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    <title><![CDATA[सामयिक]]></title>
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    <description><![CDATA[Get latest Views and Analysis of all the Current Affairs, International Affairs, Political News, Political News India and many more in Hindi. सामयिक विषय, सामयिक वार्ता, विचार विमर्श, सामयिक लेख, सामयिक घटनाक्रम.]]></description>
    <copyright>Copyright webdunia.com</copyright>
    <lastBuildDate>Tue, 09 Jun 2026 13:10:06 +0530</lastBuildDate>
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      <title>सामयिक</title>
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      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में मदरसों का सर्वेक्षण क्यों करा रही है सरकार?]]></title>
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      <description><![CDATA[पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="madarsa survey" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/09/full/1780987395-6023.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="photo : DW/Subho Singha" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>प्रभाकर मणि तिवारी</strong></p>
<p>
	पहली बार राज्य की सत्ता संभालने के एक महीने के भीतर ही सरकार के इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों का सवाल है कि क्या बंगाल सरकार भी पड़ोसी असम की हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की तर्ज पर अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है। असम के मुख्यमंत्री पर लगातार विभिन्न फैसलों के जरिए अल्पसंख्यकों पर निशाना साधने के आरोप लगते रहे हैं। इससे पहले सरकार ने यहां तमाम मदरसों में &#39;वंदे मातरम&#39; का गायन अनिवार्य कर दिया था। बीजेपी पंद्रह साल तक सत्ता में रही ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप लगाती रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राज्य में फिलहाल वेस्ट बंगाल बोर्ड आफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता और सहायता-प्राप्त मदरसे हैं। इसके अलावा गैर-मान्यताप्राप्त और निजी संगठनों की ओर से या जकात से चलाए जाने वाले मदरसों की संख्या दो हजार से ज्यादा है। लेकिन इन तमाम मदरसों में सर्वेक्षण का आदेश दिया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या होगा मदरसों के सर्वे में</h3>
<p>
	सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तमाम जिला शासकों को सर्वेक्षण के निर्देश भेज दिए गए हैं। उनको पांच जुलाई तक इसकी रिपोर्ट सौंपनी है। इसके तहत मदरसों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की संख्या के अलावा उनको पढ़ाने वाले शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आधारभूत ढांचा और आर्थिक स्रोत का ब्योरा हासिल किया जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि सरकार ने अवैध मदरसों को बंद कर वहां पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या अनुमोदित मदरसों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	मंत्री ने डीडब्ल्यू को बताया, "सर्वेक्षण रिपोर्ट के बाद राज्य में चलने वाले तमाम गैर-अनुमोदित या अवैध मदरसों को बंद कर दिया जाएगा। शिक्षा के नाम पर अवैध गतिविधियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। सरकार मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को आधुनिक शिक्षा मुहैया कराना चाहती है ताकि आगे चल कर रोजगार की दौड़ में वो पिछड़े नहीं रहें।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल के वर्षों में राज्य के विभिन्न इलाकों में तेजी से बढ़ते मदरसों पर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। कई बार वहां आतंकवादियों को शरण देने के भी आरोप लगे हैं। इनमें से ज्यादातर मदरसे जकात से चलते हैं। अब अल्पसंख्यक संगठनों को डर है कि यह सर्वेक्षण उनको निशाना बनाने के मकसद से ही शुरू किया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले के एक मदरसे में पढ़ाने वाले मोहम्मद हफीज (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार जकात से चलने वाले मदरसों में तमाम कमियां निकाल कर उनको किसी तरह बंद करने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन हम इसका विरोध करेंगे। इसके लिए कानून की मदद ली जाएगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन मंत्री खुदीराम टुडू कहते हैं, "यह किसी धर्म पर हमला नहीं है। नियमों के मुताबिक चलने वाले मदरसों को सरकार आर्थिक सहायता देगी। वहां शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधारभूत सुविधाएं बेहतर बनाने की योजनाएं लागू की जाएंगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बीजेपी सरकार ने बीते महीने एक आदेश जारी कर तमाम मदरसों और सरकारी स्कूलों में सुबह वंदे मातरम का गायन अनिवार्य कर दिया था। इस आदेश को लागू करने के लिए तमाम मदरसा प्रमुखों को सुबह-सुबह वीडियो बनाकर अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। इस पर अल्पसंख्यक संगठनों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। एक संगठन ने इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है। तृणमूल कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इसे मनमाना फैसला बताते हुए कहा है कि किसी भी धर्म में हस्तक्षेप उचित नहीं है। इससे राज्य का सामाजिक ताना-बाना प्रभावित हो सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन राज्य के अल्पसंख्यक और मदरसा शिक्षा मंत्री खुदीराम टुडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, "जब सरकारी स्कूलों में वंदे मातरम का गायन अनिवार्य हो सकता है तो मदरसों को इससे अलग क्यों रखा जाएगा? सरकार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के आरोप निराधार हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	विरोध किस बात पर हो रहा है</h3>
<p>
	कई अल्पसंख्यक संगठनों और विपक्षी दलों ने सरकार के ताजा फैसले पर विरोध जताया है। कोलकाता खिलाफत कमेटी के प्रमुख मोहम्मद अशरफ डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार को किसी धर्म पर कोई चीज नहीं थोपनी चाहिए। हम वंदे मातरम के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन इस गीत को गाना हमारे धर्म के खिलाफ है। सरकार को यह फैसला वापस ले लेना चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सरकार ऐसे फैसलों के जरिए मूल समस्याओं की ओर से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है। वंदे मातरम को अनिवार्य करने और मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले से साफ है कि सरकार अल्पसंख्यक तबके को निशाना बनाने की नीति पर आगे बढ़ रही है। स्कूलों में वंदे मारम गाने भर से शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी। इसके लिए मूल समस्याओं को दूर करना जरूरी है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि बंगाल की सत्ता में आने के बाद बीजेपी अपने हिंदुत्व को एजेंडे को आगे बढ़ाने में जुट गई है। सरकार के हाल के फैसले इसका सबूत हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विपक्षी नेताओं का कहना है कि जो मदरसे निजी संस्थाओं की ओर से चल रहे हैं उनमें हस्तक्षेप का सरकार को कोई अधिकार नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तृणमूल कांग्रेस के पूर्व विधायक और आम जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी सरकार ने सत्ता में आते ही इन फैसलों के जरिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है। मुसलमानों पर कोई फैसला थोपना गलत है। यह हमारी धार्मिक मान्यता का सवाल है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीजेपी असम की तरह यहां भी अल्पसंख्यकों पर निशाना साध रही है। उसे शायद इस बात की खुन्नस है कि ये लोग अब तक तृणमूल कांग्रेस का समर्थन क्यों करते रहे हैं। लेकिन सरकार को किसी तबके के खिलाफ बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य सरकार के फैसले को सही ठहराते हैं। वो डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इसमें गलत क्या है? वंदे मातरम को धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसका हिंदू-मुस्लिम से कोई संबंध नहीं है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बीजेपी ने मदरसों के सर्वेक्षण के फैसले को भी सही ठहराया है। भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार ने मदरसों की मौजूदी स्थिति का पता लगाने के लिए ही सर्वेक्षण का आदेश दिया है। राज्य के कई मदरसों पर पहले सीमा पार के आतंकवादियों को पनाह देने के आरोप लगते रहे हैं। इस सर्वेक्षण का मकसद जमीनी हकीकत का पता लगाना है। सर्वेक्षण की रिपोर्ट के बाद आगे की रणनीति तय करने में मदद मिलेगी।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिक्षाविदों में सरकार की मंशा पर संदेह है। कोलकाता के एक कॉलेज में प्रोफेसर रहे दिलीप कुमार बाग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "कागज पर तो सरकार की मंशा सही लगती है। लेकिन सत्ता में आने के फौरन बाद मदरसों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई से संदेह स्वाभाविक है। इससे खासकर अल्पसंख्यक संगठनों में डर का माहौल है। उनको लगता है कि सर्वेक्षण के बहाने सरकार मदरसों पर नकेल कसना चाहती है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सरकार की मंशा संदेह के घेरे में है। बीजेपी तमाम राज्यों में लंबे समय से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती रही है। वह ममता बनर्जी सरकार को तुष्टिकरण के आरोप में कटघरे में खड़ा करती रही है। अब बंगाल में मदरसों के सर्वेक्षण और उसके आधार पर कार्रवाई की आड़ में पार्टी अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही है।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 09 Jun 2026 12:24:31 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दुनिया की प्रमुख विचारधाराएं कौन-कौन सी हैं? जानिए पूरी सूची और उनकी खासियतें]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/religious-article/capitalism-socialism-communism-and-other-ideologies-list-126060800024_1.html</link>
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      <description><![CDATA[ideologies list: विश्व के इतिहास में दर्शन (Philosophy), राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विचारों और सिद्धांतों की एक विशाल श्रृंखला रही है। इन सिद्धांतों को ही हिंदी में 'वाद' और अंग्रेजी में '-ism' कहा जाता है। दुनिया के सभी ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="ideologies list" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/08/full/1780906769-1825.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="ideologies list" width="1200" /></p>
	</p>
	ideologies list: विश्व के इतिहास में दर्शन (Philosophy), राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विचारों और सिद्धांतों की एक विशाल श्रृंखला रही है। इन सिद्धांतों को ही हिंदी में &#39;वाद&#39; और अंग्रेजी में &#39;-ism&#39; कहा जाता है। दुनिया के सभी प्रमुख &#39;वादों&#39; को उनके विषय के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. धार्मिक और आध्यात्मिक वाद (Religious & Spiritual Isms)</h3>
<p>
	ये वाद ईश्वर, ब्रह्मांड और आत्मा के अस्तित्व की व्याख्या करते हैं:</p>
<p>
	<strong>आस्तिकता (Theism):</strong> ईश्वर के अस्तित्व और उसकी सर्वोच्च सत्ता को स्वीकार करना।</p>
<p>
	<strong>नास्तिकता (Atheism):</strong> ईश्वर और अलौकिक शक्तियों के अस्तित्व को पूरी तरह खारिज करना (जैन, बौद्ध)।</p>
<p>
	<strong>अज्ञेयवाद (Agnosticism): </strong>यह मानना कि ईश्वर है या नहीं, इसे मनुष्य निश्चित रूप से नहीं जान सकता। (ताओ, जैन, बौद्ध और हिंदू धर्म का सांख्य एवं अद्वैत दर्शन इसके करीब हैं)।</p>
<p>
	<strong>एकेश्वरवाद (Monotheism): </strong>केवल एक ही ईश्वर को मानना (जैसे यहूदी, ईसाई और इस्लाम)।</p>
<p>
	<strong>बहुदेववाद (Polytheism):</strong> एक से अधिक को ईश्‍वर मानना या अधिक देवी-देवताओं की पूजा और अस्तित्व को मानना।</p>
<p>
	<strong>सर्वेश्वरवाद (Pantheism): </strong>यह मानना कि संपूर्ण ब्रह्मांड और प्रकृति ही ईश्वर है; प्रकृति से अलग कोई भगवान नहीं है।</p>
<p>
	<strong>एकात्मवाद (Monism): </strong>यह मानना कि संपूर्ण जगत में केवल एक ही तत्व (जैसे ब्रह्म या चेतना) सत्य है, बाकी सब उसका रूप हैं।</p>
<p>
	<strong>नियतिवाद: (Determinism): </strong>सबकुछ नियत है। ईश्वर या कर्म में जैसा कुछ नहीं है। जो कुछ है नियतिवाद है। पुरुषार्थ, पराक्रम वीर्य से नहीं, किंतु नियति से ही जीव की शुद्धि या अशुद्धि होती है। इन्हें आजीवक भी कहते हैं।<br />
	 </p>
<p>
	<strong>नोट:</strong> हिंदू धर्म में उपरोक्त सभी दर्शनों का समावेश है, क्योंकि हिंदुइज्म मानता है कि सत्य को किसी वाद में नहीं समेट सकते हैं। ऋग्वेद में सभी तरह के वादों का वर्णन मिलता है। हिंदू दर्शन मुलत: खोज और मोक्ष को महत्व देता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. राजनैतिक और आर्थिक वाद (Political & Economic Isms)</h3>
<p>
	इन वादों ने दुनिया की सरकारों, देशों की सीमाओं और अर्थव्यवस्थाओं को आकार दिया है:</p>
<p>
	<strong>पूंजीवाद (Capitalism): </strong>मुक्त बाजार (Free Market) और निजी संपत्ति का समर्थन करने वाली व्यवस्था, जहां उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व होता है।</p>
<p>
	<strong>समाजवाद (Socialism): </strong>संपत्ति और संसाधनों पर समाज या सरकार के नियंत्रण का समर्थन, ताकि अमीरी-गरीबी की खाई कम हो। (हालांकि कोई भी सरकार ऐसा कर नहीं पाती है और संभव भी नहीं है, बगीचे में एक ही तरह के फूल को उगाना तर्कसंगत नहीं है)</p>
<p>
	<strong>साम्यवाद (Communism): </strong>कार्ल मार्क्स के विचारों पर आधारित, जो एक वर्गहीन और राज्यहीन समाज की कल्पना करता है जहां सब कुछ सबका होता है (जैसे सोवियत संघ या चीन का मूल मॉडल)। (हालांकि कोई भी सरकार ऐसा कर नहीं पाती है और संभव भी नहीं है, बगीचे में एक ही तरह के फूल को उगाना तर्कसंगत नहीं है)</p>
<p>
	<strong>फासीवाद / नाजीवाद (Fascism / Nazism): </strong>उग्र राष्ट्रवाद और तानाशाही का समर्थन करने वाली विचारधारा, जहां राष्ट्र सर्वोपरि होता है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता खत्म कर दी जाती है।</p>
<p>
	<strong>साम्राज्यवाद (Imperialism):</strong> किसी शक्तिशाली देश द्वारा अपनी सीमाओं का विस्तार करने और दूसरे कमजोर देशों को गुलाम बनाने की नीति।</p>
<p>
	<strong>उपनिवेशवाद (Colonialism): </strong>एक देश द्वारा दूसरे देश पर आर्थिक और राजनैतिक नियंत्रण स्थापित करना (जैसे अंग्रेजों का भारत पर राज)।</p>
<p>
	<strong>अराजकतावाद (Anarchism):</strong> किसी भी प्रकार की सरकार, राज्य या कानून का विरोध करना; इनका मानना है कि समाज बिना किसी सत्ता के खुद चल सकता है।</p>
<p>
	<strong>लोकतंत्रवाद (Democratism): </strong>जनता के शासन और लोकतांत्रिक मूल्यों (चुनाव, समानता) का समर्थन।</p>
<p>
	<strong>नोट: </strong>भारतीय दर्शन और परंपरा लोकतंत्र और अधिनायकवाद को बीच के रास्ते का समर्थन करता है। जैसे रामराज्य और विक्रमादित्य का राज्य।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	3. दार्शनिक और ज्ञानमीमांसीय वाद (Philosophical Isms)</h3>
<p>
	ये मनुष्य की बुद्धि, सत्य की खोज और जीवन जीने के नजरिए से जुड़े हैं:</p>
<p>
	<strong>आदर्शवाद (Idealism):</strong> भौतिक संसार की तुलना में विचारों (Ideas), चेतना और आत्मा को प्राथमिक मानना।</p>
<p>
	<strong>भौतिकवाद (Materialism):</strong> यह मानना कि केवल पदार्थ (Matter) ही सत्य है, आत्मा या चेतना जैसी कोई चीज नहीं होती।</p>
<p>
	<strong>यथार्थवाद (Realism): </strong>चीजों को वैसी ही देखना जैसी वे वास्तव में हैं, न कि कल्पना या आदर्श के रूप में।</p>
<p>
	<strong>अस्तित्ववाद (Existentialism): </strong>यह मानना कि मनुष्य का अस्तित्व पहले आता है और वह अपने जीवन का अर्थ और उद्देश्य खुद चुनता है (फ्री विल)।</p>
<p>
	<strong>बुद्धिवाद (Rationalism): </strong>ज्ञान प्राप्ति के लिए केवल तर्क और बुद्धि को ही एकमात्र साधन मानना।</p>
<p>
	<strong>अनुभववाद (Empiricis</strong>m): यह मानना कि सच्चा ज्ञान केवल इंद्रियों के अनुभव और प्रयोगों (Observations) से ही मिल सकता है।</p>
<p>
	<strong>उपयोगितावाद (Utilitarianism):</strong> वह सिद्धांत जो कहता है कि वही कार्य सही है जिससे "अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख" मिले।</p>
<p>
	<strong>घोर निराशावाद (Nihilism): </strong>यह मानना कि जीवन का कोई अंतर्निहित अर्थ, उद्देश्य या नैतिक मूल्य नहीं है; सब कुछ शून्य है।</p>
<p>
	<strong>नोट: </strong>भारतीय दर्शन और धर्म में यथार्थवाद, अस्तित्ववाद, बुद्धिवाद और अनुभववाद की चर्चा अधिक होती है। </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	4. सामाजिक और सांस्कृतिक वाद (Social & Cultural Isms)</h3>
<p>
	ये समाज के ढांचे, अधिकारों और इंसानी व्यवहार को प्रभावित करते हैं:</p>
<p>
	<strong>नारीवाद (Feminism): </strong>महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक अधिकारों और लैंगिक समानता (Gender Equality) का समर्थन।</p>
<p>
	<strong>मानवतावाद (Humanism):</strong> किसी दैवीय शक्ति के बजाय मनुष्य, उसकी भलाई और उसकी क्षमताओं को केंद्र में रखना।</p>
<p>
	<strong>व्यक्तिवाद (Individualism): </strong>समाज या राज्य की तुलना में व्यक्ति की स्वतंत्रता और अधिकारों को अधिक महत्व देना।</p>
<p>
	<strong>राष्ट्रवाद (Nationalism): </strong>अपने देश के प्रति वफादारी, गर्व और देशहित को सर्वोपरि रखने की भावना।</p>
<p>
	<strong>वैश्वीकरण / भूमंडलीकरण (Globalism): </strong>पूरी दुनिया को एक साझा बाजार और समाज के रूप में देखना (वसुधैव कुटुंबकम का आधुनिक रूप)।</p>
<p>
	<strong>पर्यावरणवाद (Environmentalism): </strong>प्रकृति, पर्यावरण और वन्यजीवों के संरक्षण को समर्पित विचारधारा।</p>
<p>
	नोट: भारतीय धर्म, दर्शन और परंपरा में सभी को महत्व दिया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	संक्षेप में कहें तो:</h3>
<p>
	इंसानी दिमाग ने जब भी किसी एक विचार को बहुत गहराई से पकड़ा और उसे जीवन जीने का आधार बनाया, तो वहां एक नए &#39;वाद&#39; का जन्म हुआ। आज भी दुनिया इन्हीं वादों के टकराव और तालमेल से चल रही है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि मनुष्‍य को यह समझना होगा कि सभी वादों से ज्याद महत्वपूर्ण है मनुष्‍य-मनुष्‍यता, व्यक्ति स्वतंत्रता, ज्ञान-विज्ञानता और प्रकृति संवरक्षण।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>संकलन: अनिरुद्ध जोशी</strong></p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 13:47:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 08 Jun 2026 16:32:13 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Religious Article]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर आत्महत्या क्यों कर रहे हैं भारत में विवाहित पुरुष]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/ncrb-report-2024-married-men-suicide-family-disputes-mental-health-crisis-126060500037_1.html</link>
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      <description><![CDATA[एनसीआरबी की ओर से जारी 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)' शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0.4 ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Married Men Suicide India" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-07/25/full/1753382693-17.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Married Men Suicide India" width="1200" /></p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	एनसीआरबी की ओर से जारी &#39;भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)&#39; शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0.4 फीसदी कम जरूर है। हालांकि इस दौरान शादीशुदी पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिवारिक कलह बढ़ती आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह (33.5 फीसदी) के तौर पर सामने आई है। इसके अलावा नशाखोरी, शादी संबंधित विवाद, दहेज, वित्तीय बदहाली और बेरोजगारी का स्थान है। छात्र-छात्राओं आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षाओं में नाकाम रहना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67.5 फीसदी लोग विवाहित थे। पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है। बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं। </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बढ़ते मामलों की वजह</h3>
<p>
	हालांकि सवाल है कि क्या पारिवारिक कलह का मतलब सिर्फ पति-पत्नी विवाद है। महिला अधिकार कार्यकर्ता इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। पश्चिम बंगाल राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पारिवारिक कलह का दायरा व्यापक है। यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद नहीं हैं। भाई-बहन, माता-पिता और रिश्तेदारों से विवाद भी पारिवारिक कलह के दायरे में आता है। ऐसे में शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के लिए सिर्फ पत्नियों या महिलाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना है कि पुरुष शादी के बाद विभिन्न वजहों से मानसिक दबाव में रह सकते हैं। इसमें दफ्तर की राजनीति और नौकरी की दिक्कतों के अलावा आर्थिक मुश्किलों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता की महिला अधिकार कार्यकर्ता सुष्मिता बारुई भी यही बात कहती हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "पारिवारिक कलह से होने वाली मौतों के लिए सीधे पत्नी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। एनसीआरबी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा है। पारिवारिक कलह शब्द का दायरा बहुत बड़ा है। हमें तस्वीर के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए। देश में हर साल भारी तादाद में दहेज उत्पीड़न के कारण महिलाओं की मौत की खबरें भी आती हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सामाजिक स्थिति और कई अन्य वजहों से पुरुष ऐसी स्थिति में मन ही मन घुटते हुए मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है। महिलाओं के उलट ज्यादातर मामलों में किसी सहयोगी या परिजन से अपने मन की पीड़ा भी साझा नहीं कर पाता।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आत्महत्या पर कैसे लगे अंकुश?</h3>
<p>
	मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में आत्महत्या एक मूक महामारी के तौर पर फैल रही है। लेकिन इस महामारी पर आखिर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस संकट से निपटने के लिए व्यवहार में बदलाव के संकेतों को समय रहते पहचानने और मानसिक और भावनात्मक काउंसलिंग शुरू करने का सुझाव देते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना है कि विवाहित पुरुष कई वजहों से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। पुरुष पारंपरिक रूप से पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता या भावनात्मक समर्थन लेने में हिचकते हैं और मन ही मन घुटते रहते हैं। कोलकाता के मशहूर मनोचिकित्सक डा। अयन मुखर्जी ने डीडब्ल्यू से कहा, "पुरुष अमूमन अपनी मानसिक पीड़ा किसी और के सामने जाहिर नहीं करते। लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने की वजह से वो मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं और किसी कमजोर पल में आत्महत्या का फैसला कर लेते हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि ऐसी परिस्थिति के लिए सिर्फ दांपत्य जीवन के विवाद को दोष नहीं दिया जा सकता। एक पुरुष को जीवन में कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है। खासकर शादी के बाद उस पर जिम्मेदारियों का बोझ काफी बढ़ जाती है। ऐसे में मानसिक अवसाद की वजह कुछ भी हो सकती है। किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कोलकाता के एक अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ। मानसी घोष डीडब्ल्यू से कहती हैं, "कुछ मामलों में महिला सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग की आशंका भी पुरुष को आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है। लेकिन आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के लिए यही अकेली या सबसे बड़ी वजह नहीं हो सकती।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में अक्सर आत्महत्या से पहले कई संकेत मिलने लगते हैं। इनको समय रहते पहचान कर अवसाद के इलाज से इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है ताकि विभिन्न समस्याओं के कारण मानसिक अवसाद से जूझते पुरुष अपनी झिझक छोड़ कर समय रहते काउंसलिंग के लिए सामने आ सकें।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 14:57:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 05 Jun 2026 15:03:51 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली के गेस्टहाउस में आग लगने पर लोग क्यों नहीं भाग सके]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/delhi-malviya-nagar-guest-house-fire-illegal-construction-fire-noc-violation-21-deaths-126060400014_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/04/thumb/1_1/1780555100-1158.jpg"/>
