कि आखिर कहाँ है राज ठाकरे मुंबई तो उनकी है तो वो क्यों नहीं आ रहे हैं आगे गोलियाँ खाने के लिए, उन आतंकियों को मारने के लिए। कहाँ गए वो लोग जो मुंबई में भैया लोगों को घुसने नहीं देना चाहते हैं। आतंकी क्या उन्हें मंजूर है मुंबई में... इस विवाद में भैयाओं को मारने वाले कुछ-कुछ ऐसे ही हैं जैसे गली-मोहल्ले में कुछ टुटपुन्जिया-से गुंडे होते है। जो लड़की को छेड़ते तो हैं लेकिन, जैसे ही वो पलटकर देखती है डर के मारे भाग जाते हैं...
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