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बड़े बेआबरू होकर 'घर' से हम निकले...

Author नरेन्द्र भाले|
क्या बात... क्या बात...क्या बात... इसे कहते हैं मोरी में नाक रगड़ना। जबसे T-20 वर्ल्ड कप की बात हो रही थी, टीम इंडिया सबसे सशक्त मानी जा रही थी, लेकिन उसके नि:सशक्त प्रदर्शन ने जामठा में अरमानों पर मावठा गिरा दिया। कोई लिख रहा था कि सबसे ज्यादा संतुलित टीम है, एक से लेकर सात तक बैटिंग में लाठीचार्ज है। घरु विकेट पर स्पिन की गोली बेहद असरकारक होगी। क्षेत्ररक्षण में चीतों की फौज है। और न जाने क्या-क्या...। बेहद कांटापकड़ मुकाबला होगा लेकिन जब पिक्चर खत्म हो गई तो ऐसा लगा कि हम टीम इंडिया के उठावने में शामिल होकर सारे दिग्गज मुंह लटका कर घर पहुंचे हैं।
इसमें संदेह ही नहीं है कि अश्विन को छोड़कर तमाम गेंदबाजों ने किवी बल्लेबाजों को दाना चुगने ही नहीं दिया और अंत में स्कोर बोर्ड 126 का मातमी चेहरा लिए लटका हुआ था लेकिन जहां सवाल लक्ष्य का पीछा करने का आया, टीम इंडिया के सारे सूरमा देखते ही देखते चूरमा हो गए।
 
जिस देश ने तमाम क्रिकेट बिरादरी को स्पिन का जादू सिखाया, उसी की चिड़ियाघर के शेर म्याऊं करने लगे और डेंडू तथा केंचुए को अजगर समझकर आत्मसमर्पण कर बैठे। इस मैच के पूर्व मैंने कभी मिशेल सेंटनर का नाम भी नहीं सुना था, उसने अंतिम क्षणों की लप्पेबाजी के पश्चात रोहित शर्मा, सुरेश रैना, महेन्द्रसिंह धोनी तथा हार्दिक पांड्या को इस अंदाज में निपटा दिया, मानों स्पिनर नहीं जमाल घोटा हो। दूसरे छोर से ईश सोढ़ी ने भी बटके भर के कागजी शेरों की नाक में दम कर दिया।
वास्तव में इस टीम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें हमने न कभी पढ़ा, न सुना लेकिन इनमें जो लड़ाकू जज्बा है, उसकी कोई जोड़ नहीं है। आज भले ही सेक्सी बल्लेबाज बैंडम मैक्कुलम टीम में नहीं हैं, लेकिन उनके तेवरों ने आक्रमण की जो बेल उगाई है, यह उसी का नतीजा है कि कल के लड़के भी तथाकथित सूरमाओं को लोहे के चने चबवा रहे हैं।
 
कप्तान तो इतना सहज, सरल और मासूम है कि उसके क्या कहने! कहने को तो विलियम्सन हैं लेकिन उसके केन की हरकत उसे खूंखार बना देती है। वाकई लाजवाब प्रदर्शन किया न्यूजीलैंड ने, तमाम क्रिकेट पंडितों के साथ-साथ धोनी की सेना को उसकी औकात दिखा दी। अब तो आप भी समझ सकते हैं कि आगाज ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा? 
 
अभी तो खतरे के रूप में पाकिस्तान तथा कगारू आगे खड़े हैं। एक और पराजय और बोरिया-बिस्तर गोल। अब आगे आने वाला हर मैच 'करो या मरो...'! करोगे नहीं तो मरना निश्चित है। अच्छा हुआ सारे मुगालते पहले ही मैच में साफ हो गए। डार्क हॉर्स कुछ नहीं होता, केवल प्रदर्शन ही मायने रखता है। सच तो यही है कि..
यह इश्क नहीं आसां...
बस यह काम है दीवानों का...
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है...
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