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      <description><![CDATA[गेस्ट हाउस में बुधवार सुबह भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। हालांकि शुरुआती पड़ताल में अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और निर्माण से जुड़ी गडबड़ियों के संकेत मिले हैं। मरने वालों में 9 भारतीय और 12 ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="delhi hotel fire" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/04/full/1780555100-1158.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="delhi hotel fire photo : Somnath Bharti X account" width="1200" /></p>
	</p>
	शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	गेस्ट हाउस में बुधवार सुबह भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। आग लगने के कारणों की जांच की जा रही है। हालांकि शुरुआती पड़ताल में अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और निर्माण से जुड़ी गडबड़ियों के संकेत मिले हैं। मरने वालों में 9 भारतीय और 12 विदेशी नागरिक शामिल हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	हादसे के  कुछ वीडियो सामने आए। कई लोगों ने जलती इमारत से छलांग लगा दी। उनकी जान बचाने के लिए स्थानीय निवासियों ने पास की एक दुकान से गद्दे लाकर जमीन पर बिछा दिए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	&#39;फ्लरिश स्टे बी एन बी&#39; पिछले 7-8 साल से हौज रानी इलाके में चल रहा था। इसे केवल 6 कमरे बनाने की इजाजत थी। लेकिन समय के साथ चार मजिलें और बन गईं। इसमें 25 कमरे बना दिए गए। यह गेस्ट हाउस बिना वैध फायर एनओसी के संचालित हो रहा था। इसके बेसमेंट में भी लोग रुके हुए थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मालवीय नगर मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 3 के निकट बने इस गेस्ट हाउस में प्रति बिस्तर के हिसाब से सुविधा दी जाती थी। दिल्ली अग्निशमन सेवा (डीएफएस) की शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि आग की शुरुआत भूतल पर सीढ़ियों के पास हुई हो सकती है। जांच में यह भी सामने आया है कि इमारत की खिड़कियां सील थीं, जिसके कारण अंदर मौजूद लोगों के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो गया। बचाव कार्य में भी मुश्किलें आईं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्थानीय लोगों ने बचाया, फंसे लोगों को निकाला</h3>
<p>
	चश्मदीद इसरार अली मौके पर पहुंचने वाले शुरूआती लोगों में थे। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर फंसे लोगों को बाहर निकालने में मदद की। वह डीडब्ल्यू को बताते हैं, "जैसे ही धुआं दिखाई दिया, हम होटल की ओर दौड़ पड़े। उस समय सुबह करीब 8:45 बजे का समय रहा होगा। हम लगातार लोगों को आवाज देकर बाहर निकलने और जान बचाने के लिए कूदने को कह रहे थे। होटल में कई विदेशी नागरिक भी ठहरे हुए थे। वे हमारी भाषा नहीं समझ पा रहे थे।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली पुलिस के अनुसार आग सुबह करीब 9 बजे लगी। जिसके बाद मौके पर दमकल विभाग की आठ गाड़ियां भेजी गईं और आग बुझाने का अभियान शुरू किया गया। हालांकि स्थानीय निवासियों का आरोप है कि दमकल की गाड़ियां 45 मिनट देरी से आईं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अग्निशमन अधिकारियों ने बताया कि पांच मंजिला यह इमारत गेस्ट हाउस के रूप में संचालित की जा रही थी। यहां ठहरे यात्री बांग्लादेश, अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के दूसरे देशों से आए थे। इनमें से अधिकांश लोग अपने परिजनों के साथ चिकित्सा उपचार के लिए दिल्ली पहुंचे थे। पास ही में साकेत के मैक्स अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसरार ने डीडब्ल्यू बताया, "कई शव बाथरूम और बिस्तरों के नीचे मिले। आग और धुएं से बचने के लिए लोगों ने वहां छिपने की कोशिश की थी। होटल में आने-जाने के लिए केवल एक ही मुख्य गेट था। उस पर इलेक्ट्रॉनिक लॉक लगा हुआ था। आग लगने के बाद बिजली चली गई, जिसके कारण लॉक ने काम करना बंद कर दिया और गेट नहीं खुल सका। कई लोग इमारत में ही फंसे रह गए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इलाके के निवासी मोहम्मद अफजल ने बताया कि आग लगने के बाद लोगों को बाहर निकालने के लिए स्थानीय लोगों ने पत्थरों और हथौड़ों की मदद से गेट का लॉक तोड़ा। अफजल बताते हैं कि हौज रानी में इस तरह से संचालित होने वाली यह अकेली इमारत नहीं है। पास में अस्पतालों और कॉलेजों की मौजूदगी के कारण बड़ी संख्या में मरीज, उनके परिजन और छात्र यहां के होटलों और गेस्ट हाउसों में ठहरते हैं। इसी मांग का फायदा उठाने के लिए इलाके में कई ऐसे होटल और गेस्ट हाउस चल रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अफजल ने यह भी कहा,"जांच की जाए तो कई रिहायशी मकानों के बेसमेंट या एक मंजिल को बेड-एंड-ब्रेकफास्ट (बी एंड बी) में बदल दिया गया है। आशंका है कि ये बिना एनओसी से चल रहे हैं। इन सबकी जांच होनी चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	मामले की जांच जारी</h3>
<p>
	पुलिस, दमकल विभाग और दूसरी आपातकालीन सेवाओं के संयुक्त प्रयास से कुल 49 लोगों को इलाज के लिए मैक्स अस्पताल साकेत, एम्स ट्रॉमा सेंटर और पंडित मदन मोहन मालवीय अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें से आठ लोगों को उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुख्य अग्निशमन अधिकारी अभिलाष कुमार मलिक ने बताया कि इमारत में बेसमेंट, भूतल और उसके ऊपर पांच मंजिलें थीं। हर मंजिल, यहां तक कि छत पर भी कमरे बनाए गए थे। इमारत की बनावट ने अंदर फंसे लोगों की स्थिति को और गंभीर बना दिया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कुमार ने आधिकारिक बयान में कहा, "इसकी वजह से फंसे लोगों के पास बाहर निकलने की बहुत कम गुंजाइश बची थी। खिड़कियां सील थीं। हवा के आने-जाने का कोई रास्ता नहीं था। ऐसी इमारतें एक शाफ्ट की तरह काम करती हैं, जहां गर्मी और धुआं कुछ ही सेकंड में पूरी इमारत में फैल जाता है। इससे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो गया।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पुलिस ने बताया कि मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। होटल के मालिक लवकेश बजाज को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। बताया जा रहा है कि लवकेश बजाज के उसी इलाके में दो और गेस्ट हॉउस थे। घटना के बाद से ही इन सभी के गेट पर ताला लग गया और स्टाफ भाग गया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली सरकार में गृह मंत्री आशीष सूद भी घटनास्थल पहुंचे। उन्होंने कहा कि मामले की पड़ताल जारी है। यदि अग्नि सुरक्षा नियमों से संबंधी नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मालवीय नगर अग्निकांड पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने मृतकों के परिजनों को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बंद किए जाएंगे बी एंड बी</h3>
<p>
	सूत्रों के अनुसार, इमारत के मालिक लवकेश बजाज ने दिल्ली पुलिस को बताया कि उनके पास गेस्ट हाउस के रोजमर्रा के कामकाज की निगरानी के लिए पर्याप्त समय नहीं था। इसलिए उन्होंने इसकी जिम्मेदारी एक अन्य व्यक्ति को सौंप रखी थी, जो बुकिंग, खातों और पूरे प्रबंधन का काम देखता था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने यह भी बताया कि इमारत में किए गए कुछ बदलाव, जैसे कमरों का आकार बढ़ाना और अन्य परिवर्तन, एक अन्य व्यक्ति के सुझाव पर किए गए थे। उस व्यक्ति ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि दिल्ली में कई जगह इसी तरह की व्यवस्था अपनाई जाती है और यह आम बात है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया कि विदेश मंत्रालय संबंधित देशों के दूतावासों के संपर्क में है और प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	घटना के बाद इलाके में मौजूद सभी होटलों, गेस्ट हॉउस और बी एंड बी ने शटर गिरा दिए। ये सभी मालवीय नगर की संकरी गलियों और आवासीय इलाकों में चल रहे थे। फिलहाल आशीष सूद ने नियमों का उल्लंघन करने वाले सभी बी एंड बी (बेड एंड ब्रेकफास्ट) को तुरंत सील करने के निर्देश दिए हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वहीं, पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि दिल्ली सरकार की बी एंड बी नीति करीब एक महीने पहले ही वापस ले ली गई थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने आश्वासन दिया कि मामले में तेज कार्रवाई हो रही है। अग्नि सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाली अवैध संपत्तियों, अनधिकृत गेस्ट हाउसों और अन्य प्रतिष्ठानों के खिलाफ पूरे शहर में विशेष अभियान चलाया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 11:56:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 04 Jun 2026 12:09:00 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[किडनी प्रत्यारोपण के लिए भारत में क्यों है लंबा इंतजार?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/kidney-disease-cases-in-india-organ-donation-shortage-126060300003_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/kidney-disease-cases-in-india-organ-donation-shortage-126060300003_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/03/thumb/1_1/1780456417-2211.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। अंगदान (Organ Donation) की भारी कमी और डायलिसिस के भारी-भरकम खर्च के कारण देश में अवैध किडनी रैकेट की जड़ें फैल रही हैं। जानिए इसके लक्षण, इलाज का खर्च और जमीनी हकीकत।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Kidney disease in India" class="imgCont" height="800" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/03/full/1780456417-2211.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Kidney disease in India" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>-रामांशी मिश्रा</strong></p>
<p>
	30 मार्च 2026 को उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में पुलिस ने एक किडनी रैकेट का भंडाफोड़ किया। इसकी जांच में पता चला कि यह नेटवर्क सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं था बल्कि नोएडा, लखनऊ, मेरठ और दिल्ली से लेकर देहरादून तक इसकी जड़ें फैली हुईं थी। देश भर के अलग-अलग हिस्सों से लोगों को बरगलाकर, उनसे किडनी लेकर अवैध तरीके से जरूरतमंद लोगों को बेची जा रही थी।  </p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत में 13.8 करोड़ मरीज</h3>
<p>
	क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) से दुनिया भर में 78.8 करोड़ लोग जूझ रहे हैं। भारत में यह संख्या 13.8 करोड़ है, जो चीन के बाद दुनिया में किसी देश की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। यह भी कहा जा सकता है कि भारत के लगभग हर 10 में से एक व्यक्ति को किडनी से जुड़ी किसी ने किसी तरह की बीमारी है। लगभग दो लाख नए मरीज हर साल एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) की चपेट में आ रहे हैं। यह अवस्था तब आती है जब किडनी लगभग काम करना बंद कर देती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	1990 से 2016 के बीच भारत में क्रॉनिक किडनी डिजीज से होने वाली मौतें 5.2 लाख से बढ़कर 11.8 लाख हो गईं थीं। द मिलियन डेथ स्टडी शोध पत्र के अनुसार, 2015 में ही सिर्फ किडनी फेल होने से भारत में एक लाख 36 हजार लोगों की मौत हुई।जाहिर है कि भारतीय लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े बड़े खतरों में किडनी की बीमारी भी शामिल हो गई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	जो दो लाख मरीज किडनी की बीमारी की गंभीर स्थिति में पहुंचते हैं, उनमें से कितनों का किडनी ट्रांसप्लांट हो पाता है? इस सवाल के जवाब में 2024 के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष भारत में कुल 18 हजार 911 ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुए थे, जिनमें सिर्फ 13 हजार 476 किडनी ट्रांसप्लांट था। बाकी बचे लोग या तो डायलिसिस पर होते हैं या फिर उनकी मौत हो जाती है, और यहीं से शुरुआत होती है अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट की।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अंगदान की कमी  </h3>
<p>
	नेशनल ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (नोट्टो) के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ब्रेन डेड या मौत के बाद अंगदान करने वालों से महज 1,099 अंगदान हुए। इनमें पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा है। अंगदान के 90% मामले भी केवल पांच दक्षिणी राज्यों के हैं। उत्तर प्रदेश में सिर्फ तीन लोगों के परिवार ने मौत के बाद उनके अंगदान की मंजूरी दी, जबकि देश की आबादी में सबसे बड़ा हिस्सा इसी राज्य का है। 2024 में इस राज्य में कुल 447 किडनी ट्रांसप्लांट हुए। से में उत्तर प्रदेश की स्थिति और भी ज्यादा विकराल दिखती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ राजेश हर्षवर्धन खनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में कार्यरत हैं। वह हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन के प्रमुख और  ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांट यूनिट (सोट्टो) के नोडल अधिकारी भी हैं। वह कहते हैं, "क्रॉनिक किडनी डिजीज को ‘साइलेंट डिजीज&#39; भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसके लक्षण काफी बाद में दिखाई पड़ते हैं। किडनी की कार्यक्षमता 60 से 70% तक गिरने के बाद ही इस बीमारी के संकेत सामने आते हैं।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	क्रॉनिक किडनी डिजीज के लक्षणों में पैरों और चेहरे पर सूजन, थकान, भूख का खत्म होना, पेशाब में झाग या खून और रात को बार-बार उठना जैसी बातें शामिल होती हैं। इस बीमारी के संभावित कारणों में लगातार खराब जीवनशैली, प्रदूषित पानी का अधिक समय तक उपयोग, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या बार-बार किडनी में संक्रमण होना हो सकता है। डॉ हर्षवर्धन का कहना है कि भारत में पर्चे के यानी ओवर द काउंटर दर्द निवारक दवाएं आसानी से मिल जाती हैं। इनका लंबे समय तक उपयोग भी किडनी को प्रभावित करता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	किडनी के रोगियों का इलाज</h3>
<p>
	डॉ हर्षवर्धन बताते हैं कि किडनी के गंभीर रोगियों के लिए डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट, यही दो इलाज हैं। डायलिसिस वह प्रक्रिया है जो एक मशीन के जरिए किडनी का काम करती है। डायलिसिस की प्रक्रिया भारत जैसे विकासशील देश में एक आम व्यक्ति के लिए आसान नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किडनी फेल होने की स्थिति में सप्ताह में दो से तीन बार और हर प्रक्रिया में तीन से चार घंटे का समय मरीज को अस्पताल में बिताना पड़ता है। एक निजी केंद्र में डायलिसिस की एक प्रक्रिया में 2,200 रुपए से 5,200 रुपए तक का खर्च आता है। इस लिहाज से प्रति व्यक्ति सालाना ढाई लाख से सात लाख रुपए तक का खर्च सिर्फ डायलिसिस की प्रक्रिया पर आता है। एक अनुमान के अनुसार, 2018 में एक लाख 75 हजार मरीज क्रॉनिक डायलिसिस पर थे। इनमें से दो तिहाई मरीज बिना इलाज के ही मर गए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	किडनी ट्रांसप्लांट के बारे में डॉ हर्षवर्धन का कहना है, "किडनी मरीजों के लिए ट्रांसप्लांट हमेशा से ही एक बेहतर विकल्प रहा है। इससे न केवल जीवन की अवधि बढ़ती है पर साथ ही क्वालिटी आफ लाइफ में भी सुधार होता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसके अलावा ट्रांसप्लांट पर सरकारी व्यवस्था में खर्च भी लगभग आधा हो जाता है। डॉ हर्षवर्धन के अनुसार, अगर दो वर्ष के किडनी के इलाज के खर्च की तुलना की जाए तो डायलिसिस पर लगभग पांच लाख रुपए सरकारी व्यवस्था में खर्च हो जाता है। वहीं, ट्रांसप्लांट पर सिर्फ 3.5 लाख रुपए का खर्च आता है। इस लिहाज से किडनी ट्रांसप्लांट जीवन की गुणवत्ता को संवारने के साथ ही आर्थिक बोझ भी कम करता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत में अंगदान की स्थिति</h3>
<p>
	भारत में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए मरीजों के इंतजार पर डॉ हर्षवर्धन काफी अहम जानकारी साझा करते हैं। वह कहते हैं कि भारत में परिवार के सदस्यों की ओर से अगर ट्रांसप्लांट के लिए किडनी मिल जाए तो एक से तीन महीने में किडनी ट्रांसप्लांट संभव है। कैडेवर डोनेशन यानी मृत व्यक्तियों के अंगदान से मिले किडनी के लिए मरीज को छह महीने से कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नोट्टो के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच देशभर में किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में शामिल दो हजार 850 मरीजों की मृत्यु हो गई। दिसंबर 2025 तक देश में 60 हजार 590 किडनी के मरीज प्रतीक्षा सूची में थे। 2024 में मृत-दाताओं (डिसीज्ड डोनर) की संख्या सिर्फ 1,128 थी, जबकि इस साल सड़क दुर्घटना में 1.73 लाख लोग मारे गए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ. हर्षवर्धन कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में कैडेवर डोनेशन अभी भी ना के बराबर है। इसलिए यहां पर मरीज को काफी ज्यादा इंतजार करना पड़ता है और इसी के कारण अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट तेजी से बढ़ते हैं।" नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ऑर्गन ट्रैफिकिंग से जुड़े 150 केस दर्ज हुए। औसतन हर साल दो से पांच किडनी के अवैध रैकेट मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पीजीआई के लखनऊ निदेशक डॉक्टर आरके धीमन और डॉक्टर हर्षवर्धन ने अंगदान की व्यवस्था पर एक रिसर्च रिपोर्ट भी प्रकाशित किया है। जर्नल ऑफ इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि भारत में मरने वालों के अंगदान की सबसे बड़ी रुकावट ब्रेन डेड मरीजों की पहचान ना हो पाना और परिवार को सही काउंसलिंग ना मिलना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ब्रेन डेड का अर्थ होता है कि व्यक्ति का मस्तिष्क काम करना बंद कर देना। हालांकि इस स्थिति में भी किडनी और लिवर जैसे अंग मशीनों की मदद से कुछ समय तक सही सलामत रहते हैं और वह ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त होते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जमीनी हकीकत यह है कि देश के अधिकांश आईसीयू में कार्यरत विशेषज्ञ मरीज के ब्रेन डेड होने की घोषणा की प्रक्रिया के बारे में नहीं जानते हैं। ब्रेन डेड घोषित करने के लिए न्यूरोलॉजिस्ट समेत चार डॉक्टरों की एक स्वतंत्र टीम होती है, जो इस बात की जांच करती है। अगर मरीज को देर से ब्रेन डेड घोषित किया जाए तो ऑर्गन फेल होने की वजह से शरीर के अंग ट्रांसप्लांट के लायक नहीं रह जाते।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्वास्थ्य विभाग की कुछ कमियां देती हैं अवैध रैकेट को जन्म</h3>
<p>
	किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ऑर्गन ट्रांसप्लांट यूनिट के कॉर्डिनेटर पीयूष श्रीवास्तव कहते हैं कि एक व्यक्ति के ब्रेन डेड होने की स्थिति में सबसे जरूरी होता है- परिवार के सदस्यों को इस बात के लिए मनाना कि उनके शरीर के अंग किसी और की जिंदगी बचा सकते हैं। इसे समझाने की जिम्मेदारी निभाते हैं प्रशिक्षित काउंसलर। हालांकि उत्तर भारत के अधिकांश जिला और सामुदायिक अस्पतालों में काउंसलर के पद या तो खाली है या फिर कभी भरे ही नहीं गए। इसके कारण दाता अंगदान की प्रक्रिया तक नहीं पहुंच पाते।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉक्टर हर्षवर्धन कहते हैं कि जब 60 हजार से अधिक मरीज प्रतीक्षा सूची में हों और हर साल दो लाख नए मरीज गंभीर श्रेणी में पहुंच रहे हैं तो अवैध ट्रांसप्लांट के रैकेट से जुड़े अपराधी इसे अपने फायदे का जरिया बना लेते हैं। इस रैकेट में शामिल लोग डायलिसिस केंद्रों में जाने वाले मरीजों को अपना निशाना बनाते हैं और उन्हें जल्दी ट्रांसप्लांट करवाने की आशा देते हैं। उनकी हामी के बाद गरीब दाताओं को खोज कर मरीज के साथ फर्जी रिश्तेदारी के दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। ज्यादातर ऑपरेशन रात को होते हैं और मरीज से बड़ी रकम वसूली जाती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अवैध रैकेट के खिलाफ बना है कानून</h3>
<p>
	भारत में 1994 में ट्रांसप्लांटेशन आफ ह्यूमन ऑर्गन एंड टिश्यू एक्ट (टीएचओए) बनाया गया है जिसमें अंग व्यापार को अपराध घोषित किया गया है और ब्रेनडेथ को कानूनी मान्यता दी गई है। अंग व्यापार के दोषियों पर 20 लाख रुपए तक के जुर्माने के साथ 10 साल की जेल का प्रावधान है। हालांकि कम ही अपराधी पकड़े या भी दोषी करार दिए जाते हैं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	डॉ हर्षवर्धन कहते हैं कि भारत की समस्या केवल अवैध रैकेट नहीं है। वह कहते हैं, "भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक ट्रांसप्लांट करने वाला देश है लेकिन प्रति 10 लाख की जनसंख्या पर अंगदान की दर स्पेन से भी 60 गुना कम है। यहां साल भर में 1.73 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं लेकिन उनके अंग किसी की जान बचाने के काम नहीं आते हैं। कानून मजबूत है लेकिन प्रशासनिक कमेटी जवाबदेह नहीं है।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 08:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 03 Jun 2026 08:45:02 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इतना गर्म कैसे हो गया यूपी का बांदा जिला?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/up-weather-banda-becomes-hottest-city-reaches-48-degree-celsius-bundelkhand-heatwave-126060200003_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/02/thumb/1_1/1780370259-0693.jpg"/>
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      <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड के बांदा जिले में इस साल गर्मी में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच गया। पिछले कई दिनों तक यहां का तापमान 47-48 डिग्री ही बना रहा। तापमान के असर के चलते शहरी और ग्रामीण इलाकों में दोपहर में ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="banda heat" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/02/full/1780370259-0693.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="banda heat photo : AI Generated" width="1200" /></p>
	</p>
	समीरात्मज मिश्र</p>
<p>
	उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बुंदेलखंड के बांदा जिले में इस साल गर्मी में तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच गया। पिछले कई दिनों तक यहां का तापमान 47-48 डिग्री ही बना रहा। तापमान के असर के चलते शहरी और ग्रामीण इलाकों में दोपहर में बिल्कुल सन्नाटा पसर जाता है और भीड़ सिर्फ अस्पतालों में दिखती है जहां मौसम की मार नहीं झेल पाने वाले लोग बीमार होकर पहुंच रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारतीय मौसम विभाग की ताजा रिपोर्ट में 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ बांदा कई दिनों तक लगातार देश का सबसे गर्म जिला बना रहा और यह तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री ज्यादा था। हालांकि बांदा के आस-पास के जिलों मसलन, प्रयागराज, झांसी, कानपुर का भी हाल लगभग ऐसा ही था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यही नहीं, बीते 21 मई को तो बांदा में तापमान 48.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया और इस तापमान के साथ वह ना सिर्फ भारत का बल्कि उस हफ्ते दुनिया के सबसे गर्म शहरों में भी शामिल हो गया। राजस्थान के चुरू को पीछे छोड़ते हुए बांदा ग्लोबल हीट मैप पर आ गया। मौसम विभाग ने बांदा और दक्षिणी यूपी के कई जिलों के लिए रेड अलर्ट जारी किया। पिछले हफ्ते कुछ बूंदाबांदी के साथ स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ लेकिन बांदा में यह तापमान अभी भी 40 डिग्री से ऊपर ही बना हुआ है। यहां तक कि रात में भी लोगों को राहत नहीं मिल रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने दोपहर 12 बजे से लेकर शाम चार बजे तक लोगों को घरों में रहने की एडवाइजरी जारी की है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बांदा की भौगोलिक स्थिति</h3>
<p>
	बांदा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में स्थित है जिसका ज्यादातर हिस्सा पठारी है। राजस्थान और सिंध के रेगिस्तानों से आने वाली सूखी और गर्म हवाएं, जिन्हें लू कहते हैं, इस इलाके को गर्म कर देती हैं। बुंदेलखंड की स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि जिन पश्चिमी विक्षोभों ने इस महीने उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों को थोड़ी ठंडक भी दी, उनका भी असर यहां नहीं देखने को मिला।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बांदा की भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह पथरीले और ऊंचे इलाके पर बसा है, जहां जमीन के नीचे कठोर ग्रेनाइट पत्थर की चट्टानें हैं। यह पथरीली जमीन दिन भर सूरज की तेज गर्मी और लपटों को अपने अंदर सोख लेती है और फिर रात के समय उसी गर्मी को वापस हवा में बिखेरने लगती है। इस वजह से यहां रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिल पाती।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लोब पर बांदा की स्थिति ऐसी है जहां गर्मियों में सूरज ठीक सिर के ऊपर होता है और उसकी किरणें बिल्कुल सीधी पड़ती हैं। ऐसे में साफ आसमान, पथरीली जमीन, ग्रेनाइट की चट्टानें और पानी की कमी जैसी स्थितियां मिलकर यहां ऐसी गर्मी बिखेरती हैं, मानो आग बरस रही हो।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अवैध खनन का बोलबाला</h3>
<p>
	हालांकि सिर्फ भौगोलिक स्थिति ही इस इलाके को करीब पचास डिग्री सेल्सियस तापमान प्रदान करने के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि स्थानीय लोग भी इसे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखे हैं। पूरे बुंदेलखंड में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और भूजल लगभग खत्म होने की वजह से मिट्टी में नमी लगभग गायब है। रही सही कसर पत्थर और बालू के लिए होने वाला अंधाधुंध खनन इस आग में घी का काम कर रहा है। इन सब वजहों से पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	बांदा के निवासी और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर बताते हैं, "बांदा की जीवनरेखा कही जाने वाली केन नदी से जिस तरह अंधाधुंध बालू निकाली जा रही है और पेड़-पौधे खत्म होते जा रहे हैं, उसकी वजह से गर्मी लगातार बढ़ रही है। बांदा जिले में इस वक्त बीस से ज्यादा लाल मौरम यानी बालू का उत्खनन करने वाली खदानों का संचालन हो रहा है। इस खनन का विस्तार सिर्फ केन नदी तक नहीं है बल्कि यमुना, रंज और बाघेन नदियों तक है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से बांदा और बुंदेलखंड के दूसरे जिले पहले भी गरम रहते रहे हैं, लेकिन ऐसी जानलेवा स्थितियां पिछले कुछ सालों में बनती गई है। यहां प्राकृतिक स्थितियों की वजह से गर्मी भले ही पड़ती रही हो लेकिन तापमान को नियंत्रित करने के तमाम तरीके प्रकृति में ही मौजूद थे। अब उन्हीं चीजों को कुछ लोग अपने लाभ के लालच में नष्ट कर रहे हैं। जिसका नतीजा ना सिर्फ बांदा के लोगों को बल्कि आस-पास के लोगों को भी भुगतना पड़ रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महिला किसान नेता और पर्यावरण कार्यकर्ता उषा निषाद कहती हैं कि अवैध खनन के खिलाफ तमाम शिकायतें होती रहती हैं लेकिन कोई लगाम नहीं लगती। डीडब्ल्यू से बातचीत में उषा निषाद कहती हैं, "हम लोगों ने चित्रकूटधाम मंडल के मंडलायुक्त से मिलकर इसकी लिखित शिकायत की है। यहां तक कि हम लोग नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल में और मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी कर चुके हैं लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भीषण गर्मी की आर्थिक मार</h3>
<p>
	इस भीषण गर्मी के चलते फसलें तो तबाह होती ही हैं गर्मी की वजह से दिन भर लोग घरों के बाहर भी नहीं निकलते। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों और गरीबों को होता है। सुषमा देवी बांदा जिले की रहने वाली हैं। अपने परिवार के साथ गर्मी के मौसम में कच्चे आम का रस यानी पना और गन्ने का जूस बेचती हैं। डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहती हैं, "किसानों और मजदूरों पर तो गर्मी की मार पड़ ही रही है। हमारी तरह के छोटे दुकानदार हैं, वो भी परेशान हैं। दिन में लोग बाहर निकलते ही नहीं। दस बजे से पहले ही अपना काम निपटा लेते हैं। वैसे ज्यादातर लोग तो दूसरे शहरों में जाकर नौकरी या व्यापार कर रहे हैं। यहां रोजगार का कोई साधन वैसे भी नहीं है, ऊपर से ये गर्मी और जान ले रही है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस गर्मी की मार ना सिर्फ इंसानों पर बल्कि पशुओं पर भी पड़ रही है। इस तपती धूप में इन बेजुबान जानवरों को न तो कहीं चरने के लिए घास मिलती है और न ही पीने का पानी। नतीजा यह होता है कि हर साल मई और जून के महीने में सैकड़ों गाय-बैल लू और प्यास के कारण तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं। सिर्फ पालतू या आवारा ही नहीं, बल्कि जंगलों में पानी के छोटे-मोटे गड्ढे और सोते सूख जाने से जंगली जानवर और पक्षी भी भारी तादाद में मर रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	पेड़ों की अंधाधुंध कटाई</h3>
<p>
	ना सिर्फ अवैध खनन बल्कि पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने भी यहां के मौसम को बदहाल किया है। एक ओर हजारों की संख्या में पुराने और घने पेड़ काटे जा रहे हैं तो दूसरी ओर खानापूर्ति के लिए करोड़ों पौधे रोपने का रिकॉर्ड दर्ज किया जाता है, लेकिन धरातल पर वो पौधे कहीं नहीं दिखते।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आशीष सागर कहते हैं, "सरकार ने बुंदेलखंड में रिकॉर्ड तोड़ हरित क्रांति की है, लेकिन सिर्फ कागजों में। राज्य सरकार एक ही दिन में सर्वाधिक पौधारोपण का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड छह बार बना चुकी है। इस हिसाब से करोड़ों पौधे लगाए गए, लेकिन जमीन पर कितने मौजूद हैं, यह बड़ा सवाल है। वहीं सड़कों के चौड़ीकरण की वजह से पूरे बुंदेलखंड में बड़े पैमाने पर पुराने पेड़ों को काटा गया है। उदाहरण के तौर पर बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के निर्माण में ही करीब दो लाख पुराने पीपल, महुआ, शीशम, और नीम जैसे छायादार पेड़ काट दिए गए।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का यही नतीजा है कि बांदा का वन क्षेत्र काफी सिकुड़ गया है। मौजूदा समय में बांदा जिले में सिर्फ 3 फीसदी ग्रीन कवर यानी हरियाली बची है। जबकि पड़ोसी जिले चित्रकूट में स्थिति काफी अच्छी है और गर्मी की मार भी वहां कम पड़ती है जबकि भौगोलिक स्थिति दोनों जगह की एक जैसी है। चित्रकूट में ग्रीन कवर 18 फीसदी है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, पेड़ों की इस भारी कमी के कारण जमीन के अंदर की प्राकृतिक नमी लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है। पेड़ों की कमी के कारण यहां &#39;अल्बीडो इफेक्ट&#39; काफी बढ़ गया है, जिससे धूप जमीन के भीतर अवशोषित नहीं हो पा रही है और वापस लौटकर वातावरण को और ज्यादा गर्म कर रही है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पर्यावरणविदों के मुताबिक, जानलेवा गर्मी से बचने के लिए तालाब और कुओं जैसे स्थानीय जलस्रोतों को पुनर्जीवित करना होगा। वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर और पर्यावरणविद अजय कुमार कहते हैं, "सिर्फ पौधारोपण नहीं, बल्कि उनका संरक्षण भी जरूरी है। छायादार प्रजातियां, स्थानीय प्रजातियां और हरित पट्टियां मदद कर सकती हैं। जरूरी होने पर यदि पुराने पेड़ काटने भी पड़ें तो उस अनुपात में नए पेड़ लगाए भी जाने चाहिए। सिर्फ पौधे लगा देने से कागजी कार्रवाई पूरी हो सकती है, प्रकृति और इंसान की जरूरतें नहीं।”</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 08:36:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 02 Jun 2026 08:49:39 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत-नेपाल सीमा विवाद का पूरा सच: आखिर क्यों उलझे हैं दोनों पड़ोसी देश?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-nepal-border-dispute-explained-in-hindi-126060100023_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/current-affairs/india-nepal-border-dispute-explained-in-hindi-126060100023_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/01/thumb/1_1/1780296679-5352.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/01/thumb/1_1/1780296679-5352.jpg</image>
      <description><![CDATA[भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें ऐतिहासिक संधियों की अलग-अलग व्याख्याएं और भूगोल (नदियों के ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="The image features the flags of India and Nepal, India Gate and Kathmandu, a milestone, and—within a circular frame—the India-Nepal border." class="imgCont" height="800" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-06/01/full/1780296679-5352.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="India-Nepal Border Dispute" width="1200" /></p>
	</p>
	काठमांडू पोस्ट के मुताबिक़, रविवार को नेपाली संसद (प्रतिनिधि सभा) में बोलते हुए बालेन शाह ने कहा, "प्रधानमंत्री बनने के बाद मुझे पता चला कि केवल भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की ज़मीन पर अतिक्रमण किया है।"उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को बैठकर इस मामले को देखना चाहिए। ...उनके इस बयान के बाद नेपाल में उनकी आलोचना होने लगी है। <br />
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/international-hindi-news/balen-shah-government-s-new-decision-regarding-india-nepal-border-126051100002_1.html" target="_blank">अब नेपाल बॉर्डर पर लगेगा ID कार्ड, बालेन सरकार ने लिया कड़ा फैसला, नए नियम का भारतीयों पर क्‍या होगा असर?</a></strong></p>
	भारत और नेपाल के बीच 1,850 किलोमीटर लंबी सरहद है, जो सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से सटी हुई है। भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें ऐतिहासिक संधियों की अलग-अलग व्याख्याएं और भूगोल (नदियों के बदलते रास्ते) मुख्य वजह हैं। यह कोई अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें 200 साल पुरानी हैं।  इस विवाद के मुख्य पहलुओं और इसके पीछे के &#39;सच&#39; को हम कुछ आसान बिंदुओं में समझ सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	1. विवाद की जड़: सुगौली संधि (Treaty of Sugauli, 1816)</h3>
<p>
	इस पूरे विवाद का केंद्र 1816 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच हुई &#39;सुगौली संधि&#39; है। इस संधि के तहत तय हुआ था कि महाकाली (काली) नदी भारत और नेपाल के बीच की पश्चिमी सीमा होगी। नदी के पूर्वी का हिस्सा नेपाल का होगा और पश्चिमी हिस्सा भारत का। भारत इस इलाक़े को उत्तराखंड का हिस्सा मानता है। दोनों देशों के बीच विवाद इस बात पर नहीं है कि नदी सीमा है या नहीं, बल्कि विवाद इस बात पर है कि महाकाली नदी का उद्गम (Origin या शुरुआत) कहाँ से होता है?</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	2. विवादित क्षेत्र: कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा</h3>
<p>
	यह मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले और नेपाल के सुदूरपश्चिम प्रांत के बीच का 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका है।</p>
<p>
	<strong>नेपाल का पक्ष: </strong>नेपाल का मानना है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है। इस हिसाब से लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी तीनों क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आने चाहिए। नेपाल इसके समर्थन में पुराने नक्शों और राजस्व रिकॉर्ड का हवाला देता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>भारत का पक्ष: </strong>भारत का मानना है कि काली नदी का उद्गम कालापानी के पास मौजूद झरनों/धाराओं से होता है। भारत इस क्षेत्र पर 1962 (भारत-चीन युद्ध) से या उससे भी पहले से प्रशासनिक नियंत्रण रखता आया है। भारत के अनुसार, 19वीं सदी के उत्तरार्ध के सभी ब्रिटिश नक्शों में इसी सीमा को सही माना गया है।</p>
<p>
	<p>
		<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/uttar-pradesh/up-north-south-corridor-yogi-government-road-connectivity-bundelkhand-nepal-border-news-126052500078_1.html" target="_blank">योगी सरकार का मेगा प्लान, नेपाल बॉर्डर से बुंदेलखंड तक दौड़ेगा नार्थ-साउथ कॉरिडोर</a></strong></p>
</p>
<h3>
	3. यह विवाद अचानक चर्चा में क्यों आया? (2019-2020 का घटनाक्रम)</h3>
<p>
	सालों से यह मुद्दा शांत था, लेकिन दो बड़ी घटनाओं ने इसे दोबारा गरमा दिया:-</p>
<p>
	<strong>नवंबर 2019:</strong> भारत ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। इसमें कालापानी को हमेशा की तरह भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया था, जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई और कहा कि भारत अपना नक्शा बदले क्योंकि कालापानी उसका क्षेत्र है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>मई 2020:</strong> भारत द्वारा जारी नक्क्षे के 5 माह बाद मई 2020 में लिपुलेख को लेकर दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ गया। भारत के रक्षामंत्री ने लिपुलेख दर्रे (Lipulekh Pass) तक जाने वाली एक नई सड़क का उद्घाटन किया। यह सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा के समय को कम करने के लिए बनाई गई थी। नेपाल ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन माना। धारचूला से लिपुलेख को जोड़ने वाली सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के नाम से भी प्रसिद्ध है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	नेपाल का नया नक्शा:</h3>
<p>
	जवाब में, 18 जून 2020 में नेपाल की तत्कालीन के.पी. शर्मा ओली सरकार ने संविधान में संशोधन कर देश का एक नया राजनीतिक नक्शा जारी कर दिया। इस नक्शे में नेपाल ने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपने क्षेत्र में दिखा दिया और इसे संसद से सर्वसम्मति से पास भी करवा लिया। भारत ने इसे &#39;एकतरफा कदम&#39; बताते हुए नेपाल के क्षेत्रीय दावों को &#39;कृत्रिम विस्तार&#39; मानने से साफ इनकार कर दिया।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	4. दूसरा छोटा विवाद: सुस्ता (Susta) क्षेत्र</h3>
<p>
	यह विवाद भारत के बिहार (पश्चिम चंपारण) और नेपाल के सीमावर्ती इलाके में है। यहाँ सीमा गंडक (नारायणी) नदी तय करती है। दिक्कत यह है कि गंडक नदी समय के साथ अपना रास्ता बदलती रही है। नदी के रास्ता बदलने के कारण सैकड़ों एकड़ जमीन कभी इस पार तो कभी उस पार हो जाती है, जिससे स्थानीय स्तर पर खेती और जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद होता रहता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आखिर सच क्या है?</h3>
<p>
	इस विवाद का सच यह है कि यह एक ही ऐतिहासिक दस्तावेज (सुगौली संधि) की दो अलग-अलग व्याख्याओं और नदियों के भौगोलिक बदलाव का नतीजा है।</p>
<p>
	<strong>भारत के लिए: </strong>यह क्षेत्र रणनीतिक (Strategic) रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि लिपुलेख दर्रे से चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। साथ ही, भारत का यहाँ दशकों से प्रशासनिक नियंत्रण है।</p>
<p>
	<strong>नेपाल के लिए:</strong> यह उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता (Sovereignty) और क्षेत्रीय अखंडता का मामला है, जिसे वहां की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा माना जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<strong>विवाद का शांतिपूर्ण हल:</strong> दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है, खुली सीमाएं हैं और गहरी सांस्कृतिक समानताएं हैं। इसलिए, दोनों ही पक्ष यह मानते हैं कि इस सीमा विवाद को किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप के बिना, केवल आपसी कूटनीतिक बातचीत (Diplomatic Dialogue) और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से ही सुलझाया जा सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	<span style="color:#b22222;">अस्वीकरण (Disclaimer) : </span>चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 12:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 01 Jun 2026 12:22:30 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[Current Affairs]]></category>
      <authorname>वेबदुनिया फीचर टीम</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पेट के लिए मौसम की मार सहने पर मजबूर भारत के 'गिग वर्कर्स']]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iit-delhi-study-on-indian-gig-workers-problems-and-income-126053000002_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iit-delhi-study-on-indian-gig-workers-problems-and-income-126053000002_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/30/thumb/1_1/1780109780-7182.jpg"/>
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      <description><![CDATA[देश में 'गिग वर्करों' की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2021 में जहां यह संख्या करीब 77 लाख थी वहीं इस साल यह बढ़ कर 1.20 करोड़ तक पहुंच गई है और वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो स्थायी तौर ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Gig Worker" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/30/full/1780109780-7182.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	</p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	देश में &#39;गिग वर्करों&#39; की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2021 में जहां यह संख्या करीब 77 लाख थी वहीं इस साल यह बढ़ कर 1.20 करोड़ तक पहुंच गई है और वर्ष 2030 तक यह आंकड़ा 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो स्थायी तौर पर कहीं काम करने की बजाय कांट्रैक्ट के आधार पर अस्थायी रूप से काम करते हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड शेयरिंग और ई-कामर्स प्लेटफार्म की तादाद बढ़ने के साथ ही ऐसे कामगरों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।<br />
	<br />
	गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो स्थायी तौर पर कहीं काम करने की बजाय कांट्रैक्ट के आधार पर अस्थायी रूप से काम करते हैं। ऑनलाइन फूड डिलीवरी, क्विक कॉमर्स, राइड शेयरिंग और ई-कामर्स प्लेटफार्म की तादाद बढ़ने के साथ ही ऐसे कामगरों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस समय देश के विभिन्न इलाके कड़ी गर्मी और लू से जूझ रहे हैं, लेकिन ऐसे प्रतिकूल मौसम के बावजूद कर्मचारी रोजाना 12 घंटे या उससे ज्यादा काम करने पर मजबूर हैं। इतनी मेहनत के बावजूद इनको महीने भर में औसतन 25 हजार रुपए की ही कमाई होती है। केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों के तहत गिग वर्करों को औपचारिक मान्यता तो दे दी है। लेकिन उनके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अब तक हकीकत में नहीं बदल सकी हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	काम पर नहीं जाएंगे तो खाएंगे क्या?</h3>
<p>
	ज्यादातर गिग वर्कर काम छिन जाने के डर से अपने असली नाम के साथ बात करने को तैयार नहीं हुए। डीडब्ल्यू से बातचीत में कोलकाता में एक ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफार्म के लिए काम करने वाली अंजलि (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "पति के पास कोई स्थायी नौकरी नहीं है। इसलिए मजबूरन मुझे यह काम करना पड़ रहा है। इससे किसी तरह दो जून की रोटी और बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम होता है। अगर हम यह काम नहीं करें तो खाएंगे क्या?"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनका कहना था कि भारी गर्मी या बरसात के बावजूद हमें तय समय के भीतर डिलीवरी करनी होती है। अगर ऑर्डर पहुंचाने में देरी हुई तो ग्राहकों की भी झिड़की सुननी पड़ती है और ऑनलाइन प्लेटफार्म की भी। कई बार हमारे पैसे भी काट लिए जाते हैं। महीने में मुश्किल से दो दिन छुट्टी मिलती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाली सुष्मिता (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती है, "कमाई का कोई भरोसा नहीं है। मैंने बीए की डिग्री हासिल की है। लेकिन दूसरी कोई नौकरी नहीं मिली तो चार साल से यही काम कर रही हूं। यह काम करते हुए शादी के बारे में सोचना भी मुश्किल है।" </p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए काम करने वाले सौरभ (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ग्राहक तो सिर्फ यही देखते हैं कि हमारा सामना पहुंचने में देरी क्यों हुई। लेकिन कोलकाता की भारी गर्मी और उमस में हेलमेट पहन कर पीठ पर भारी बस्ता लाद कर समय पर पहुंचना कितना मुश्किल है, यह हम ही समझ सकते हैं।" उन्होंने बताया कि गर्मी के कारण अगर हम कहीं पानी पीने के लिए भी दो मिनट रुक गए तो पचास बातें सुननी पड़ती हैं। इसके अलावा, किसी दिन डिलीवरी कम हुई तो पैसे भी उसी हिसाब से कम मिलते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गिग वर्करों का कहना है कि जानलेवा गर्मी में रोजाना 12 से 14 घंटे तक मेहनत करने के बावजूद महीने के आखिर में ज्यादा कमाई नहीं हो पाती। पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने कमाई कम कर दी है। उनका कहना है कि फिलहाल मौसम उनका सबसे बड़ा दुश्मन है। भारी गर्मी और बारिश में भी दस मिनट के भीतर आर्डर डिलीवरी करने के भारी दबाव के कारण कई बार हादसे हो जाते हैं। लेकिन इससे बचाव के लिए न तो बीमा की सुविधा है और न ही संबंधित प्लेटफॉर्म से कोई सहायता मिलती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दिल्ली में बीते दिनों गिग वर्करों ने 20 रुपए प्रति किलोमीटर की दर तय करने की मांग में हड़ताल भी की थी। वैसे, इससे पहले भी यह लोग देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी विभिन्न मांगों के समर्थन में हड़ताल करते रहे हैं। लेकिन उनकी आर्थिक या सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। असंगठित क्षेत्र में होने के कारण इन लोगों को निश्चित वेतन, दुर्घटना बीमा और सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता है। आईआईटी, दिल्ली के हालिया अध्ययन से भी इसकी पुष्टि होती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	गिग वर्करों पर आईआईटी दिल्ली की स्टडी</h3>
<p>
	आईआईटी दिल्ली ने अपनी ताजा स्टडी रिपोर्ट में कहा है कि भारी गर्मी में रोजाना 12 घंटे से ज्यादा काम करने के बावजूद गिग वर्करों को कोई खास लाभ नहीं मिल रहा है। प्रतिकूल मौसम में लंबे समय तक काम करने के कारण ज्यादातर लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से भी जूझ रहे हैं। अध्ययन के मुताबिक, करीब 56 प्रतिशत गिग वर्कर 12 घंटे से ज्यादा काम करते हैं। संस्थान के ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजुरी प्रिवेंशन सेंटर (ट्रिप) की शोधकर्ताओं की टीम ने दो चरणों में सैकड़ों गिग वर्करों से बात कर अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इससे गिग अर्थव्यवस्था के चमकदार माडल के पीछे छिपी बदहाल तस्वीर का पता चलता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में गिग वर्कर्स को आउटडोर वर्कर्स की श्रेणी में रखने, उनके काम के घंटे तय करने और गर्मी से बचाव के उपाय करने की सिफारिश की गई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल ही में गिग एंड प्लेटफॉर्म सर्विस वर्कर्स यूनियन ने भी दिल्ली सरकार से कहा है कि 40 से 45 डिग्री तापमान और उमस के कारण उनका काम बड़ी चुनौती बना हुआ है। डिलीवरी राइडर्स और बाकी ऐप बेस्ड कर्मचारियों ने दोपहर 12 बजे से तीन बजे के बीच ब्रेक देने, आराम करने के लिए शेड वाली जगह बने, पीने का पानी का इंतजाम करने और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की मांग की है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	वर्करों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की मांग</h3>
<p>
	गिग वर्कर्स के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक ठोस पहल करते हुए कर्नाटक सरकार ने देश का पहला समर्पित डिजिटल शिकायत निवारण तंत्र शुरू किया है। इस कदम से गिग वर्कर के तौर पर काम करने वाले लाखों लोगों को औपचारिक सहायता मिलने की उम्मीद है। इसमें राइड-शेयरिंग, फूड डिलीवरी और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े कामगरों की समस्याओं को ध्यान में रखा गया है। राजस्थान सरकार ने भी गिग वर्कर कल्याण अधिनियम पारित किया है। हरियाणा सरकार भी इस पर विचार कर रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि महज एकाध राज्यों में ऐसी पहल से तस्वीर में कोई खास बदलाव आने की उम्मीद नहीं है। इसके लिए केंद्र सरकार को ठोस कदम उठाते हुए राज्यों और गिग वर्करों की यूनियन से बातचीत कर कानूनी प्रावधान बनाने होंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कई साल गिग वर्कर के तौर पर काम कर चुकी सिलीगुड़ी की मानवाधिकार कार्यकर्ता मौमिता साहा डीडब्ल्यू से कहती हैं। "गिग वर्करों का जीवन आसान बनाने के लिए तैयार होने वाले किसी भी कानून में मानवीय पहलुओं का भी ध्यान रखना होगा। सरकार को यह सोचना होगा कि ऐसे लोग भी इंसान हैं और प्रतिकूल मौसम में उनको भी आराम की जरूरत है। उनके लिए दुर्घटना बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अनिवार्य करना समय की मांग है।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 08:07:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 30 May 2026 08:26:49 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पाकिस्तान की दुविधा: अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़े या दूर रहे?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/donald-trump-demands-pakistan-to-sign-abraham-accords-for-israel-relations-126052900013_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/donald-trump-demands-pakistan-to-sign-abraham-accords-for-israel-relations-126052900013_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/27/thumb/1_1/1779882010-3786.jpg"/>
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      <description><![CDATA[अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित 'अब्राहम अकॉर्ड्स' ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Trump Munir" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/27/full/1779882010-3786.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	<strong>-शामिल शम्स</strong></p>
<p>
	Abraham Accords : अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नई मांग के बाद पाकिस्तान मुश्किल स्थिति में फंस गया है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए होने वाले किसी भी समझौते में पाकिस्तान को इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले तथाकथित &#39;अब्राहम अकॉर्ड्स&#39; पर हस्ताक्षर करने चाहिए। ट्रंप ने सोमवार को कहा कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और कतर जैसे देशों को भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना चाहिए। इस समझौते की शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान हुई थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सोशल मीडिया पोस्ट में ट्रंप ने लिखा, "अमेरिका ने इस जटिल मुद्दे को सुलझाने के लिए जो मेहनत की है, उसके बाद कम से कम इन सभी देशों को एक साथ अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा होना चाहिए।&#39; उन्होंने जिन देशों का नाम लिया उनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (जो पहले से सदस्य है), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन (जो पहले से सदस्य है) शामिल हैं। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सऊदी अरब और कतर को तुरंत इस समझौते पर हस्ताक्षर करने चाहिए। बाकी देशों को भी उनका अनुसरण करना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अब्राहम अकॉर्ड्स अमेरिका की मध्यस्थता में हुए कई समझौतों की श्रृंखला है। इसका उद्देश्य इजराइल और अरब देशों के बीच आर्थिक और राजनयिक रिश्तों को सामान्य बनाना है। इसके तहत पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच हुआ था।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	फायदे और नुकसान पर विचार</h3>
<p>
	कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। लेकिन अब तक सरकार या सेना की ओर से इस पर कोई साफ और एकजुट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस बीच, पाकिस्तान ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रहे संघर्ष को खत्म कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अप्रैल में उसने अमेरिका को 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान पर हमलों को रोकने के लिए राजी कर लिया था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान अब भी युद्ध खत्म कराने की कोशिश कर रहा है। मध्यस्थ की भूमिका निभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति कई बार पाकिस्तान की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने देश के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को अपने &#39;पसंदीदा&#39; लोगों में भी बताया। ट्रंप से बढ़ती नजदीकी की वजह से इस समय पाकिस्तान की वैश्विक अहमियत बढ़ी है। लेकिन ईरान युद्ध में मध्यस्थता करने की तुलना में अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना पाकिस्तान के लिए कहीं ज्यादा मुश्किल होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राजनीतिक विश्लेषक रजा रूमी ने डीडब्ल्यू से कहा, "अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने के फायदे जरूर हैं। लेकिन राजनीतिक तौर पर इन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है। पाकिस्तान को वॉशिंगटन और कुछ खाड़ी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिल जाएगा। साथ ही आर्थिक और तकनीकी अवसर भी खुल सकते हैं।" हालांकि, रूमी ने चेतावनी दी कि इस कदम से पाकिस्तान को बड़े खतरे भी हो सकते हैं। वह कहते हैं, "इससे फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान की स्थिति कमजोर पड़ सकती है, ईरान के साथ तनाव बढ़ सकता है और देश के अंदर अस्थिरता भी बढ़ने की संभावना है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान इजराइल को आधिकारिक तौर पर नहीं मानता और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। हालांकि, पहले दोनों पक्षों के बीच कुछ अनौपचारिक संपर्कों की खबरें सामने आ चुकी हैं। रूमी बताते हैं, "जब तक फिलिस्तीन को अलग देश का दर्जा देने की दिशा में ठोस प्रगति नहीं होती, तब तक इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करना रणनीतिक फैसला कम और दबाव में झुकने जैसा ज्यादा लगेगा। फिलहाल इसके नुकसान, फायदों से ज्यादा दिखाई देते हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	सऊदी अरब का फैसला होगा अहम</h3>
<p>
	पाकिस्तान का अब्राहम समझौते में शामिल होना या न होना इस बात पर निर्भर करेगा कि सऊदी अरब इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। इस्लामाबाद और रियाद के बीच मजबूत कूटनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। साथ ही इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों के संरक्षक के रूप में सऊदी अरब को अधिकांश पाकिस्तानी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। रूमी के अनुसार, "अगर सऊदी अरब पहले कदम उठाता है, तो पाकिस्तान के लिए इस मुद्दे पर बात करना आसान हो जाएगा। लेकिन यह उतना सरल भी नहीं होगा। इस्लामाबाद रियाद के फैसले का इस्तेमाल खुद को ढकने के लिए कर सकता है। पाकिस्तान अक्सर मध्य पूर्व से जुड़े फैसले सऊदी अरब और खाड़ी देशों के रुख को देखकर लेता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विश्लेषक का मानना ​​है कि पाकिस्तान के लिए यह कदम अभी भी जटिल होगा। रूमी बताते हैं, "पाकिस्तान कोई अरब राजशाही नहीं है। यहां की घरेलू राजनीति, धार्मिक दल, मीडिया और फिलिस्तीन के प्रति लोगों का भावनात्मक जुड़ाव इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को कहीं ज्यादा मुश्किल बना देता है। सऊदी अरब का पहला कदम रास्ता खोल सकता है। लेकिन इससे पाकिस्तान के लिए फैसला लेना आसान नहीं हो जाता।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे ट्रंप के सहयोगी देश इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में बढ़ते भी हैं, तो यह तुरंत नहीं होगा। इसके साथ कई शर्तें जुड़ी होंगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ और अमेरिका व संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि पाकिस्तान इस पर तभी विचार कर सकता है, जब एक स्वतंत्र व संयुक्त फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना हो और यरुशलम उसकी राजधानी बने। वह आगे कहती हैं, "यह पाकिस्तान का स्पष्ट रुख है और उसका फैसला किसी दूसरे देश के कदम पर आधारित नहीं होगा।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	6 दिसंबर 2017 को डॉनल्ड ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर यरुशलम को इजराइल की राजधानी के रूप में माना था और अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम ले जाने की घोषणा की थी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	आसान नहीं होगा समाधान</h3>
<p>
	ट्रंप का विरोध करना पाकिस्तान के लिए महंगा पड़ सकता है। पाकिस्तान के अमेरिका के साथ गहरे आर्थिक और सैन्य संबंध हैं जो उसे अपने पडोसी और प्रतिद्वंद्वी देश भारत के साथ भू-रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। अमेरिका पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार भी है। इससे उसकी कमजोर अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा मिलती है। पाकिस्तान यह भी जानता है कि आईएमएफ जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाओं पर वॉशिंगटन का काफी प्रभाव है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान युद्ध की वजह से पाकिस्तान की ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है। इसके शुरू होने के बाद से ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। पाकिस्तान के लिए जरूरी है कि यह युद्ध जल्द खत्म हो जाए। लेकिन ईरान युद्ध के साथ ट्रंप की अब्राहम अकॉर्ड्स वाली मांग ने पाकिस्तान को ऐसी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है, जहां से निकलना मुश्किल होगा। रूमी के मुताबिक पाकिस्तान की सरकार जानती है कि अगर इजराइल के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश की गई, तो देश में इसका भारी विरोध हो सकता है। वह कहते हैं, "धार्मिक पार्टियां, इस्लामी संगठन, दक्षिणपंथी मीडिया और मुख्यधारा के कई राजनीतिक नेता इजराइल को मान्यता देने के फैसले को फिलिस्तीन और पाकिस्तान की विचारधारा के साथ विश्वासघात बताएंगे।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह आगे जोड़ते हैं, "यदि कोई भी सरकार ऐसा कदम उठाती है, तो देश में प्रदर्शन, संसद में आलोचना, धार्मिक नेताओं की तरफ से विरोध और सरकार पर अमेरिका या खाड़ी देशों के दबाव में काम करने के आरोप लग सकते हैं। गाजा युद्ध के बाद लोगों का गुस्सा और बढ़ गया है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पाकिस्तान अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल हो या नहीं, इस मुद्दे पर लिया गया उसका फैसला देश की भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस रिपोर्ट में डीडब्ल्यू के इस्लामाबाद संवाददाता हारुन जंजुआ ने भी योगदान दिया है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 11:27:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 May 2026 11:35:52 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[यह सुझाव देश के हित में है]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/this-suggestion-is-in-the-interest-of-the-country-126052900008_1.html</link>
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      <description><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p>
		<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
			<img align="center" alt="Photo of Prime Minister Narendra Modis foreign trip, Georgia Meloni with Modi in the image" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/20/full/1779245148-8639.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="giorgia meloni selfie with narendra modi" /></p>
	</p>
	<p>
		शरद पवार ने देश की विदेश नीति पर आंतरिक राजनीतिक व्यवहार के संदर्भ में जो कुछ कहा है उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के बाहर देश की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन जब देश के सम्मान की बात आती है तो राजनीतिक मतभेदों को बीच में नहीं लाना चाहिए। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच दिवसीय विदेश यात्रा पर भारत के अंदर राजनीतिक व गैर राजनीतिक मोर्चे पर हो रही टिप्पणियों के संदर्भ में उनका यह मंतव्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त अरब अमीरात से आरंभ कर स्वीडन, नीदरलैंड, ज्नॉर्वे और इटली की द्विपक्षीय यात्रा की तथा नार्वे की राजधानी ओस्लो में स्कैंडिनेवियाई भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुए। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		प्रधानमंत्री के समक्ष अपने राष्ट्रीय हित को साधने का उद्देश्य था और इन यात्राओं पर विशेषज्ञों का मत यही है कि उसमें उन्हें अधिकतम सफलता मिली। किंतु राजनीतिक और गैर राजनीतिक एक्टिविज्म और सोशल मीडिया पर उनके विदेश में रहते हुए ही हमले शुरू हो गए। सारे हमलों‌ व‌ आलोचनाओं के हल्ला बोल में ऐसा एक तथ्य नहीं आया जिसमें बताया गया हो कि अमुक बिंदु पर प्रधानमंत्री ने अपने राष्ट्रीय हित के अनुकूल काम नहीं किया।</p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		जाहिर है कि विरोध केवल राजनीतिक मतभेदों और असहमतियों के इर्द-गिर्द था। यह चिंताजनक है क्योंकि भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर की राजनीतिक असहमतियां और मतभेद सीमाओं से बाहर चला जाए तो राष्ट्रीय हित प्रभावित होता है। इसका अर्थ है कि हम देश हित को प्राथमिकता देने की जगह अपने राजनीतिक, व्यक्तिगत हित को प्राथमिकता दे रहे हैं या फिर हमारा वैचारिक दुराग्रह हावी है।</p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		ऐसा नहीं है कि पवार की मोदी से पूरी तरह सहमति है। महाराष्ट्र में आज शरद पवार की राकांपा शक्तिहीन है तो इसी कारण क्योंकि स्वर्गीय अजीत पवार ने विद्रोह कर भाजपा से हाथ मिला लिया। बावजूद हमारी पारंपरिक राजनीति, जिसका प्रतिनिधित्व करने वाले गिने-चुने नेता रह गए हैं, में यही व्यवहार लंबे समय तक रहा है। देश में हमारी असहमति होती है, आरोप - प्रत्यारोप करते हैं लेकिन जब विदेशों की, अंतरराष्ट्रीय मंच की बात आती है तो देश साथ खड़ा होता है। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		अंतरराष्ट्रीय मंच पर या विदेश में प्रधानमंत्री किसी राजनीतिक दल का नहीं भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहां केवल राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। पत्रकारिता में भी अनेक बार प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के विदेश में दिए बयानों से असहमति होती थी लेकिन वरिष्ठ लोग बताते थे कि विदेश नीति पर हमारी आलोचना का स्वर ऐसा नहीं हो सकता। अपवाद हर समय रहे हैं पर पर वह कभी मुख्य धारा नहीं बना। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		इसलिए ज्यादातर विदेशी यात्राओं या विदेशी मेहमानों के भारत आगमन पर हुए समझौते आदि पर राजनीतिक दलों व मीडिया की ध्वनि एक समान होती थी। जैसे-जैसे राजनीतिक मतभेद बढ़े, भारत और वैश्विक स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं, निहित स्वार्थी संगठनों, समूहों के बीच संपर्क संबंध बढ़ा इस स्वाभाविक व्यवहार में अंतर आता गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता शीर्ष पर आने के बाद यह अतिवाद तक चला गया है। इसी का प्रकटीकरण इस समय दिखा है। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		एक भारतवासी के नाते इस समय हमारा उद्देश्य क्या होना चाहिए? पश्चिम एशिया संकट यानी ईरान अमेरिका इजरायल टकराव और तनाव ने ईंधन आपूर्ति में उथल-पुथल पैदा कर दिया है। हार्मूज जलडमरूमध्य की खतरनाक नाकेबंदी से निपटना विश्व के लिए मुश्किल हो रहा है।<br />
		<br />
		इसमें पेट्रोल डीजल आदि के लिए आयात पर निर्भर भारत या अन्य देशों के लिए दूरगामी दृष्टि से आपूर्ति की सुनिश्चित व्यवस्था करना, देशों के संबंधों में हो रहे बदलावों के साथ सामंजस्य स्थापित करना या अस्थिरता के काल में उसका आधार बनाते रहना तथा भविष्य में बनने वाले अंतरराष्ट्रीय समीकरणों की दृष्टि से ऐसी स्थिति में होना ताकि देश के रूप में हम कहीं अलग-थलग न पड़ें। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		मोटा-मोटी प्रधानमंत्री की यात्रा में यही लक्ष्य समाहित होंगे। इन सबमें यहां विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। आप चाहे भाजपा के सरकार के विरोधी हों या समर्थक दृष्टि एक ही होनी चाहिए कि प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान उन देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडलों की बातचीत, संयुक्त घोषणाओं तथा संपन्न समझौतों में क्या-क्या हुआ? जब आप गहराई से उन सबको देखेंगे तो आपका विचार अपने आप बदल जाएगा। दुर्भाग्य से हम उन पर सरसरी दृष्टि भी डालना नहीं चाहते। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		किसी पत्रकार ने नॉर्वे में दोनों प्रधानमंत्रियों के स्वागत वक्तव्य में निर्धारित प्रोटोकॉल के विपरीत जबरन कैमरे घूमाकर भारत के प्रधानमंत्री से मानवाधिकार एवं प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न पूछे और वह हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया। नॉर्वे के साथ हमारे समझौते, हमारे यहां पेंशन फंड से 28 अरब डॉलर के निवेश की योजना, ब्लू इकोनामी साझेदारी, हरित साझेदारी आदि पर हमने चर्चा नहीं की।<br />
		<br />
		यही नहीं नॉर्दिक भारत शिखर सम्मेलन में औपचारिक रूप से ट्रस्टेड ग्रीन टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप यानी विश्वसनीय हरित तकनीक एवं अन्वेषण रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना और कातिक परिषद में भी पर्यवेक्षक की हैसियत हासिल करना इनके लिए हास्य पर चला गया। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		इसी तरह इटली की यात्रा में प्रधानमंत्री ने पार्ले कंपनी के सामान्य मेलोडी ट्रॉफी वहां की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी को भेंट करते हुए एक रोचक वीडियो पोस्ट किया। इटली के साथ हमारी ठोस विशेष रणनीतिक साझेदारी कायम हुई, भारत और इटली में निर्माण करो तथा विश्व को आपूर्ति करो का ढांचा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत के स्थान की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, अनेक मुद्दों पर हमारे साथ सहमति बनी जिनमें आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष भी है। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		इस यात्रा में स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया और काम करने वाली पत्रकार और कार्टून छापने वाले अखबार के देश नार्वे ने भी। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य और कृषि संगठन ने प्रधानमंत्री को विशेष रूप से सम्मानित किया। इन सब पर चर्चा की जगह हमारे यहां टौफी वीडियो को लेकर ऐसी टिप्पणियां की जा रही है जिनमें कई को देखने सुनने या पढ़ने में शर्म आए। भारत जैसे देश में विमर्श का यह स्तर किसी को भी अंदर से परेशान कर देगा।</p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		क्या हम ऐसा करते समय विचार भी नहीं करते कि एक देश के रूप में विदेश में हमारी कैसी छवि बनेगी? यहीं पर शरद पवार का यह कथन प्रासंगिक हो जाता है कि जब भी राष्ट्रीय हित के लिए सामूहिक रूप से काम करने का मौका मिले तो सभी को एक साझा उद्देश्य के साथ जुड़ना चाहिए और देश की प्रतिष्ठा मजबूत करने में मदद करनी चाहिए। कोई भी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री देश के बाहर होते हैं तो अपने दृष्टिकोण से वह देश के भविष्य और सम्मान को ही केंद्र में रखते हैं। कई बार इनमें गलतियां भी हुई है। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		आज के दौर के अनुसार उनकी आलोचना भी अस्वाभाविक नहीं है किंतु आलोचना तथ्यों के आधार पर होगी। अखिर जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी ट्रॉफी भेंट करने से हमारी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कैसे नुकसान पहुंचा? इटली प्राचीन सभ्यता संस्कृति वाला यूरोप का महत्वपूर्ण और मजबूत देश है।<br />
		<br />
		वर्तमान तनावपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में दो प्रधानमंत्रियों के बीच इस तरह के सहज संबंध, मुस्कान और ठहाके कूटनीति की दुनिया में बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक बार दो नेताओं के बीच सहज सामान्य संवाद निर्मित हो गए तो जटिल से जटिल मुद्दों पर भी सहमति बनती है तथा रास्ता निकल जाता है। दूसरे, इससे हमारे देश के एक सामान्य ब्रांड का भी जबरदस्त विपणन हुआ। इस विषय पर स्थापित अंतरराष्ट्रीय मीडिया की टिप्पणियां देखेंगे तो सकारात्मक भाव पैदा होगा। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		कूटनीति में एक सामान्य वस्तु का उपयोग कर माहौल बदल देना, दुनिया को संदेश देना और उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर व्यवहार का रास्ता दिखा देना सामान्य बात नहीं है। अभी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का चीन दौरा हुआ और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी बातचीत के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए।<br />
		<br />
		इसके बाद रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की चीन यात्रा हुई। दोनों नेताओं के सारे तस्वीर और वीडियो देख लीजिए। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच सामान्य संबंध हैं। बावजूद उनके व्यवहार में सहज मुस्कान नहीं दिखेगा। </p>
	<p>
		 </p>
	<p>
		तनावपूर्ण और अनिश्चितताओं की दुनिया में दो महत्वपूर्ण देश के नेताओं के बीच सरल सहज मुस्कान और संबंध कूटनीति के लिए नया मानक है। कायदे से देश में इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। भारत ने अपने लक्ष्य के अनुरूप यात्रा से सारी उपलब्धियां हासिल की जिसकी ओर तत्काल दृष्टि थी।<br />
		<br />
		दूसरे देश भी अपने हित के अनुसार काम कर रहे थे और उन्हें भी प्राप्त हुआ। पर मूल बात यह है कि हम एक राष्ट्र के रुप में कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? शरद पवार जैसे वरिष्ठ नेता अब ज्यादा उपलब्ध नहीं है कि सामने आकर रास्ता दिखाएं। ज्यादातर जा चुके हैं। हमें ही अपने हर व्यवहार पर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देकर स्वयं को बदलना होगा।</p>
</p>
<br />
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। &#39;वेबदुनिया&#39; इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 09:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 29 May 2026 10:48:51 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>अवधेश कुमार</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अफगानिस्तान में संकटों के बीच महिलाओं पर बढ़ती हिंसा]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/afghanistan-women-domestic-violence-taliban-laws-poverty-forced-marriage-126052800004_1.html</link>
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      <description><![CDATA[बढ़ती गरीबी और तालिबान द्वारा महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां लगाने की वजह से अफगानिस्तान में घरेलू हिंसा बढ़ती जा रही है। हिंसा अब ज्यादा खतरनाक और छिपी हो गई है लेकिन इससे बच पाना ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="afghanistan women" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/28/full/1779939701-7939.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="afghanistan women" width="1200" /></p>
	</p>
	<strong>रजा शिरमोहम्मदी</strong></p>
<p>
	अफगानिस्तान गंभीर मानवीय संकट से गुजर रहा है। देश की आधी आबादी को मदद की जरूरत है। कई परिवार सिर्फ किसी तरह जिंदा रहने की कोशिश कर रहे हैं। भूख, बेरोजगारी और सेवाओं के चरमराने से वे परिवार के सदस्यों पर और ज्यादा निर्भर हो गए हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साल 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से कई सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं जिनकी वजह से महिलाओं की जिंदगी सीमित हो गई है। उनके लिए पढ़ाई, काम करना और बाहर निकलना पहले से बहुत मुश्किल हो गया है। इन हालातों की वजह से घर के अंदर महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से बचना, उसकी शिकायत करना और उसे सामने लाना और भी कठिन हो गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जबरन विवाह और निर्भरता</p>
<p>
	महिला अधिकार कार्यकर्ता और स्थानीय पत्रकार एक पैटर्न की ओर इशारा करते हैं। आर्थिक तंगी के कारण लड़कियों की जबरन और कम उम्र में शादी कर दी जाती है। उनकी अपने पति या ससुराल पर निर्भरता बढ़ जाती है। घरेलू हिंसा अक्सर छिपी रहती है या कम दिखाई देती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब सुरक्षा देने वाली व्यवस्था काम नहीं करती और परिवारों को लगता है कि कोर्ट से भी कोई मदद नहीं मिलेगी, तब हिंसा जानलेवा रूप लेती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अफगानिस्तान के पश्चिमी प्रांत गोर का एक मामला इस परिस्थिति को समझाता है। फरजाना की मौत गोर के पसाबंद जिले में हुई। तब वह केवल 18 साल की थी। स्थानीय स्रोतों ने डीडब्ल्यू को बताया कि उस पर घर के अंदर हमला किया गया था। एक डॉक्टर ने भी बताया कि फॉरेंसिक जांच में फरजाना के शरीर पर पिटाई और यातना के निशान मिले जिससे यह संकेत मिलता है कि उसकी हत्या की गई। फरजाना की शादी 50 वर्ष से अधिक आयु के एक व्यक्ति से हुई थी। उसकी पहले से दो पत्नियां थीं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्थानीय सरकारी कर्मचारी आमिर मोहम्मदी (बदला हुआ नाम) ने डीडब्ल्यू को बताया कि पति के दो बेटों पर फरजाना की हत्या में शामिल होने का आरोप है। मोहम्मदी ने फरजाना के परिवार से बात करने की कोशिश की, लेकिन परिवार ने सहयोग करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि वे गरीब हैं। जबकि हत्या के आरोपी अमीर और प्रभावशाली हैं। मोहम्मदी के मुताबिक यह सामाजिक असमानता भी उतनी ही बड़ी समस्या है जितनी खुद यह हत्या।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह डीडब्ल्यू से कहते हैं, "फरजाना जैसी कई लड़कियां गरीबी, जबरन शादी और बाल विवाह का शिकार हो रही हैं। परिवार अक्सर आर्थिक स्थिरता की उम्मीद में अपनी बेटियों की शादी उम्रदराज और पैसे वाले आदमियों से कर देते हैं। बंद दरवाजों के पीछे इन लड़कियों के साथ हिंसा हो रही है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पत्रकारों का कहना है कि हिंसा की जानकारी होने के बावजूद भी ऐसे मामले शायद ही कभी सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुंच पाते हैं। नाम न बताने की शर्त पर अफगानिस्तान के एक स्थानीय पत्रकार ने डीडब्ल्यू से कहा, "अब रिपोर्टिंग करना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। तालिबान ने पत्रकारों और मीडिया पर बहुत सख्त नियम लगा दिए हैं। कोई भी इन मामलों पर रिपोर्ट करने की हिम्मत नहीं करता।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भय और सत्ता के बल पर रुका हुआ न्याय</p>
<p>
	सामाजिक दबाव भी एक बड़ी वजह है। परिवार डर, बदनामी और प्रतिशोध के डर से शिकायत दर्ज कराने से बचते हैं। अगर शिकायत दर्ज भी हो जाए, तो कई बार जांच में देरी हो सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गोर प्रांत के एक तालिबान अधिकारी ने, मीडिया से बात करने की अनुमति न होने के कारण नाम गुप्त रखते हुए, डीडब्ल्यू से बात की। वह बताते हैं कि एक युवती की हत्या के आरोप में पिता और उसके दो बेटों को गिरफ्तार किया गया है। मामले की जांच चल रही है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि स्थानीय पत्रकार ने बताया कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है जिससे पता चलता है कि इस तरह के मामलों में आरोपी बाद में कबायली बुजुर्गों की मध्यस्थता से रिहा कर दिए गए। अक्सर पैसों के बदले समझौता कर दिया जाता है और इसमें पीड़ित परिवार की सहमति शामिल होती है। यह दिखाता है कि खासकर दूर-दराज इलाकों में आज भी अनौपचारिक न्याय व्यवस्था का कितना प्रभाव है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कानूनी व्यवस्था महिलाओं की सुरक्षा को कमजोर करती है</p>
<p>
	अधिकार समूहों के लिए तालिबान के तहत लागू कानूनी व्यवस्था बड़ी चिंता का विषय है। तालिबान नेता हैबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा हस्ताक्षरित एक "आपराधिक प्रक्रिया दस्तावेज" अफगानिस्तान की सभी अदालतों में भेज दिया गया। अफगान मानवाधिकार संगठन "रावदारी" ने इसपर चिंता जताई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रावदारी ने इस दस्तावेज की सामग्री को "बेहद चिंताजनक" बताया और कहा कि यह "अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों और निष्पक्ष सुनवाई के मूल सिद्धांतों के साफ खिलाफ है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रावदारी के अनुसार अदालतों के लिए बनाए गए आपराधिक प्रक्रिया कानून के अनुच्छेद 32 में कहा गया है कि अगर पति किसी महिला को डंडे से मारता है, उसे गंभीर चोट, जैसे घाव या शरीर पर गहरे निशान पड़ते हैं और महिला इसे अदालत में साबित कर देती है, तभी पति को 15 दिन की जेल हो सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रावदारी ने यह भी कहा कि इस कानून में मानसिक, शारीरिक या यौन हिंसा के अन्य प्रकारों को साफ तौर पर अपराध नहीं बताया गया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकार का इनकार और बढ़ती वैश्विक चिंता</p>
<p>
	तालिबान के अधिकारियों ने इस बात को खारिज किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सहन किया जाता है। गोर प्रांत में तालिबान के सूचना और संस्कृति विभाग के प्रमुख अब्दुल हाई जईम ने डीडब्ल्यू को बताया कि अधिकारियों को पसाबंद में सामने आए मामलों के बारे में बताया नहीं गया और उनके पास कोई जानकारी नहीं है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने कहा कि "इस्लामिक अमीरात" महिलाओं की शिकायतों पर कार्रवाई करता है और कानून के अनुसार दोषियों को अदालत के जरिए सजा दी जाती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग मीडिया के पास जाकर समस्याएं पैदा करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जईम ने जोर दिया कि इस्लामी कानून में हत्या करना मना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकारी दावों और लोगों की असल जिंदगी की स्थिति के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। बढ़ता मानवीय संकट इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि तालिबान द्वारा लगाए गए व्यापक प्रतिबंध महिलाओं की कमजोर स्थिति का मुख्य कारण हैं। अफगानिस्तान पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर 2025 की रिपोर्ट में कहा गया कि तालिबान शासन महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव की संस्थागत व्यवस्था बना रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसमें बताया गया कि महिलाओं और लड़कियों को सार्वजनिक जीवन से अलग किया जा रहा है। उनसे शिक्षा, काम और आने-जाने की आजादी जैसे बुनियादी अधिकार छीन लिए गए हैं। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि कई महिलाओं की मौतें हो रही हैं जिन्हें रोका जा सकता था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अपना नाम गुप्त रखते हुए एक स्थानीय पत्रकार ने डीडब्ल्यू से कहा, "अगर एक छोटे से जिले में कुछ दिनों के भीतर दो महिलाओं की हत्या हो सकती है, तो पूरे देश में सालाना महिलाओं की हत्या के कितने मामले होते होंगे?"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अफगानिस्तान में इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है। वजह यह नहीं कि हिंसा कम होती है, बल्कि ऐसी कई घटनाएं छिपी रह जाती हैं और सामने नहीं आ पातीं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 08:59:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 28 May 2026 09:12:06 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कॉकरोच से नहीं, NEET से लेकर CBSE तक के सिस्टम को खोखला कर चुके घुन से डरो]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/editorial-articles/neet-paper-leak-cbse-education-system-crisis-126052700028_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/27/thumb/1_1/1779869894-8795.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/27/thumb/1_1/1779869894-8795.jpg</image>
      <description><![CDATA[मई 2026 की गर्मी सिर्फ मौसम की नहीं थी। 3 मई को NEET-UG परीक्षा देने वाले 22.8 लाख से ज्यादा छात्रों के सपनों में भी आग लगी हुई थी। देशभर के लाखों घरों में उम्मीद, तनाव और भविष्य एक ही दिन पर टिके थे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद खबर आई—परीक्षा पर सवाल ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="NEET Paper Leak 2026" class="imgCont" height="700" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/27/full/1779869894-8795.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
</p>
<br />
<strong>डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था,</strong><strong> “</strong><strong>शिक्षा वह शेरनी का दूध है, </strong><strong>जो पिएगा वह दहाड़ेगा।”</strong> लेकिन आज का शिक्षा तंत्र बच्चों को दहाड़ना नहीं, डरना सिखा रहा है।<br />
<br />
मई 2026 की गर्मी सिर्फ मौसम की नहीं थी। 3 मई को NEET-UG परीक्षा देने वाले 22.8 लाख से ज्यादा छात्रों के सपनों में भी आग लगी हुई थी। देशभर के लाखों घरों में उम्मीद, तनाव और भविष्य एक ही दिन पर टिके थे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद खबर आई—परीक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल “Guess Paper” के सैकड़ों सवाल असली प्रश्नपत्र से मेल खाते पाए गए। मामला इतना गंभीर हुआ कि CBI जांच शुरू करनी पड़ी। जांच की परतें खुलीं तो साजिश NTA से जुड़े शिक्षकों, स्कूल प्रिंसिपलों, डॉक्टरों और कोचिंग नेटवर्क तक जा पहुंची। लाखों रुपए में पेपर बिके और ईमानदारी से पढ़ने वाले बच्चे फिर एक बार अनिश्चितता, तनाव और तैयारी के उसी अंतहीन चक्र में धकेल दिए गए।<br />
<br />
यह सिर्फ एक परीक्षा का संकट नहीं था। यह उस व्यवस्था का चेहरा था जो बच्चों को यह भरोसा दिलाती है कि मेहनत करो, सपने पूरे होंगे—लेकिन हर पेपर लीक के बाद वही व्यवस्था उन्हें सिखाती है कि इस देश में मेहनत से ज्यादा ताकत “सिस्टम” की है।<br />
<br />
2024 में भी NEET पेपर लीक और टॉपर विवाद ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन 2026 ने साबित कर दिया कि सिस्टम ने कोई सबक नहीं सीखा। बिहार से राजस्थान, महाराष्ट्र से दिल्ली तक—हर जगह वही पैटर्न दिखाई दिया। सीकर से शुरू हुए “Guess Paper” व्हाट्सऐप और टेलीग्राम के जरिए देशभर में फैल गए। CBI ने पुणे के प्रोफेसर, स्कूल प्रिंसिपल और डॉक्टरों तक को गिरफ्तार किया। एक आरोपी का बेटा बोर्ड परीक्षा में मुश्किल से 50% अंक ला पाया, लेकिन NEET में “सफल” होने की तैयारी में था।<br />
<br />
और दूसरी तरफ?  एक ईमानदार छात्र—जो दो-दो साल ड्रॉप लेकर पढ़ रहा है, परिवार कर्ज में डूबा है, मां के गहने बिक चुके हैं, पिता ओवरटाइम कर रहे हैं—उसे फिर बताया जाता है:  “अगले साल कोशिश करो।” यही आज के भारत की सबसे बड़ी शैक्षणिक त्रासदी है।<br />
<br />
यह सिर्फ एक परीक्षा का संकट नहीं। यह उस देश का संकट है जो अपने युवाओं को “मेरिट” का सपना दिखाता है, लेकिन उन्हें एक ऐसे सिस्टम के हवाले कर देता है जहां मेहनत और ईमानदारी से ज्यादा कीमत नेटवर्क, पैसे और जुगाड़ की होती जा रही है।<br />
<h3>
	<strong>NEET: </strong><strong>परीक्षा कम</strong><strong>, </strong><strong>राष्ट्रीय तनाव ज्यादा</strong></h3>
2026 में NEET-UG के लिए लगभग 22 लाख छात्रों ने आवेदन किया। लेकिन सरकारी MBBS सीटें अब भी बेहद सीमित हैं। इसका मतलब यह है कि करोड़ों परिवारों का भविष्य एक तीन घंटे की परीक्षा पर टिका हुआ है।<br />
यहीं से शुरू होता है भारत का सबसे बड़ा शिक्षा उद्योग:<br />
<ul>
	<li>
		कोटा, इंदौर, दिल्ली, सीकर और हैदराबाद जैसे शहरों की कोचिंग फैक्ट्रियां</li>
	<li>
		लाखों रुपए की फीस</li>
	<li>
		ड्रॉप ईयर का दबाव</li>
	<li>
		AIR रैंक की सोशल मीडिया संस्कृति</li>
	<li>
		और मानसिक टूटन</li>
</ul>
<strong>जब अवसर कम और प्रतिस्पर्धा गलाकाट बन जाए</strong><strong>, </strong><strong>तब परीक्षा शिक्षा नहीं रहती</strong><strong>—</strong><strong>जीवन-मरण का युद्ध बन जाती है।</strong><br />
<br />
2024 में भी NEET पेपर लीक और टॉपर विवाद ने देश को झकझोर दिया था। 2026 में फिर वही पैटर्न सामने आया। बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और दिल्ली तक जांच की आंच पहुंची। CBI ने शिक्षकों, स्कूल प्रिंसिपलों और मेडिकल नेटवर्क से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया। यह सिर्फ अपराध नहीं था—यह व्यवस्था के भीतर बैठे भ्रष्ट गठजोड़ का संकेत था।<br />
<h3>
	<strong>यह सिर्फ पेपर लीक नहीं</strong><strong>, </strong><strong>भरोसे की हत्या है</strong></h3>
जब कोई परीक्षा लीक होती है, तो सिर्फ प्रश्नपत्र बाहर नहीं आता—व्यवस्था का नैतिक दिवालियापन भी बाहर आ जाता है।<br />
<br />
आज का छात्र यह देख रहा है कि:<br />
<ul>
	<li>
		कोई लाखों रुपए देकर पेपर खरीद सकता है</li>
	<li>
		कोई नेटवर्क के जरिए “एडवांटेज” हासिल कर सकता है</li>
	<li>
		और ईमानदार छात्र सिर्फ दोबारा तैयारी करने की सलाह पाता है</li>
</ul>
धीरे-धीरे यह भावना पैदा हो रही है कि मेहनत जरूरी है, लेकिन सफलता के लिए यह पर्याप्त नहीं। यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि <strong>जब युवा अपने ही सिस्टम पर भरोसा खोने लगें</strong><strong>, </strong><strong>तब सिर्फ शिक्षा व्यवस्था नहीं टूटती</strong><strong>—</strong><strong>सामाजिक विश्वास भी कमजोर होने लगता है।</strong> 
<h3>
	<strong>CBSE: </strong><strong>अंकों की चमक</strong><strong>, </strong><strong>अंदर से असुरक्षा</strong></h3>
संकट सिर्फ NEET तक सीमित नहीं है। CBSE और अन्य बोर्ड परीक्षाओं में भी लगातार तकनीकी और प्रशासनिक सवाल उठ रहे हैं। ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन में त्रुटियां, ब्लर्ड स्कैन, री-इवैल्यूएशन विवाद, उत्तर पुस्तिकाओं को लेकर शिकायतें—ये घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। स्कूलों में 95% और 98% अंक सामान्य हो चुके हैं, लेकिन वही छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल हो रहे हैं। इससे दो गंभीर सवाल पैदा होते हैं:<br />
<ul>
	<li>
		क्या बोर्ड मूल्यांकन वास्तविक सीखने को माप रहा है?</li>
	<li>
		या हम सिर्फ “मार्क्स इन्फ्लेशन” का एक भ्रम पैदा कर चुके हैं?</li>
</ul>
नई शिक्षा नीति क्रिटिकल थिंकिंग और स्किल-बेस्ड लर्निंग की बात करती है, लेकिन जमीन पर पूरा तंत्र अब भी रटंत संस्कृति और परीक्षा-केंद्रित मानसिकता से संचालित है।<br />
<h3>
	<strong>कोचिंग अर्थव्यवस्था ने बचपन निगल लिया</strong></h3>
भारत में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के आसपास हजारों करोड़ रुपए की कोचिंग अर्थव्यवस्था खड़ी हो चुकी है। कई शहर अब शिक्षा केंद्र कम, दबाव केंद्र ज्यादा लगते हैं। कोटा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां विद्यार्थी:<br />
<ul>
	<li>
		16-18 घंटे पढ़ रहे हैं</li>
	<li>
		परिवार से दूर रह रहे हैं</li>
	<li>
		सोशल मीडिया पर तुलना झेल रहे हैं</li>
	<li>
		और असफलता के डर के साथ जी रहे हैं</li>
</ul>
आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं। वे शिक्षा मॉडल के खिलाफ आरोपपत्र हैं। लेकिन हमने इस पीड़ा को भी सामान्य बना दिया है। खबर आती है। बहस होती है। फिर अगली परीक्षा की तैयारी शुरू हो जाती है।<br />
<h3>
	<strong>क्या डिजिटल परीक्षा ही समाधान है</strong><strong>?</strong></h3>
सरकार ने 2027 से कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) लागू करने का संकेत दिया है। तकनीक पारदर्शिता बढ़ा सकती है, लेकिन तकनीक अपने आप नैतिकता नहीं ला सकती।<br />
अगर:<br />
<ul>
	<li>
		पेपर सेटिंग प्रक्रिया कमजोर हो,</li>
	<li>
		संस्थागत जवाबदेही अस्पष्ट हो,</li>
	<li>
		और कोचिंग नेटवर्क सिस्टम के भीतर तक प्रभाव रखते हों, तो डिजिटल मॉडल सिर्फ भ्रष्टाचार का नया रूप बन सकता है।</li>
</ul>
सरकार कहती है सुधार हो रहे हैं—2027 से कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट। लेकिन क्या डिजिटल होना ही समाधान है? जब पेपर सेट करने वाले ही लीक कर रहे हों, जब कोचिंग माफिया NTA अंदरूनी सूत्रों से जुड़े हों, तब तकनीक भी सिर्फ नया रास्ता बनाती है। <strong>Vyapam </strong><strong>से लेकर </strong><strong>UGC-NET </strong><strong>तक</strong><strong>, </strong><strong>भारत में परीक्षा घोटालों की लिस्ट लंबी है। </strong>हर बार “CBI जांच, गिरफ्तारी, नई तारीख” का चक्र चलता है। समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं—संस्थागत संस्कृति की है।<br />
<h3>
	<strong>असली सवाल: हम बच्चों से चाहते क्या हैं</strong><strong>?</strong></h3>
क्या हम चाहते हैं कि 17 साल का बच्चा अपनी पूरी किशोरावस्था सिर्फ 720 नंबरों के लिए दांव पर लगा दे?  क्या सफलता का मतलब सिर्फ MBBS और IIT ही रह गया है?<br />
<br />
भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों से सपने नहीं, प्रदर्शन मांगने लगा है। और शिक्षा व्यवस्था ने भी<strong> बच्चों को इंसान नहीं</strong><strong>, “</strong><strong>रैंक</strong><strong>” </strong><strong>में बदलना शुरू कर दिया है।</strong> डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम युवाओं से सपने देखने को कहते थे। लेकिन आज लाखों छात्रों की स्थिति यह है कि सपने उन्हें प्रेरित नहीं, भयभीत कर रहे हैं।<br />
एक गरीब छात्र रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोकर तैयारी करता है। एक मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज लेकर कोचिंग कराता है। और जब सिस्टम विफल होता है, तब सबसे पहले उसी छात्र से कहा जाता है— “मेहनत और करनी चाहिए थी।”<br />
<h3>
	<strong>अब सुधार नहीं</strong><strong>, </strong><strong>पुनर्निर्माण चाहिए</strong></h3>
सवाल सिर्फ NTA का नहीं। पूरा परीक्षा मॉडल पुनर्विचार मांग रहा है। जरूरत है:<br />
<ul>
	<li>
		परीक्षा प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण की</li>
	<li>
		NTA जैसी संस्थाओं की स्वतंत्र जवाबदेही तय करने की</li>
	<li>
		कोचिंग उद्योग पर सख्त रेगुलेशन और फीस कैप लगाने की</li>
	<li>
		मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाने की</li>
	<li>
		बोर्ड परीक्षा और एंट्रेंस मॉडल के बीच बेहतर संतुलन बनाने की</li>
	<li>
		और सबसे महत्वपूर्ण—एक ही करियर को “सफलता” मानने की मानसिकता बदलने की</li>
</ul>
भारत को डॉक्टर और इंजीनियर चाहिए। लेकिन उससे पहले भारत को मानसिक रूप से सुरक्षित बच्चे चाहिए।
<h3>
	<strong>बच्चों की आवाज सुननी होगी</strong></h3>
आज बच्चे सिर्फ परीक्षा से नहीं लड़ रहे। वे उस व्यवस्था से भी लड़ रहे हैं जो धीरे-धीरे उन्हें यह सिखा रही है कि ईमानदारी पर्याप्त नहीं है। यह बेहद खतरनाक संदेश है।<br />
<br />
सरकार को कॉकरोच से नहीं, उस घुन से डरना चाहिए जो शिक्षा व्यवस्था को भीतर से खा रहा है। क्योंकि अगर युवा पीढ़ी का भरोसा टूट गया, तो सिर्फ परीक्षाएं नहीं टूटेंगी—देश का सामाजिक ताना-बाना भी टूटने लगेगा।<br />
बच्चे चीख रहे हैं— “हमारी गुहार सुनो।” बच्चे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं, लेकिन व्यवस्था अक्सर उनकी बेचैनी को राजनीतिक शोर मानकर खारिज कर देती है।<br />
<br />
उन्हें सिर्फ अगली परीक्षा की तारीख नहीं चाहिए। उन्हें एक ऐसा सिस्टम चाहिए जिस पर वे भरोसा कर सकें। <strong>नेल्सन मंडेला ने कहा था</strong><strong>,</strong> <strong>“</strong><strong>शिक्षा दुनिया को बदलने का सबसे शक्तिशाली हथियार है।</strong><strong>”</strong> लेकिन अगर वही शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार, लीक और अविश्वास से भर जाए, तो वही हथियार समाज के खिलाफ भी काम करने लगता है। याद रखिए, जिस देश के युवा अपने ही सिस्टम पर भरोसा खो दें, वहां सिर्फ शिक्षा नहीं टूटती—लोकतंत्र भी कमजोर होने लगता है।<br />
<p>
	<span style="font-size:12px;"><strong>(नोट : यह लेख विद्यार्थियों की मानसिक स्थिति और शिक्षा व्यवस्था पर सार्वजनिक बहस के लिए लिखा गया है।)</strong></span></p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 13:36:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 27 May 2026 14:08:31 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[editorial]]></category>
      <authorname>संदीप सिंह सिसोदिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गर्म होती जलवायु के कारण हिमालयी नदियां हुईं और अस्थिर]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/himalayan-rivers-changing-course-fast-global-warming-science-journal-study-126052700004_1.html</link>
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      <description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियां खतरनाक रूप से अस्थिर होकर तेजी से अपना मार्ग बदल रही हैं। चीनी शोधकर्ताओं की एक टीम के अध्ययन से इसका पता चला है।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="himalaya" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-08/09/full/1754706162-5193.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	प्रभाकर मणि तिवारी</p>
<p>
	हिमालय को &#39;एशिया का वाटर टावर&#39; कहा जाता है। यह जिन नदियों को पानी की आपूर्ति करता है उस पर भारत समेत विभिन्न देशों के करीब दो अरब लोग निर्भर हैं। लेकिन एक ताजा अध्ययन से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले मौसमी बदलावों के कारण इन नदियों और उनके किनारे बसे इलाकों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। चीनी शोधकर्ताओं की यह स्टडी रिपोर्ट &#39;साइंस&#39; जर्नल के 14 मई के अंक में छपी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नदियों के बहाव में इस बदलाव का भारत पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ने का अंदेशा है। हिमालय से निकलने वाली भारतीय नदियों को मुख्य रूप से तीन बड़ी नदी प्रणालियां--सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र  में बांटा गया है। इन तीनों में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और तीस्ता समेत करीब 19 प्रमुख और सहायक नदियां शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कितनी बड़ी है ये स्टडी</h3>
<p>
	चीन में बीजिंग स्थित चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ जियोसाइंसेज और सिचुआन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की  एक टीम की ओर से वर्ष 1980 से 2020 यानी बीते चार दशकों के सैटेलाइट आंकड़ों, तस्वीरों और जमीनी अध्ययन से पता चला है कि ग्लेशियरों और जमी हुई जमीन के पिघलने के कारण हिमालय से निकलने वाली नदियां पहले के मुकाबले दोगुनी तेजी से अपना रास्ता बदल रही हैं। इससे बाढ़ और तट-कटाव के अलावा सड़कों, पुलों और दूसरे आधारभूत ढांचों को भारी नुकसान का खतरा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वैज्ञानिकों की इस टीम में चाइना जियोसाइंस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चेंगशान वांग और डॉ. जोंगपेंग हान के अलावा सिचुआन यूनिवर्सिटी के डॉ. लिन जिपेंग शामिल थे। इस टीम ने हिमालय से निकलने वाली नदियों पर जलवायु परिवर्तन के असर को समझने के लिए बीते चार दशकों के दौरान तीन प्रमुख हिमालयी घाटियों में नदियों की गति में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट के मुताबिक, मैदानी इलाकों में नदियों के बहाव के तरीके पता चलता है कि पर्यावरणीय बदलावों की उन पर कैसी प्रतिक्रिया होती है। यह बदलाव नदी की गति, बाढ़, कटाव, बढ़ती गाद और नदी तटों की स्थिरता को भी प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन रिपोर्ट में डॉ. हान ने कहा है, "ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और नदी की धारा के बदलाव का परस्पर मजबूत संबंध है।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	हिमालय में तेजी से बढ़ता तापमान</h3>
<p>
	चीनी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी इलाके में तापमान वैश्विक औसत के मुकाबले दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। इसका चेन रिएक्शन अब नदियों और इलाके के पारिस्थितिकी तंत्र पर साफ नजर आने लगा है। उन्होंने कहा है कि नदियों के बहाव पर जलवायु परिवर्तन के असर का पता लगाने के लिए हिमालयी नदियां सबसे आदर्श हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह टीम दुनिया भर में नदियों के करीब आठ लाख मोड़ का अध्ययन और हिमालयी नदियों के साथ उनकी तुलना के बाद इस नतीजे पर पहुंची कि जलवायु परिवर्तन के प्रति उनकी (हिमालयी नदियों की) संवेदनशीलता वैश्विक औसत से लगभग आठ गुना ज्यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अध्ययन के नतीजों से चीन के किंघाई-जिजांग पठार पर जलवायु अनुकूलन रणनीति बनाने के अलावा बाढ़ की रोकथाम और पारिस्थितिकी संरक्षण प्रयासों और पूरी दुनिया में पर्वतीय हिमनद से निकलने वाली नदियों के प्रबंधन में काफी मदद मिल सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चीनी वैज्ञानिकों की टीम ने हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों के करीब 1582 किलोमीटर लंबे इलाके में एक हजार से ज्यादा मोड़ का अध्ययन किया। इसके तहत यह पता लगाया गया कि बीते चार दशकों में इन मोड़ों का स्वरूप कितना बदला है और वो अपनी जगह से कितनी दूर हटे हैं। इससे पता चला कि इस दौरान नदियों की गति तेजी से बढ़ी है और उनका रास्ता भी बदला है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	जलवायु परिवर्तन व बढ़ते तापमान का असर</h3>
<p>
	वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती दौर में तो ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों का जलस्तर बढ़ेगा। लेकिन यह सिलसिला जारी रहा तो इससे बाढ़ का खतरा तो बढ़ेगा ही, तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों, खेती और बुनियादी ढांचे पर भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। इसके अलावा नदियों के पानी में ज्यादा मिट्टी और पत्थर आने के कारण उन पर बनी पनबिजली योजनाओं के लिए भी खतरा पैदा हो सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि नदियों की गति में इस बदलाव का जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों और जमी हुई जमीन के पिघलने के साथ सीधा संबंध है। नदियों में पानी के साथ-साथ गाद की मात्रा भी बढ़ रही है। इससे नदियां पहले के मुकाबले ज्यादा अस्थिर हो गई हैं। बहाव की गति बढ़ने के कारण नदियां अपने किनारों को काट रही हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रोफेसर वांग ने कहा है, "अध्ययन रिपोर्ट से नदियों की गति में बदलाव की जो बात सामने आई है उससे हिमालयी जल स्त्रोतों पर निर्भर अरबों लोगों के सामने जल सुरक्षा और बाढ़ संबधी खतरा पैदा हो सकता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमालयी क्षेत्र में दीर्घकालिक जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और आधारभूत ढांचा तैयार करते समय जलवायु में बदलाव के कारण नदियों की गति-प्रकृति में होने वाले बदलावों  को ध्यान में रखना जरूरी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शोधकर्ताओं ने कहा है कि पेड़-पौधों की गैरमौजूदगी हिमालय को खास तौर पर संवेदनशील बनाती है। इसी वजह से जमी हुई जमीन के पिघलने पर नदी के किनारे को उनकी जगह पर रोकना संभव नहीं हो रहा है। इससे नदियां आसानी से अपना रास्ता बदल लेती हैं।</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	भारत पर असर</h3>
<p>
	नदियों की गति में इस बदलाव का भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ने का अंदेशा है। विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर हिमालयी नदियों के किनारे बसा देश का पूर्वोत्तर इलाके पर सबसे ज्यादा खतरा है। यह इलाका पहले ही हर साल बाढ़ के गंभीर संकट से जूझ रहा है। लेकिन ताजा अध्ययन रिपोर्ट को ध्यान में रखें तो निकट भविष्य में यह खतरा कई गुना बढ़ सकता है। इलाके के कासकर अरुणाचल प्रदेश में हिमालय से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर दर्जनों पनबिजली परियोजनाएं बनी हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अरुणाचल प्रदेश की नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र और जल गुणवत्ता पर वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले डॉ. तालेक गपाक डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ताजा अध्ययन इस इलाके के लिए खतरे की घंटी है। केंद्र और राज्य सरकार को इसके नतीजों को ध्यान में रखते हुए इस संभावित खतरे से निपटने के लिए दीर्घकालीन नीति तैयार करनी चाहिए।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	असम में बाढ़ नियंत्रण के विशेषज्ञ जतिन बरुआ डीडब्ल्यू से कहते हैं, "असम में बाढ़ का खरता पहले से ही गंभीर है। हर साल इसकी चपेट में जान-माल का भारी नुकसान होता है। लेकिन असली खतरा तो निकट भविष्य में आने की आशंका है। अगर समय रहते इससे निपटने की ठोस योजना नहीं बनाई गई तो जान-माल का अभूतपूर्व नुकसान होने की आशंका बनी रहेगी।"</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 09:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 27 May 2026 09:15:45 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[NEET जैसी परीक्षा कराना कैसे बन गई सरकार के लिए चुनौती?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/neet-paper-leak-nta-statement-parliamentary-committee-online-exam-challenges-126052600013_1.html</link>
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      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/thumb/1_1/1778576419-9009.jpg</image>
      <description><![CDATA[NEET परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा सरकार भले ही कर चुकी हो लेकिन इसके खिलाफ देश भर में छात्र और युवा प्रदर्शन कर रहे हैं। परीक्षा रद्द करने की वजह ये है कि प्रश्नपत्र लीक हो गए थे लेकिन संसदीय समिति के सामने परीक्षा कराने वाली एजेंसी एनटीए के जो ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="NEET Paper Leak" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/full/1778576419-9009.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	समीरात्मज मिश्र</p>
<p>
	NEET परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा सरकार भले ही कर चुकी हो लेकिन इसके खिलाफ देश भर में छात्र और युवा प्रदर्शन कर रहे हैं। परीक्षा रद्द करने की वजह ये है कि प्रश्नपत्र लीक हो गए थे लेकिन संसदीय समिति के सामने परीक्षा कराने वाली एजेंसी एनटीए के जो बयान मीडिया में सामने आए हैं, उससे यह मामला और गरम हो गया है। समाचार एजेंसी एएनआई के हवाले से कई मीडिया संस्थानों ने लिखा है कि नीट पेपर लीक मामले में संसदीय समिति के सामने एनटीए के डीजी और चेयरमैन ने कहा है कि परीक्षा लीक नहीं हुई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एएनआई के मुताबिक, "NEET पेपर लीक विवाद को लेकर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए के महानिदेशक अभिषेक सिंह और एनटीए चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी 21 मई को संसद की समिति के सामने पेश हुए। सूत्रों के मुताबिक बैठक के दौरान NTA प्रमुख ने एजेंसी का बचाव करते हुए दावा किया कि पेपर NTA के सिस्टम से लीक नहीं हुए थे। जब संसदीय समिति ने अधिकारियों से सीधा सवाल किया कि इस लीक के लिए आखिर जिम्मेदार कौन हैं, तो NTA प्रमुख ने जवाब दिया कि वे इसका सटीक जवाब सीबीआई की जांच पूरी होने के बाद ही दे पाएंगे।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एनटीए ही वह संस्था है, जो नीट और इस तरह की करीब 15 परीक्षाएं आयोजित करती है। नीट-यूजी 2026 पेपर लीक मामले की जानकारी लेने के लिए एनटीए के महानिदेशक और चेयरमैन को संसदीय समिति के सामने बुलाया गया था। नीट यूजी की परीक्षा इसी महीने तीन मई को हुई थी, लेकिन पेपर लीक होने के बाद 11 मई को परीक्षा रद्द कर दी गई। फिलहाल पेपर लीक मामले की जांच सीबीआई कर रही है। दोबारा परीक्षा 21 जून को होगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मामले की जांच कर रही सीबीआई ने अब तक महाराष्ट्र और राजस्थान से कम से कम नौ लोगों को गिरफ्तार भी किया है जिसमें कुछ कोचिंग संस्थानों के मालिक और शिक्षक भी शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	राज्यों का विरोध</h3>
<p>
	नीट परीक्षा में हुई धांधली के चलते कई राज्य अब इस परीक्षा पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं, खासकर दक्षिण भारत के राज्य। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने तो बारहवीं की परीक्षा के अंकों के आधार पर ही प्रवेश का सुझाव दिया है, वहीं केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने तो इसे खत्म करने की ही मांग कर डाली है। जहां तक बारहवीं के अंकों के आधार पर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश की बात है तो जानकारों का कहना है कि अलग-अलग राज्यों और केंद्रीय बोर्डों के अंकों में असमानता और अलग पैटर्न के कारण यह तरीका बहुत व्यावहारिक नहीं होगा। ऐसी दिक्कतों को दूर करने के लिए ही प्रवेश परीक्षा की शुरुआत हुई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इधर, नीट परीक्षा दोबारा कराने की घोषणा करने के साथ ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि अगले साल से यह परीक्षा ऑनलाइन कराई जाएगी जिसमें परीक्षा का मोड सीबीटी यानी कंप्यूटर बेस्ड टेस्टिंग होगा। लेकिन सवाल ये हैं कि क्या ऑनलाइन तरीका अपना कर ही परीक्षा पारदर्शी हो सकती है क्योंकि अभी भी कई परीक्षाएं ऑनलाइन होती हैं लेकिन उनमें भी धांधली की शिकायतें आती रहती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कब बनी एनटीए?</h3>
<p>
	साल 2017 से पहले देश में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई अखिल भारतीय स्तर पर प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था जबकि अलग-अलग राज्यों के बोर्ड अपने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए के लिए अलग प्रवेश परीक्षाएं कराते थे। कुछ विश्वविद्यालय भी अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करते थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन साल 2017 में उच्च शिक्षा के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा व्यवस्था में सख्ती, मानकीकरण और विश्वसनीयता लाने के मकसद से अखिल भारतीय स्तर पर NEET यानी &#39;नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंट्रेंस टेस्ट&#39; की व्यस्था शुरू हुई और इसे कराने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को दी गई। यह एजेंसी 15 से अधिक परीक्षाएं आयोजित कराती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लेकिन बनने के बाद से ही एनटीए लगातार विवादों में घिरी रही है। अभी दो साल पहले भी यूजीसी-नेट परीक्षा को लेकर सवाल उठे थे और पेपर लीक के आरोप लगे थे। उस वक्त भी पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। 2024 में भी नीट परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र लीक होने की खबरें सामने आई थीं। बिहार और गुजरात के गोधरा समेत कई केंद्रों पर पेपर बेचे जाने और नकल कराने के पुख्ता सबूत मिले, जिसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कैसी मुश्किलें आ रही हैं?</h3>
<p>
	जानकारों का कहना है कि 22-23 लाख छात्रों की परीक्षा एक साथ कराना आसान नहीं है लेकिन यदि परीक्षा कराई जा रही है तो जिम्मेदारी भी होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय भी होनी चाहिए। दीपिका सिंघल दिल्ली की एक कोचिंग में नीट के छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं और बॉटनी पढ़ाती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहती हैं, "इंजीनियरिंग की कई परीक्षाएं अब ऑनलाइन हो रही हैं। कई प्रतियोगी परीक्षाएं भी ऑनलाइन होती हैं। ऐसे में नीट भी ऑनलाइन हो तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि क्या सिर्फ ऑनलाइन परीक्षा करा लेने भर से पारदर्शिता आ जाएगी। धांधली की गुंजाइश तब भी बनी रहेगी। इसलिए सबसे जरूरी है कि सिस्टम फुलप्रूफ होना चाहिए और गड़बड़ी होने पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जेईई जैसी इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी अब ऑनलाइन होने लगी हैं और कई शिफ्टों में आयोजित होती हैं, जबकि नीट अब भी पारंपरिक तरीके से यानी ओएमआर शीट पर पेन से निशान लगाकर होती है। जानकारों का कहना है कि इसकी वजह से इतने सारे प्रश्नपत्रों को एक साथ देश भर के हजारों केंद्रों में पहुंचाना और उन्हें सुरक्षित रखना अपने आप में एक चुनौती है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि पेपर लीक की घटनाएं इन केंद्रों के बजाय दूसरी जगहों से हो रही हैं। जानकारों के मुताबिक परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र कड़े सुरक्षा वाले स्ट्रॉन्गरूम में रखे जाते हैं और परीक्षा से सिर्फ 45 मिनट पहले ही खुलते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	ऑनलाइन परीक्षा की चुनौतियां</h3>
<p>
	हालांकि विशेषज्ञों की समिति पहले भी कंप्यूटर आधारित परीक्षा की सिफारिश कर चुकी है और अब केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने घोषणा भी कर दी है लेकिन जानकारों का मानना है कि फुल प्रूफ इसे भी नहीं कह सकते और सभी छात्रों के साथ न्याय कर पाना भी मुश्किल होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शिक्षाविद और राइट टू एजूकेशन फोरम के संयोजक अनिल कुमार रॉय कहते हैं कि परीक्षा को ऑफलाइन से ऑनलाइन कर देना कुछ वैसा ही है जैसे चोट सिर में लगी हो तो पट्टी पैर में बांध देना। डीडब्ल्यू से बातचीत में अनिल कुमार रॉय कहते हैं, "⁠⁠ऑनलाइन एग्जाम डिजिटल असमानता को स्थापित करेगा। अधिकांश राज्यों में उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के छात्र, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में कंप्यूटर-दक्ष नहीं होते हैं। वे परीक्षा के इस मोड में संपन्न परिवारों, निजी विद्यालयों और शहरी छात्रों से कंपीट नहीं कर पाएंगे। दूसरी बात ये कि ऑफलाइन मोड के लीकेज को पकड़ना आसान है, ऑनलाइन के लीकेज को आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता है। इसलिए अब धांधली को लेकर शोर भी नहीं होगा।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अनिल कुमार रॉय कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की परीक्षा एक साथ लेने का इंफ्रास्ट्रक्चर भी सरकार के पास नहीं है। इसलिए फिर वह प्राइवेट कंप्यूटर सेंटर को परीक्षा-केंद्र बनाएगी। ये निजी केंद्र सभी सुरक्षा उपायों से न तो लैस होते हैं और न ही यकीन के साथ कहा जा सकता है कि लाखों केंद्र ईमानदार हाथों में हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भले ही इतने छात्रों की परीक्षा एक साथ ना ली जा सके लेकिन परीक्षा कई शिफ्ट में या कई दिनों तक हो सकती है, हालांकि इसमें भी कई चुनौतियां हैं। अनिल कुमार रॉय के मुताबिक, "⁠सारे शिफ्ट के क्वेश्चन सेट एक ही समान कठिन या सरल नहीं होंगे। इससे कठिन सेट वाले बच्चों के कंपीट करने का चांस कम हो जाएगा। यदि इससे बचने के लिए नॉर्मलाइजेशन भी किया जाता है तो अधिक अंक लाने वालों के अंक कम हो जाएंगे और कम अंक लाने वालों के बढ़ जाएंगे।”</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	धांधली की आशंका ज्यादा</h3>
<p>
	शिक्षाविद अनिल कुमार रॉय कहते हैं, "ऑनलाइन परीक्षा धांधली रोकने की गारंटी नहीं है। कई बार बड़ी ऑनलाइन परीक्षाएं हैक हो चुकी हैं। जेईई मेन्स 2021 में &#39;रिमोट एक्सेस&#39; जालसाजों ने सुरक्षा प्रणालियों को पूरी तरह से बाईपास कर दिया था। एसएससी सीजीएल 2017 में स्क्रीनशॉट और सिंडिकेट स्कैम हुआ था। सीबीटी मोड में होने वाली इस परीक्षा में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसमें परीक्षा हॉल के अंदर से प्रश्नों के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो गए थे, जबकि हॉल में मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस परीक्षा और सिस्टम को &#39;दागी&#39; बताया था और परिणामों पर रोक लगा दी थी। जब पिछली परीक्षाओं में अनेक बार ऐसा हो चुका है तो अगली बार न होने की क्या गारंटी है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यही नहीं, सीबीटी यानी कंप्यूटर-बेस्ड टेस्ट मोड में और भी कई दिक्कतें हैं। चूंकि सरकारी केंद्रों की कमी के कारण छोटे और निजी &#39;आईटी केंद्रों&#39; का उपयोग करना पड़ेगा जिसे फुलप्रूफ बनाना आसान नहीं होगा। सर्वर डाउन होने की समस्या अलग होगी। इसके अलावा बायोमेट्रिक सुरक्षा के बावजूद, हाई-टेक डमी कैंडिडेट्स का उपयोग ऐसी परीक्षाओं में आज भी एक चुनौती बनी हुई है। और सबसे बड़ी बात तो ये कि पूरे परीक्षा केंद्र को भी हैक कर लेना भी तकनीकी रूप से संभव है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऐसे में इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढ़ने के बाद ही ऑनलाइन मोड में परीक्षा कराने का कोई फायदा हो सकता है, अन्यथा मौजूदा सिस्टम को ही सख्त निगरानी और जिम्मेदारी के साथ बेहतर किया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 12:12:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 26 May 2026 12:20:04 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका और ईरान युद्ध दोबारा भड़का तो क्या होगा?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/international-hindi-news/us-iran-mou-ceasefire-hormuz-strait-nuclear-program-tension-126052500071_1.html</link>
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      <description><![CDATA[US Iran MoU: अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं। अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/25/full/1779717477-8473.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	</p>
	<br />
	<strong>अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को लागू हुआ युद्धविराम फिलहाल बना हुआ है, लेकिन शाब्दिक नोक-झोंक और पूर्ववत तनावों के बीच उनकी बातचीत में प्रगति के संकेत भी मिल रहे हैं।</strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकी न्यूज़ पोर्टल एक्सिओस (Axios) के अनुसार, सबसे नई प्रगति यह है कि एक &#39;समझौता ज्ञापन&#39; (मेमोरैंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग) दोनों देशों के बीच विवाद के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करता है। वह कथित तौर पर सभी तरह की शत्रुता को अस्थायी रूप से रोकने तथा होर्मुज़ जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम से संबंधित है। ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाना और अमेरिका द्वारा ज़ब्त ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना भी कथित तौर पर चर्चा का विषय है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकी के सूत्रों के अनुसार, आशा है कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में मदद करेगा। कोई टोल (शुल्क) नहीं लिया जाएगा। जहाज़ों का यातायात जल्द ही &#39;युद्ध-पूर्व के स्तर&#39; पर लौट जाएगा। किंतु, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि यह युद्धविराम कितने समय तक चलेगा। अमेरिकी सूत्रों ने 60 दिनों की अवधि की बात कही है। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने सरकारी टेलीविज़न पर &#39;30 से 60 दिनों की अवधि&#39; का ज़िक्र किया।</p>
<h3>
	ईरान बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार </h3>
<p>
	अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगें हटाने के लिए भी तैयार है। इसके बदले में, अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी नाकेबंदी हटा सकता है और ईरान को बिना किसी रोक-टोक के तेल निर्यात करने की अनुमति दे सकता है। किंतु, इस बारे में ईरान से आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। वहां की समाचार एजेंसी &#39;फ़ार्स&#39; ने लिखा कि ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या को युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस लाने पर सहमति जताई तो है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि युद्ध से पहले जैसी &#39;मुक्त आवाजाही&#39; की स्थिति फिर से बहाल हो गई है। इसलिए, ट्रंप के बयान को &#39;अधूरा&#39; माना जा रहा है और कहा जा रहा है कि वह वास्तविकता को नहीं दर्शाता।</p>
<h3>
	ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य</h3>
<p>
	ईरान ने कथित तौर पर वादा किया है कि वह कभी भी परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। किंतु, उसके यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम को निलंबित करने के संबंध में बातचीत अभी होनी है। अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम का भंडार भी चर्चा का विषय है; उसे ईरान से संभवतः हटाया जा सकता है। इसके बदले में, अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने और उस की संपत्तियों को मुक्त करने की बात कही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने &#39;कुछ प्रगति&#39; की बात करते हुए, बहुत सावधानी भरी आशावादिता का स्वर अपनाया। उन्होंने संकेत दिया कि वे संभवतः कुछ ही दिनों के भीतर कोई सही घोषणा कर पाएंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरी ओर, अमेरिका में टेक्सास राज्य के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने X पर लिखाः अगर इसका नतीजा &#39;एक ऐसा ईरानी शासन देखने में आता है— जिसका नेतृत्व अभी भी वे इस्लामी कट्टरपंथी ही कर रहे हैं जो &#39;&#39;अमेरिका का नाश हो&#39;&#39; के नारे लगाते हैं— और जिसे अब अरबों डॉलर मिलते हैं, जो यूरेनियम को समृद्ध करने और परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है और जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर प्रभावी रूप से नियंत्रण रखता है, तो यह एक विनाशकारी ग़लती होगी।&#39; </p>
<h3>
	ईरानी राष्ट्रपति को अमेरिका पर विश्वास नहीं</h3>
<p>
	ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने यथासंभव कूटनीतिक समाधान के प्रति अपनी तत्परता दिखाई, लेकिन उन्होंने वाशिंगटन के प्रति तेहरान के गहरे अविश्वास पर ज़ोर भी दिया। उन्होने कहा, &#39;हम बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन अमेरिका के साथ पिछली वार्ताओं के अनुभवों ने हमें अत्यधिक सावधानी बरतने पर मज़बूर कर दिया है।&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के महीनों बाद भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) अभी भी बंद है। &#39;समझौता ज्ञापन&#39; वाला समाचार आने से दो ही दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना था कि ईरान के साथ बातचीत उम्मीद से कहीं ज़्यादा मुश्किल साबित हो रही है। यदि कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य को निरापद बनाने के अभियान के समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की ज़रूरत पड़ेगी।</p>
<h3>
	होर्मुज़ जलडमरूमध्य लिए एक &#39;प्लान B&#39; की वकालत</h3>
<p>
	स्वीडन के हेलसिंगबोर्ग नगर में 22 मई को हुई नाटो (NATO) के विदेश मंत्रियों की बैठक में बोलते हुए, मार्को रूबियो ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक &#39;प्लान B&#39; की वकालत की। उन्होंने कहा कि ईरान के साथ ऐसे किसी भी समझौते का, जिसमें इस जलडमरूमध्य को — जो वैश्विक तेल और गैस बाज़ार के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण जलमार्ग है— फिर से खोलने का प्रावधान हो, हर कोई स्वागत ही करेगा। लेकिन, ईरान यदि इस जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से इनकार कर देता है और उस पर अपना नियंत्रण बनाए रखने तथा वहां से गुज़रने के लिए टोल (शुल्क) लगाने पर अड़ा रहता है— तो एक &#39;प्लान B&#39; की ज़रूरत पड़ेगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकी विदेश मंत्री रूबियो ने बताया कि फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व वाला एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन, वर्तमान टकराव खत्म होने के बाद के लिए एक संभावित नौसैनिक मिशन की तैयारी कर रहा है। साथ ही उनका कहना था कि &#39;तब भी हमें एक &#39;प्लान B&#39; की ज़रूरत है, यदि कोई गोलीबारी शुरू कर दे, तो ऐसी स्थिति में आप जलडमरूमध्य को फिर से कैसे खोलेंगे?&#39; उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह ज़रूरी तौर पर नाटो (NATO) का एक मिशन होना चाहिए या नहीं, &#39;लेकिन इसमें निश्चित रूप से वे नाटो देश शामिल होंगे जो अपना योगदान देने में सक्षम हैं।&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रूबियो ने स्वीडन वाले अपने वक्तव्य में इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की मदद पर निर्भर नहीं है। उनके शब्दों में, &#39;संयुक्त राज्य अमेरिका यह कर सकता है, लेकिन कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने इस तरह के काम में संभावित रूप से हिस्सा लेने में दिलचस्पी दिखाई — ऐसी नौबत यदि सचमुच आती है।&#39; उन्होंने किसी खास देश का नाम नहीं लिया।<br />
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="Nato" class="imgCont" height="500" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/25/full/1779717678-6988.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="895" /></p>
	</p>
</p>
<h3>
	होर्मुज़ जलडमरूमध्य का खुलना विवाद का विषय</h3>
<p>
	अमेरिका और ईरान के बीच इस समय रुकी हुई बातचीत में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलना उनके बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं में से एक है। युद्ध शुरू होने के बाद, ईरान ने धमकियां देकर और तेलवाही टैंकरों तथा मालवाही जहाज़ों पर गोलाबारी करके इस जलडमरूमध्य से होकर जहाज़ों की आवाजाही को काफी हद तक बंद कर दिया है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भी अपनी तरफ से ईरानी बंदरगाहों की तरफ जहाजों की आवाजाही रोक रखी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस दोहरी नाकेबंदी के अलवा, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से हो कर जहाज़ों का आना-जाना तब तक इसलिए भी ख़तरे से खाली नहीं होगा, जब तक ईरान द्वारा जलडमरूमध्य की तलहटी में बिछाई गई विस्फोटक सुरंगों को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट नहीं कर दिया जाता। अमेरिका के लिए यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन गया है। दैनिक &#39;द टेलीग्राफ़&#39; के अनुसार, अमेरिकी नौसेना, ईरान द्वारा बिछाई गई समुद्री सुरंगों को हटाने में अभी शायद सक्षम नहीं है— न तो तेज़ी से और न ही अकेले। इस काम में यूरोपीय देशों के सहयोग की भी एक प्रमुख भूमिका हो सकती है।</p>
<h3>
	अनगिनत बारूदी सुरंगें, हटाने में छह महीने लग सकते हैं</h3>
<p>
	&#39;द टेलीग्राफ़&#39; के अनुसार, ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की तलहटी में &#39;महाम,&#39; &#39;सदाफ़,&#39; &#39;MDM,&#39; और &#39;EM-52&#39; आदि नाम वाली अनगिनत बारूदी सुरंगें फैला रखी हैं। अमेरिकी कांग्रेस (संसद) को बंद दरवाज़े के पीछे दी गई एक ब्रीफ़िंग में, पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय) ने कथित तौर पर कहा कि इन सुरंगों को हटाने के अभियान में छह महीने तक का समय लग सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	&#39;द टेलीग्राफ़&#39; के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के पूर्व अधिकारी केविन आयर ने कहा, &#39;लगभग 518 वर्ग किलोमीटर का इलाका साफ़ करना होगा। यह बहुत बड़ा समुद्री विस्तार है।&#39; इससे पता चलता है कि ऐसा कोई अभियान कितना जटिल और जोखिम भरा होगा। जिन नौसैनिक जहज़ों की सहायता से यह काम करना होगा, उनका अभी तक असली युद्ध की परिस्थितियों में परीक्षण तक नहीं हुआ है। एक अंदरूनी सूत्र ने &#39;द टेलीग्राफ&#39; को बताया: &#39;गठबंधन के भीतर क्षमताओं का सबसे बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों के पास है।&#39;</p>
<h3>
	अमेरिका के लिए यूरोपीय समर्थन</h3>
<p>
	अतीत के रूस-अमेरिकी &#39;शीत युद्ध&#39; वाले समय के बाद के दौर में अमेरिका ने मुख्य रूप से विमान वाहक जहाज़ों, पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाज़ों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने बारूदी सुरंगों का पता लगाने की अपनी विशेष क्षमताओं को बनाए रखा। &#39;द टेलीग्राफ&#39; के अनुसार, जर्मनी बारूदी सुरंगों का पता लगाने वाले अपने जहाज़ &#39;फुल्दा&#39; को पहले ही तैनात कर चुका है। बताया जा रहा है कि ब्रिटेन भी स्वचालित बारूदी सुरंग-खोजी जहाज़ और गोताखोर उपलब्ध करा रहा है, जबकि इटली बारूदी सुरंगें हटाने वाले जहाज़ भेज रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के दो जहाज— यूएस पायोनियर और यूएस चीफ़— पहले ही फ़ारस की खाड़ी की ओर रवाना हो चुके हैं। हालांकि, वहां पहुंचने के बाद उन्हें काफ़ी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। माना जाता है कि बारूदी सुरंगों संबंधी किसी संभावित सफ़ाई अभियान की स्थिति में अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगी देशों के साथ मिलकर ही कोई कदम उठाएगा।</p>
<h3>
	अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की चेतावनी</h3>
<p>
	अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ उपयोगी बातचीत की आशा में उस पर नए हमलों को फिलहाल रोक रखा है। यदि फिर से युद्ध भड़का तो कच्चे तेल की कीमतों में विस्फोटक बढ़ोतरी होनी तय है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने कहा है कि ज़रूरत पड़ने पर वह और अधिक तेल-भंडारों से तेल जारी करने के लिए तैयार है, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द खोलना भी बेहद ज़रूरी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान के भौगोलिक नियंत्रण वाले इस 21 किलोमीटर चौड़े जलमार्ग के बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। IEA ने चेतावनी दी कि यदि हॉर्मुज जलडरूमध्य दोबारा नहीं खुला या ऊर्जा निर्यात के वैकल्पिक रास्ते नहीं बनाए गए, तो दुनिया तेल की आपूर्ति के और भी बड़े संकट में फंस सकती है।</p>
<h3>
	वैश्विक ऊर्जा संकट की सबसे गंभीर चेतावनी</h3>
<p>
	ऐसे में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक ऊर्जा संकट को लेकर अब तक की सबसे गंभीर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के प्रमुख फ़ेथ बिरोल ने कहा है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला यातायात ठप होने से दुनिया के बाजारों से प्रतिदिन करीब 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है। वैश्विक तेल भंडार तेजी से घट रहे हैं। मार्च में IEA और उसके 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल बाज़ार में जारी किया था, लेकिन अब ये भंडार भी लगभग ख़त्म होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। फ़ेथ बिरोल ने चेतावनी दी कि हालत यदि सुधरी नहीं, तो जुलाई तक वैश्विक तेल बाज़ार ख़तरे की घंटी वाले &#39;&#39;रेड ज़ोन&#39;&#39; में पहुंच सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	&#39;&#39;रेड ज़ोन&#39;&#39; का अर्थ ऐसी स्थिति है, जब वैश्विक तेल आपूर्ति मांग के दबाव को संभालने में असमर्थ हो जाए। यानी, तेल भंडार इतने कम हो जाएं कि कोई भी अतिरिक्त बाधा आपूर्ति संकट और कीमतों में तेज़ उछाल पैदा कर दे। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें फिलहाल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि ईरान युद्ध शुरू होने से पहले यह क़रीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी। बिरोल पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि वर्तमान तेल संकट 1973, 1979 और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान आए तेल संकटों से भी ज्यादा गंभीर है। उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजार से प्रतिदिन 1.4 करोड़ बैरल तेल पहले ही ग़ायब हो चुका है।</p>
<h3>
	दोबारा युद्ध भड़का तो क्या होगा?</h3>
<p>
	मई की शुरुआत में कच्चे तेल की क़ीमतें 114 डॉलर तक पहुंची थीं। यदि युद्ध दोबारा भड़का तो क़ीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। IEA के अनुसार, 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 18.27 करोड़ बैरल तेल जारी किया गया था, लेकिन इस बार 40 करोड़ बैरल जारी करने के बावजूद संकट काबू में नहीं आ रहा है। बिरोल ने कहा कि इस भयावः स्थिति का सबसे अधिक असर गरीब देशों पर पड़ेगा, ख़ासकर अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में तो खाद्य संकट तक पैदा हो सकता है! कहने की आवश्यकता नहीं कि तब भारत में भी कुहराम मच जायेगा। किंतु, प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक अंध विरोधी तब भी तेल के अकाल के लिए उन्हें ही दोषी ठहराएंगे। </p>
<p>
	 </p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 19:15:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 25 May 2026 19:31:35 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[International News]]></category>
      <authorname>राम यादव</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या मस्क बनेंगे दुनिया के पहले खरबपति?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/spacex-ipo-elon-musk-to-become-worlds-first-trillionaire-75-billion-dollar-126052300010_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/spacex-ipo-elon-musk-to-become-worlds-first-trillionaire-75-billion-dollar-126052300010_1.html</guid>
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      <description><![CDATA[इलॉन मस्क की एक आदत है- साइंस फिक्शन, यानी किताबों और फिल्मों की काल्पनिक कहानियों को हकीकत में बदलना। बार-बार इस्तेमाल होने वाले रॉकेट से लेकर बिना ड्राइवर के चलने वाली गाड़ियों और इंसानों जैसे दिखने वाले रोबोट तक, इस अरबपति की कंपनियों ने वह सब कर ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="elon musk" class="imgCont" height="800" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-08/12/full/1754985096-4979.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="elon musk" width="1200" /></p>
	निक मार्टिन</p>
<p>
	इलॉन मस्क की एक आदत है- साइंस फिक्शन, यानी किताबों और फिल्मों की काल्पनिक कहानियों को हकीकत में बदलना। बार-बार इस्तेमाल होने वाले रॉकेट से लेकर बिना ड्राइवर के चलने वाली गाड़ियों और इंसानों जैसे दिखने वाले रोबोट तक, इस अरबपति की कंपनियों ने वह सब कर दिखाया है जिसे कभी नामुमकिन माना जाता था। अब, स्पेसएक्स के आईपीओ के जरिए मस्क का इरादा इससे भी बड़े मुकाम हासिल करने का है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह कंपनी, जिसने पिछले 24 सालों से खुद को शेयर बाजार से पूरी तरह दूर रखा था, अब जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। अमेरिकी रेगुलेटर्स को बुधवार को दिए गए सैकड़ों पन्नों के एक दस्तावेज ‘एस1 फाइलिंग&#39; के मुताबिक, स्पेसएक्स नए निवेशकों से करीब 75 अरब डॉलर जुटाने की योजना बना रही है। अगर ऐसा होता है, तो कंपनी की कुल वैल्यू बढ़कर 1.75 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक ऐसी कंपनी के लिए यह वाकई कोई खराब सौदा नहीं है जो अभी भी घाटे में चल रही है और जिस पर दुनिया के सबसे अमीर इंसान यानी मस्क का ही पूरा कंट्रोल रहेगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	मंगल ग्रह पर बस्ती बसाने की तैयारी</h3>
<p>
	मस्क सिर्फ यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजकर रुकना नहीं चाहते, उनका इरादा स्पेसएक्स से इससे कहीं ज्यादा करवाने का है। वह एक ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करना चाहते हैं जिससे पृथ्वी के बाहर भी इंसानी बस्ती बसाई जा सके। मस्क ने खुद कहा है कि उनका असली मकसद मंगल ग्रह पर ऐसे शहर बसाना है जो खुद अपनी जरूरतें पूरी कर सकें और जहां करीब 10 लाख लोग रह सकें।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस सपने को सच करने के लिए, स्पेसएक्स अपने विशालकाय और दोबारा इस्तेमाल होने वाले स्पेसक्राफ्ट ‘स्टारशिप&#39; की मदद लेगा। उनकी योजना साल 2030 तक मंगल ग्रह पर बिना इंसानों वाली पहली उड़ानें भेजने की है। इस लाल ग्रह की एक तरफ की यात्रा औसतन लगभग 14 करोड़ मील लंबी है, जिसे पूरा करने में छह से नौ महीने का समय लगता है। शुरुआती मिशन में वहां उतरने के सिस्टम का टेस्ट किया जाएगा और बुनियादी चीजें जुटानी शुरू की जाएंगी, जिसके कुछ सालों बाद इंसानों को वहां भेजा जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्पेसएक्स का यह भी सोचना है कि इंसानों को कई ग्रहों पर बसाने के लिए, पृथ्वी के नजदीक मौजूद अन्य खगोलीय पिंडों, जैसे कि चांद या उल्कापिंडों के संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए। मस्क का मानना है कि अंतरिक्ष में अपनी कक्षा बदलते हुए घूमने वाले एस्टेरॉयड भविष्य में इंसानों के बहुत काम आ सकते हैं और एक दिन वहां भी खुदाई करके कीमती चीजें निकाली जा सकेंगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	एस्टेरॉयड पर गुरुत्वाकर्षण न के बराबर होता है, जिसकी वजह से वहां उतरना और कीमती चीजें निकालना बहुत आसान और सस्ता हो जाता है। हालांकि, स्पेस इंडस्ट्री के विशेषज्ञों का अनुमान है कि बड़े पैमाने पर एस्टेरॉयड से प्लेटिनम, निकेल, सोना और बर्फ (पानी) निकालने का काम 2040 के दशक या उसके बाद ही मुमकिन हो पाएगा। ये सभी चीजें मंगल ग्रह पर जीवन बसाने, घर बनाने और ईंधन तैयार करने के लिए बेहद जरूरी हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, इस पूरे सफर का सबसे पहला और जरूरी पड़ाव चांद होगा, जो पृथ्वी से सिर्फ तीन दिन की दूरी पर है। स्पेसएक्स का मानना है कि चांद पर इंसानों के रहने की जगहें, फैक्ट्रियां और फ्यूल स्टेशन बनाए जा सकते हैं। पृथ्वी से भारी मात्रा में सामान अंतरिक्ष में भेजने के मुकाबले, चांद पर ही ये सब तैयार करना कहीं ज्यादा सस्ता पड़ेगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मस्क का यह भी मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सामने खड़ी सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक का हल अंतरिक्ष में छिपा है। दरअसल, अरबों लोगों के अनुरोध को एक साथ प्रोसेस करने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर को भारी मात्रा में बिजली और कूलिंग की जरूरत होती है और स्पेस इस समस्या को दूर कर सकता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पृथ्वी पर बिजली की भारी खपत करने वाले ऐसे और डेटा सेंटर बनाने के बजाय, स्पेसएक्स ने एक अनोखा आइडिया सामने रखा है। उसका विचार है कि क्यों न बड़े-बड़े एआई सुपर कंप्यूटर को सैटेलाइट के नेटवर्क पर रखकर सीधे अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया जाए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंतरिक्ष में मौजूद ये डेटा सेंटर ऊर्जा के लिए सूरज की असीमित धूप का इस्तेमाल कर सकेंगे और इन्हें ठंडा रखने के लिए स्पेस की जमा देने वाली ठंडक मुफ्त में मिल जाएगी। इससे बड़े पैमाने पर एआई को ट्रेन करना हमारी पृथ्वी के मुकाबले कहीं ज्यादा सस्ता और असरदार हो जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या मस्क बनेंगे दुनिया के पहले खरबपति?</h3>
<p>
	अगर स्पेसएक्स की महत्वाकांक्षाएं पहले ही अविश्वसनीय प्रतीत नहीं हो रही हैं, तो रुकिए! इस आईपीओ के जरिए दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति मस्क को जिस मुकाम पर पहुंचाने की तैयारी है, वो तो सचमुच अविश्वसनीय है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फिलहाल, स्पेसएक्स में मस्क की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी मानी जाती है। अगर कंपनी की वैल्यू 1।75 खरब डॉलर के तय लक्ष्य तक पहुंच जाती है, तो सिर्फ उनका यह शेयर ही लगभग 735 अरब डॉलर का हो जाएगा। टेस्ला, एक्सएआई और उनके बाकी कारोबार की संपत्ति को भी इसमें जोड़ दें, तो इस आईपीओ के बाद मस्क की कुल नेटवर्थ 1 ट्रिलियन डॉलर यानी 1 खरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगी। इस तरह वह इतिहास के पहले ट्रिलियनेयर यानी खरबपति बन जाएंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	शेयरों के एक खास किस्म के सिस्टम (डुअल-क्लास शेयर स्ट्रक्चर) की वजह से मस्क के पास कंपनी के 80 फीसदी से भी ज्यादा वोटिंग राइट्स हैं, भले ही स्पेसएक्स की कुल संपत्ति में उनका मालिकाना हिस्सा काफी कम हो। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उन्हें सीईओ के पद से हटाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इससे उन्हें कम समय के लिए मुनाफा ढूंढने वाले निवेशकों या दखल देने वाले शेयरधारकों के दबाव के बिना, मंगल मिशन जैसे लंबे और भारी जोखिम वाले प्रोजेक्ट पर खुलकर काम करने की पूरी आजादी मिलती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मस्क के इस सख्त नियंत्रण पर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। सबसे ज्यादा विवाद उनकी कंपनी ‘टेस्ला&#39; में हुआ था, जहां शेयरधारकों ने उनके भारी-भरकम सैलरी पैकेज और निजी हितों के टकराव को लेकर अदालत में मुकदमा दायर कर दिया था। उनका आरोप था कि कंपनी का बोर्ड मस्क के सामने पूरी तरह आजाद नहीं है। कुछ ऐसी ही चिंताएं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स&#39; पर उनके नियंत्रण को लेकर भी उठी हैं, जहां बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को नौकरी से निकालने और रणनीतिक बदलाव जैसे सारे फैसले अकेले मस्क ने ही लिए थे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस धमाकेदार लिस्टिंग से कंपनी के शुरुआती निवेशकों और बड़े अधिकारियों की भी लॉटरी लगने वाली है। फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, स्पेसएक्स की प्रेसिडेंट ग्विन शॉटवेल और सीएफओ ब्रेट जॉनसन के शेयरों की कीमत 1 अरब डॉलर के पार चली जाएगी। वहीं, कंपनी के पुराने निवेशक एंटोनियो ग्रेसियास के पास 70 अरब डॉलर या उससे भी ज्यादा की दौलत हो सकती है। जबकि, पेपाल के को-फाउंडर ल्यूक नोसेक की हिस्सेदारी की वैल्यू लगभग 5 अरब डॉलर पहुंच जाएगी।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	वॉल स्ट्रीट का सबसे बड़ा दांव</h3>
<p>
	वॉल स्ट्रीट (अमेरिकी शेयर बाजार) इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ के लिए पूरी तरह कमर कस चुका है। दुनिया का मशहूर इन्वेस्टमेंट बैंक ‘गोल्डमैन सैक्स&#39; इस पूरे मामले को संभालने और आगे बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभा रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अगर स्पेसएक्स इस आईपीओ से 75 अरब डॉलर का फंड जुटाने में कामयाब हो जाता है, तो यह सऊदी अरामको के 2019 वाले 29।4 अरब डॉलर के पिछले रिकॉर्ड से करीब तीन गुना ज्यादा होगा। उससे पहले, साल 2014 में चीन की कंपनी अलीबाबा ने अमेरिकी शेयर बाजार में कदम रखकर 22 अरब डॉलर जुटाए थे, जो उस समय का सबसे बड़ा रिकॉर्ड था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अगर स्पेसएक्स की वैल्यू 1.75 खरब डॉलर हो जाती है, तो यह दुनिया की टॉप 10 सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हो जाएगी। फिर इसका नाम भी एनवीडिया, एप्पल, गूगल (अल्फाबेट) और माइक्रोसॉफ्ट जैसे बड़े दिग्गजों के साथ लिया जाने लगेगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	निवेशकों के लिए यह एक बहुत बड़ा जुआ होगा, क्योंकि स्पेसएक्स अभी भी भारी घाटे में चल रही है। स्टारशिप रॉकेट बनाने, अंतरिक्ष में सैटेलाइट का जाल बिछाने और एआई संसाधनों को तैयार करने में हुए भारी खर्च के कारण, कंपनी को साल 2025 में 4.94 अरब डॉलर का भारी नुकसान हुआ था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अंतरिक्ष में काम करने के भारी खतरों और तेजी से बढ़ती एआई तकनीक को देखते हुए, आईपीओ के दस्तावेजों में उन असली खतरों को साफ-साफ बताया गया है जिनका सामना स्पेसएक्स को करना पड़ रहा है। इनमें ‘अंतरिक्ष से जुड़े कई अनोखे जोखिम&#39; शामिल हैं, जैसे ‘सूरज और ब्रह्मांड से निकलने वाला खतरनाक रेडिएशन, अंतरिक्ष का तैरता हुआ कचरा और छोटे उल्कापिंड&#39;, और यहां तक कि ‘इंसानों को गंभीर चोट लगना या उनकी मौत होना&#39; भी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	20 मई को जमा किए गए दस्तावेजों में यह चेतावनी भी दी गई है: "हमारा इतिहास लगातार घाटे में रहने का रहा है और हो सकता है कि हम आने वाले समय में भी मुनाफा न कमा पाएं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	कंपनी की इस आसमान छूती वैल्यू को देखकर कुछ विश्लेषक यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि क्या स्पेसएक्स के ये सपने वाकई सच हो सकते हैं या फिर सिर्फ ख्याली पुलाव हैं। यह बहस अगले महीने नैस्डैक शेयर बाजार में इसके शेयरों की ट्रेडिंग शुरू होने के बाद और ज्यादा तेज हो जाएगी।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 11:06:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 23 May 2026 11:15:31 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत में अब भी कैसे जारी है हर दिन 16 महिलाओं की दहेज हत्या?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-dowry-crisis-twisha-sharma-deepika-nagar-deaths-domestic-violence-laws-126052200037_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-07/19/thumb/1_1/1752908708-3546.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारत में दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना को 'घर का मामला' कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। दहेज की कुप्रथा को साल 1961 में कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया था। छह दशक बाद भी किसी ना किसी रूप में समाज में मौजूद दिखता है। अब कई लोग लड़की के परिवार से दहेज ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="woman " class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2025-07/19/full/1752908708-3546.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
	शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	भारत में दहेज के लिए होने वाली प्रताड़ना को &#39;घर का मामला&#39; कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। दहेज की कुप्रथा को साल 1961 में कानूनन अपराध घोषित कर दिया गया था। छह दशक बाद भी किसी ना किसी रूप में समाज में मौजूद दिखता है। अब कई लोग लड़की के परिवार से दहेज सीधे शब्दों में नहीं मांगते लेकिन ‘गिफ्ट&#39; और &#39;बेटी को खुशी से जो देना हो&#39; जैसी भाषा में अपनी मंशा जता देते हैं। इन मांगों के बोझ तले कई महिलाएं मानसिक और शारीरिक हिंसा झेलती हैं जो कई बार उन्हें मौत के मुहाने तक पहुंचा देती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल ही में 33 वर्षीय ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने दहेज और वैवाहिक प्रताड़ना के सवाल को फिर केंद्र में ला दिया है। पूर्व मिस पुणे रह चुकी ट्विशा की शादी भोपाल के एक प्रभावशाली परिवार में हुई थी। ट्विशा के परिवार का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसे मानसिक प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, दबाव और दहेज से जुड़ी मांगों का सामना करना पड़ रहा था। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित चैट्स और स्क्रीनशॉट्स में ट्विशा ने अपनी दोस्त से कहा था कि वह खुद को &#39;फंसा&#39; महसूस करती हैं। पुलिस ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में मामला दर्ज किया है। वही, ट्विशा की सास और रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह ने सभी आरोपों से इनकार किया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस मामले के कुछ ही दिन बाद ग्रेटर नोएडा की 24 वर्षीय दीपिका नागर की मौत की खबर सामने आती है। पुलिस ने इस मामले में दीपिका के पति और ससुर को गिरफ्तार किया है। दीपिका की शादी दिसंबर 2024 में ऋतिक तंवर से हुई थी। दीपिका के परिवार का दावा है कि शादी में एक करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। लड़के को नकद, जेवर और गाड़ी भी दी गई थी। आरोप है कि फॉर्च्यूनर गाड़ी और 50 लाख रुपये नकद की मांग को लेकर महीनों तक दीपिका को परेशान किया जा रहा था। मांग पूरी न होने पर उन्होंने दीपिका को घर की तीसरी मंजिल से धक्का दे दिया जिसके चलते दीपिका की मौत हो गई।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या कहते हैं दर्ज हुए अपराधों के आंकड़े?</h3>
<p>
	दहेज की मांग को लेकर पति या ससुराल वालों की तरफ से दबाव और प्रताड़ना अपराध है। महिलाओं को मारपीट, जहर, जलाने या संदिग्ध हादसों का शिकार होना पड़ता है। कई बार महिलाएं दबाव में आकर आत्महत्या कर लेती हैं। भारत में दहेज मृत्यु के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80 (पहले आईपीसी की धारा 304बी) के तहत प्रावधान है। साथ ही दहेज निषेध अधिनियम, 1961 में भी कानूनी कार्रवाई की जाती है। साल 1979 में तरविंदर कौर मामला दहेज मृत्यु के शुरुआती चर्चित मामलों में था जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	देश में हर दिन दहेज से जुड़ी हिंसा, शोषण या दबाव के कारण औसतन 16 महिलाओं की जान गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार साल 2023 में दहेज मृत्यु के 6,156 और 2024 में 5,737 मामले दर्ज किए गए। हालांकि यह संख्या 2017 में दर्ज 7,466 मौतों से कम हैं, लेकिन आंकड़े अब भी बेहद चिंताजनक हैं। देश की राजधानी दिल्ली में दहेज के कारण मौत के 109 मामले दर्ज हुए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने वाली हर पांच में से तीन महिलाओं ने दहेज उत्पीड़न की भी शिकायत की है। दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की संख्या देखें तो साल 2023 में 15,489 और 2024 में 12,343 हो गई। इसका मतलब है कि देश में लगभग हर आधे घंटे में दहेज से जुड़ा एक मामला दर्ज होता है। यदि बड़े शहरों की बात करें तो बेंगलुरु में 878 दहेज संबंधी मामले दर्ज किए गए। ये मामले उस सोच को भी पूरी तरह खारिज करते हैं कि दहेज केवल अशिक्षित समाज या छोटे शहरों तक सीमित समस्या है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या कहता है भारत का कानून?</h3>
<p>
	दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज लेना, देना या उसकी मांग करना अपराध है। इसके लिए कम से कम 5 साल की जेल हो सकती है। साथ ही साथ ही 15,000 रुपये जुर्माना या दहेज की कीमत के बराबर जुर्माना लगाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता स्नेहा सिंह समझाती हैं कि इस कानून में शादी के दौरान अपनी इच्छा से दिए गए उपहारों को दहेज नहीं माना जाता। जगह, जाति, धर्म या परंपरा के अनुसार दिए गए स्वेच्छिक उपहारों की अनुमति है। यह इस कानून की खामी है जिसका फायदा उठाया जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	महिला अधिकारों की जानकार और एडवोकेट स्नेहा सिंह बताती हैं, "लड़के का परिवार कहता है अपनी बेटी को जो देना हो, खुशी से दीजिए। इसके बाद परिवार कार, घर, एफडी, कपड़े और जेवर जैसी महंगी चीजें &#39;गिफ्ट&#39; के नाम पर देता है। सगाई, तिलक, शादी समारोह, खाने-पीने की व्यवस्था, सजावट, वेन्यू और दूसरी रस्मों पर होने वाला भारी खर्च भी दहेज लेने का तरीका बन गया है। कई मामलों में शादी के बाद इन्हीं चीजों को लेकर बहू पर और ज्यादा दबाव बनाया जाता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि दहेज और घरेलू हिंसा के मामलों में पुलिस और न्याय व्यवस्था का शुरुआती रवैया महिलाओं के प्रति संदेहपूर्ण होता है। शिकायत को पहले ही &#39;झूठा&#39; या &#39;पारिवारिक विवाद&#39; मान लिया जाता है। मुंबई स्थित ‘मजलिस लीगल सेंटर&#39; की निदेशक और वकील ऑड्रे डीमेलो मानती हैं कि दहेज मृत्यु असल में लंबे समय तक चली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बाद होने वाली संदिग्ध मौत या हत्या होती है। ऐसे मामलों में गवाहों की कमी होना स्वाभाविक है क्योंकि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऑड्रे डीमेलो डीडब्ल्यू से बातचीत में कहती हैं, "कानून के अनुसार आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का दायित्व रखा गया है, लेकिन व्यवहार में अक्सर महिलाओं से ही सबूत, गवाह और उत्पीड़न साबित करने की उम्मीद होती है। महिला पर ही गवाह लाने, चैट दिखाने या उत्पीड़न साबित करने का पूरा बोझ डाल दिया जाता है।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अदालत, पुलिस और प्रशासन के रवैये पर सवाल</h3>
<p>
	दहेज से जुड़े अपराध को गैर-जमानती और संज्ञेय (कोजनीजेबल) अपराध माना गया है। फिर भी पीड़ित महिलाओं को शुरुआती स्तर पर ही गंभीरता से नहीं लिया जाता। स्नेहा अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं कि एफआईआर दर्ज होने में देरी होती है, तो आरोपियों को सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट जाने और गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने का समय मिल जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्नेहा सिंह का कहना है, "हर राज्य में दहेज निषेध अधिकारियों और अन्य सदस्यों के साथ सलाहकार बोर्ड बनाए गए हैं। इनका काम दहेज कानून का पालन और शिकायतों की निगरानी करना है। मगर वे गंभीरता से काम नहीं करते।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऑड्रे डीमेलो भी अपने विचार जोड़ती हैं। इन मामलों की सुनवाई कई वर्षों तक चलती रहती है। महिलाओं को एक साथ आपराधिक और सिविल (तलाक और गुजारा भत्ता) दोनों तरह के मुकदमे लड़ने पड़ते हैं। समझौते की स्थिति में महिलाओं पर दहेज का मामला वापस लेने का दबाव डाला जाता है, ताकि बच्चों की परवरिश के लिए उन्हें गुजारा भत्ता मिल सके।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समझौता करने, शादी बचाने की सलाह भी है जिम्मेदार</h3>
<p>
	ट्विशा शर्मा मामले में सामने आए चैट्स और परिवार के बयानों से पता चलता है कि वह लगातार अपने घरवालों को ससुराल में हो रहे अत्याचार और असहज माहौल के बारे में बता रही थीं। जवाब में उन्हें समझौता करने, शादी बचाने और थोड़ा समय देने की सलाह ही मिली।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह मामला दिखाता है कि पढ़ी-लिखी और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं भी सामाजिक सोच के दबाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। ऑड्रे डीमेलो कहती हैं, "भारतीय समाज में आज भी अकेली या तलाकशुदा महिला को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जाता। कई महिलाएं हमें बताती हैं कि तलाक के बाद वे खुद को अलग-थलग और अकेला महसूस करती हैं। उन्हें इस तरह देखा जाता है जैसे गलती उन्हीं की हो।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऑड्रे डीमेलो आगे समझाती हैं कि &#39;एडजस्ट&#39; करने की यह सोच इतनी गहराई से महिलाओं के भीतर बैठा दी जाती है कि वे मानसिक और शारीरिक शोषण सहते हुए भी रिश्ते को बचाने की कोशिश करती रहती हैं। परिवार और ससुराल पक्ष भी इसी सामाजिक कंडीशनिंग का फायदा उठाते हैं।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 15:10:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 22 May 2026 15:17:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नार्वे में पत्रकारिता या पब्लिसिटी स्टंट?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/journalism-or-publicity-stunt-in-norway-126052100034_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/19/thumb/1_1/1779174610-9014.jpg"/>
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      <description><![CDATA[हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान ओस्लो में जो कुछ भी हुआ, वह इसी छटपटाहट और एजेंडा-आधारित पत्रकारिता का एक ज्वलंत उदाहरण है। दुःख की बात यह है कि विदेशी जमीन पर रची गई एक पब्लिसिटी स्टंट की स्क्रिप्ट पर भारत का मुख्य ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="Photos of Prime Minister Narendra Modi and journalist Helle Lyng during their visit to Norway" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/19/full/1779174610-9014.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="Norway press freedom row" /></p>
</p>
<p>
	वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति कुछ अंतरराष्ट्रीय तत्वों के साथ-साथ देश के भीतर बैठे विपक्ष के एक हिस्से को भी रास नहीं आ रही है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान ओस्लो में जो कुछ भी हुआ, वह इसी छटपटाहट और एजेंडा-आधारित पत्रकारिता का एक ज्वलंत उदाहरण है।<br />
	<br />
	दुःख की बात यह है कि विदेशी जमीन पर रची गई एक पब्लिसिटी स्टंट की स्क्रिप्ट पर भारत का मुख्य विपक्ष न केवल तालियां बजा रहा है, बल्कि अपने ही देश की छवि को धूमिल करने के लिए इसका इस्तेमाल भी कर रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गहर स्टोर की संयुक्त प्रेस ब्रीफिंग समाप्त होने के बाद दोनों नेता मंच से प्रस्थान कर रहे थे। तब ही नॉर्वे की एक स्थानीय पत्रकार हेले लिंग ने पीछे से चिल्लाकर कहा- आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से कुछ सवाल क्यों नहीं लेते?... </p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक परिपक्व पत्रकार को, जो विश्व की सबसे स्वतंत्र पत्रकारिता वाले देश की है, उन्हें इतना बुनियादी अंतर तो पता होना ही चाहिए कि निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत होने वाली संक्षिप्त प्रेस ब्रीफिंग और एक खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में बहुत बड़ा अंतर होता है। ऊपर से जब आधिकारिक कार्यक्रम समाप्त हो चुका हो, तब इस तरह पीछे से आवाजें कसना पत्रकारिता नहीं, बल्कि सरेआम अटेंशन सीकिंग यानी सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा ही है।<br />
	<br />
	हेले लिंग भली-भांति जानती थीं कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का नाम अपने साथ जोड़कर वह रातों-रात अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में आ सकती हैं। उनकी यह चाल कामयाब भी हो गई; सोशल मीडिया पर पहले महज पांच सौ फॉलोअर्स वाली यह पत्रकार अचानक हजारों फॉलोअर्स बटोरकर चर्चा में आ गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फिर भी, बाद में भारतीय दूतावास ने बड़े लोकतंत्र की सहिष्णुता और बड़प्पन का परिचय देते हुए उस पत्रकार को स्वयं आमंत्रित किया कि आपके मन में यदि वास्तव में कोई सवाल हैं, तो आप विदेश मंत्रालय (एम ई ए) की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आएं। पत्रकार वहां पहुंचीं भी, लेकिन उनका मकसद सच जानना या तार्किक संवाद करना था ही नहीं। उन्होंने भारत में मानवाधिकारों और प्रेस की आजादी पर घिसे-पिटे, एजेंडा-प्रेरित सवाल दागे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जब विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सीबी जॉर्ज ने भारत की विशाल लोकतांत्रिक विविधता, जटिलताओं और सच का हवाला देते हुए तथ्यों के साथ जवाब देना शुरू किया, तो वह पत्रकार इतनी असहज हो गईं कि भारतीय पक्ष का तार्किक जवाब पूरा सुने बिना ही, बीच में अनुशासनहीनता और दखलअंदाजी करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़कर बाहर भाग खड़ी हुईं।<br />
	<br />
	यह साफ दर्शाता है कि जब बात पूर्वाग्रह से हटकर तथ्यों पर आती है, तो पश्चिमी चश्मे से भारत को देखने वालों के पैर उखड़ जाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग को केवल सनसनी फैलानी थी, समाधान या उत्तर से उनका कोई सरोकार नहीं था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हेले लिंग को यह समझना होगा कि भारत को खुद को साबित करने की आवश्यकता नहीं है। एक ऐसा देश जहां 140 करोड़ लोग बेहद सीमित संसाधनों में अनेक चुनौतियों और एक जटिल इतिहास के बावजूद अपेक्षाकृत शांति व सद्भाव से रहते हैं, वह अपनी परीक्षा खुद दे चुका है।<br />
	<br />
	जिस समय कोविड-19 जैसे महासंकट में विकसित देश सिर्फ अपनी रिसर्च फंडिंग में व्यस्त थे और कयास लगा रहे थे कि भारत में बेहिसाब मौतें होंगी, उस समय भारत ने अद्भुत अनुशासन का परिचय दिया। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल अपने नागरिकों को संभाला, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को मुफ्त वैक्सीन बांटकर मानवता की रक्षा की।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जिन जटिलताओं, भाषाई और धार्मिक विविधताओं के बीच भारत ने अपने लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखा है, क्या उसका सामना पश्चिम के नॉर्वे जैसे देश, जिसकी जनसंख्या नोएडा के बराबर है, वह कर पाएंगे? जहां सामान्य मतभेद भी लोग सह नहीं पाते और अवसाद व अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं, वहां से भारत को सहिष्णुता की सीख नहीं दी जा सकती।<br />
	<br />
	भारत ने अभावों के बावजूद आईटी, स्पेस टेक्नोलॉजी और मेडिसिन जैसे क्षेत्रों में दुनिया को अपनी जिजीविषा दिखाई है। हजारों वर्ष पुरानी हमारी सभ्यता ने कभी किसी देश पर पहले आक्रमण नहीं किया। जब दुनिया प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में जल रही थी (जो कि पश्चिम की ही देन थे), तब भारत अहिंसा और योग का संदेश दे रहा था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आज साधन संपन्न और बेहद कम आबादी वाले देशों में बैठकर मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करना मात्र एक विलासिता है। जब पेट भरा हो और अवसर प्रचुर हों, तो शांति व्यवस्था बनाए रखना बहुत आसान होता है; लेकिन असली दमदार किरदार उसका है जो तमाम अभावों और विविधताओं के बाद भी लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेज कर रखता है।<br />
	<br />
	भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन के जो भी अपवाद हैं, उन्हें भारत की विशाल जनसंख्या के अनुपात में देखना चाहिए, न कि किसी दुर्भावनापूर्ण एजेंडे के तहत, या विश्व के सबसे बड़े नेता के जरिए प्रसिद्ध होने के लिए। आज तो स्थिति यह है कि खुद पश्चिम का सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है और उनकी जनसंख्या लगातार घट रही है। ऐसे में यह सवाल तो भारत भी कर सकता है कि हम आप पर भरोसा क्यों ही करें?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हैरानी की बात यह है कि इस पूरी घटना को लेकर भारत के विपक्षी नेता विदेशी प्रोपेगेंडा को संजीवनी देने में जुट गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस वीडियो को साझा करते हुए सरकार पर निशाना साधा। विपक्ष को यह समझने की जरूरत है कि यदि देश में अभिव्यक्ति की आजादी न होती, तो वे खुद हर मंच से देश के प्रधानमंत्री को कोसने के लिए स्वतंत्र न होते। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन जब बात देश के स्वाभिमान की हो, तो विपक्ष को परिपक्वता दिखानी चाहिए और भारत के लिए एकजुट होना चाहिए। एक अपरिपक्व विदेशी पत्रकार की अज्ञानता और चुनिंदा एजेंडे को अपने ही देश के खिलाफ हथियार बनाकर विपक्ष अपनी बची-कुची साख भी खो रहा है।<br />
	<br />
	यह वही पत्रकार हैं जो भारत के भीतर एक विशिष्ट राजनीतिक नैरेटिव को हवा देने के लिए विपक्ष के मुख्य चेहरे का साक्षात्कार करने की जमीन तलाश रही थीं, जिस पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। इन सबके बीच भारत की जनता यह भली-भांति देख रही है कि कौन देश के गौरव के साथ खड़ा है और कौन मात्र राजनैतिक लाभ के लिए विदेशी झूठ का टूलकिट बन रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। &#39;वेबदुनिया&#39; इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)<br />
	<br />
	`- वेबदुनिया फीचर टीम</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 15:05:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 21 May 2026 15:08:25 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>सपना सीपी साहू 'स्वप्निल'</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल में राजनीतिक हिंसा रोकना भाजपा सरकार की सबसे बड़ी चुनौती]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/stopping-political-violence-in-bengal-is-the-biggest-challenge-for-the-bjp-government-126052100013_1.html</link>
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      <description><![CDATA[चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में जगह-जगह कुछ हिंसा तो तृणमूल नेताओं द्वारा मकानों, जमीनों, कार्यालयों पर कब्जे के संदर्भ में हुई जब लोग स्वयं निकलकर इसे मुक्त कराने लगे। इसी तरह हिंदुओं के कई धर्मस्थलों या धर्म स्थानों की मुक्ति के दृश्य भी सामने आए।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="West Bengal political violence" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/07/full/1778151097-187.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 700px;" title="West Bengal political violence" /></p>
</p>
<p>
	पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार गठन के बाद उम्मीद बंधी है कि चुनाव उपरांत हिंसा नियंत्रित होगी। चार राज्यों एवं एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए जिनमें तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल एवं तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी एवं घटकों की पराजय हुई। किंतु जैसा डरावना दृश्य पश्चिम बंगाल में दिखा वैसा कहीं नहीं। चुनाव परिणाम के बाद पश्चिम बंगाल से चार तरह की नकारात्मक और चिंताजनक तस्वीरें सामने आईं।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/west-bengal-assembly-election-2026-news/5-major-reasons-for-bjp-massive-victory-in-west-bengal-126050400017_1.html" target="_blank">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत के 5 बड़े कारण?</a></strong></p>
<p>
	 </p>
<p>
	एक, चुनाव के बाद समस्त कोशिशें के बावजूद हिंसा की घटनाएं सामने आती रही। दूसरे, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेत्री ममता बनर्जी विनम्रता से जनादेश स्वीकारने की जगह कह रहीं हैं कि हमारी 100 सीटें चुनाव आयोग ने लूट लिया। तीन, विपक्षी नेताओं ने सबसे ज्यादा समर्थन और सहानुभूति तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को दिया है। केरल से माकपा नेतृत्व वाले वाम मोर्चा की सत्ता चली गई लेकिन कोई उनके लिए छाती नहीं पीट रहा है। एमके स्टालिन और द्रमुक विपक्ष के साथ भाजपा विरोधी अभियान और आक्रामकता में लगातार शामिल रहा है लेकिन उनके साथ भी यह व्यवहार नहीं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन दोनों राज्यों के नेताओं ने न चुनाव आयोग पर कोई आरोप लगाया और न कहा कि हम हारे नहीं। दोनों राज्यों की स्थिति बिलकुल सामान्य है। ममता बनर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि मैं चुनाव हारी नहीं हूं इसलिए इस्तीफा नहीं दूंगी। अंततः राज्यपाल ने संवैधानिक शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उन्हें बर्खास्त किया। यह भारतीय राजनीति के इतिहास की असामान्य घटना थी। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि बंगाल में इनसे अलग चौथी तस्वीर है जो हम सबको बहुत कुछ सोचने को विवश करती है। प्रदेश से आई तस्वीरों और वीडियो में लोग जगह-जगह चुनाव परिणाम का विजय उत्सव मनाते दिख रहे हैं। कहीं विजय जुलूस निकल रहे हैं, कहीं होली खेली जा रही है, कहीं कीर्तन हो रहे हैं, मानो उन्हें मुक्ति मिली हो। इनमें महिला, पुरुष, दलित, जनजाति, युवा, किशोर सब शामिल दिखाई देते हैं।<br />
	<br />
	अगर इन तस्वीरों को नजरअंदाज कर देंगे तो पश्चिम बंगाल के सत्य तक नहीं पहुंच सकते। ये सारे विजय उत्सव भाजपा द्वारा ही आयोजित नहीं थे। स्वत:स्फूर्त तरीके से लोग ऐसा कर रहे हैं। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनका भाजपा से किसी तरह का संबंध नहीं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	चौथी तस्वीर बताती है कि 15 वर्षों के तृणमूल कांग्रेस शासन के विरुद्ध बड़े वर्ग में व्यापक असंतोष था जिससे वे मुक्ति चाहते थे। दूसरी ओर इसका अर्थ यह भी है कि हिंसा की तस्वीरों से ज्यादा सकारात्मक लोक मानस पूरे प्रदेश में है। यह लोक व्यवहार आश्वस्त करता है कि बंगाल हिंसा के दौर से बाहर निकलेगा तथा शांति‌ व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा। किंतु यह यूं ही नहीं हो सकता। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि प्रदेश में जगह-जगह कुछ हिंसा तो तृणमूल नेताओं द्वारा मकानों, जमीनों, कार्यालयों पर कब्जे के संदर्भ में हुई जब लोग स्वयं निकलकर इसे मुक्त कराने लगे। इसी तरह हिंदुओं के कई धर्मस्थलों या धर्म स्थानों की मुक्ति के दृश्य भी सामने आए।<br />
	<br />
	कई जगह हमने देखा कि चुनाव परिणाम के बाद गांवों में कुछ लोग नारा लगाते हुए निकले और गुस्से में कोई तृणमूल का दिखा तो उसकी हल्की पिटाई कर दिया, उसके घर पर दो-चार डंडों का प्रहार कर फिर नारा लगाते चलते बने। ये दृश्य भी हिंसा के ही है और रुकने चाहिए पर ये डरावने नहीं हैं। यह बताता है कि तृणमूल शासन में दादागिरी और माफियागिरी का साम्राज्य हो गया था। इसके विरुद्ध लोगों में गुस्सा होना स्वाभाविक है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरी ओर अगर विजय जुलूसों पर बमों से हमला हो या खींचकर मार दिया जाए या सरकार बदल गई इसके नाम पर लोगों की पिटाई हो, हत्या हो तो साफ है प्रदेश में स्वस्थ लोकतांत्रिक वातावरण नहीं है। सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी जो तब मुख्यमंत्री नहीं थे के सहयोगी देवनाथ रथ की हत्या की हो रही है। उन्हें उत्तर 24 परगना के मध्यग्राम में सड़क पर ढेर कर अंदर गोली मारी गई। हत्यारे इतने दुस्साहसी थे कि उन्होंने सड़क पर ओवरटेक कर गाड़ी आगे से घेरा, मोटरसाइकिल से उतरकर छाती में प्रोफेशनल हत्यारे की तरह से गोली मारी और देखा कि उनके मृत्यु हुई कि नहीं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसमें गिरफ्तारियां बता रही है कि यह पूर्व नियोजित था जिसमें भाड़े के हत्यारों का उपयोग हुआ था। इसे राजनीतिक हिंसा से अलग करके नहीं देख सकते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम की संध्या भाजपा केंद्रीय कार्यालय में भाषण देते हुए कहा कि राजनीतिक हिंसा रुकनी चाहिए और हमें बदले की नहीं बदलाव की राजनीति करनी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने चुनाव परिणाम के बाद ही बयान दिया था जो भी पार्टी से जुड़ा व्यक्ति हिंसा करेगा उसे निष्कासित कर दिया जाएगा। फिर इस पर पत्रकार वार्ता करके स्पष्ट अपील की गई एवं चेतावनी दी गई। सत्ता संभालते हैं शिवेंदु अधिकारी ने सबसे ज्यादा फोकस कानून व्यवस्था पर किया और धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	चुनाव से जुड़ी हिंसा चाहे वह पूर्व हो या बाद में इस बात का प्रमाण होता है कि कोई दल या नेता हर हाल में केवल अपनी जीत देखना चाहता है। यानी कोई मतदाता उससे खुश है या नाखुश, उसका समर्थक है या नहीं यह मायने नहीं रखता बल्कि हर हाल में उसका मत उसे चाहिए। यानी अगर वह दूसरे को मत देना चाहता है तो या तो मतदान केंद्र तक न जाए या अगर दे दिया तो उसे हर हाल में सबक सिखाना है ताकि भविष्य में कोई ऐसा न कर सके। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पश्चिम बंगाल में 1970 के दशक में कांग्रेस ने इसकी शुरुआत की, बाद में वाम मोर्चा इसके विरुद्ध आवाज उठाकर सत्ता में आया लेकिन राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध हिंसा, हत्या, दमन उत्पीड़न, उनकी संपत्तियों पर कब्जा, आगजनी आदि को सत्ता का संपूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ। ममता बनर्जी ने इसके विरुद्ध जबरदस्त संघर्ष किया, स्वयं अपने कार्यकर्ताओं के साथ वह भी सत्ता संरक्षित हिंसा का शिकार हुई। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	विडंबना देखिए कि सत्ता में आने के बाद ममता और तृणमूल वाम मोर्चा से ज्यादा खतरनाक तरीके से राजनीतिक हिंसा को आगे बढ़ा दिया। देश के सामने तृणमूल सत्ता संरक्षित हिंसा की भयानक घटनाएं 2018 पंचायत चुनाव के समय और उसके बाद सामने आए। जगह-जगह लूट, आगजनी, बलात्कार, हत्या की घटनाएं हुई तथा भारी संख्या में लोगों को अपने स्थान से दूर या राज्य से बाहर पलायन करना पड़ा। 2022 विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1900 से ज्यादा हिंसा की घटनाएं दर्ज की। इनमें से लगभग ढाई दर्जन हत्या के मामले की जांच सीबीआई के जिम्मे है और मुकदमा चल रहा है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	2026 के विधानसभा चुनाव बिल्कुल भिन्न था। चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सवा दो लाख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के जवान तैनात किए और गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा किया कि ये चुनाव के बाद दो महीने तक तैनात रहेंगे। जितना संभव हुआ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के स्थानांतरण, चुनाव तक कार्य मुक्ति तथा उनकी जगह प्रदेश या बाहर से अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की गई। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन सबके कारण सुरक्षा का माहौल बना और हर हाल में जीतने की लालसा वाले न आतंक का माहौल बना सके और न हिंसा कर सके। पिछले 6 दशक में बंगाल का पहला चुनाव था जिसमें कोई हत्या नहीं हुई और जो हिंसारहित था। किंतु तृणमूल कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में सत्ता के साथ ऐसे निहित स्वार्थी तत्व खड़े कर दिए हैं जो पराजय पचा नहीं सकते क्योंकि इससे उनका जीवन सीधे प्रभावित होता है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	उदाहरण के लिए अगर बंगाल की सड़कों पर तृणमूल के लोग टोल नाका बना वसूली कर रहे थे और एक दिन में सारे बंद हो गये तो उससे कितने लोगों की अवैध आय का अंत हो गया। ऐसे लोग उनके विरुद्ध प्रतिशोध लेने की हर संभव कोशिश करेंगे तो जिन्होंने पार्टी उम्मीदवारों को हराने में भूमिका निभाई। इसी तरह हर स्तर पर कट मनी और सिंडिकेट सत्ता का स्वाभाविक अंग बन चुका था। जो लोग इन सबसे प्रभावित हुए या जिनका इनसे संघर्ष हुआ उनके अंदर भी गुस्सा होगा। सामान्य प्रशासन, पुलिस प्रशासन सबका अति तृणमूलीकरण हो चुका है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	तृणमूल से जुड़े किसी नेता के भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई का हिंसक विरोध और यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियों पर हमले और खदेड़े जाने के दृश्य हम सबने देखे। जब उनकी नेत्री ममता बनर्जी कह रहीं हैं कि चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों ने मिलकर उन्हें हराया और भाजपा को जिताया तो इसका संदेश इन सबके बीच क्या गया है यह बताने की आवश्यकता नहीं। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	यह एक प्रकार से अपने लोगों को उकसाना है कि आप शक्ति प्रदर्शित करो और इस चुनाव परिणाम को स्वीकार मत करो। ममता बनर्जी ने किसी बयान में नहीं कहा कि हमें हिंसा नहीं करनी है और हमारा विरोध लोकतांत्रिक तरीके से हो। इस तरह देखें तो निष्कर्ष है कि राजनीतिक हिंसा को पूरी तरह नियंत्रित करना बंगाल के लिए बड़ी चुनौती है। हालांकि दंगाइयों अपराधी यो आदि के विरुद्ध कि तेजी से कारवाइयां हो रही है उनसे उम्मीद जगाती है कि राजनीतिक हिंसा का अंत होगा।</p>
<p>
	<br />
	(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। &#39;वेबदुनिया&#39; इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/my-blog/how-did-these-election-results-come-about-126050800007_1.html" target="_blank">आखिर कैसे आए ये चुनाव परिणाम</a></strong></p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 11:45:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 21 May 2026 11:47:56 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>अवधेश कुमार</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईरान युद्ध: कितनी असरदार है भारत की बहु-पक्षीय रणनीति?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-war-india-foreign-policy-test-pm-modi-visit-uae-europe-energy-crisis-126052000004_1.html</link>
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      <description><![CDATA[भारत ने पश्चिम एशिया की परस्पर विरोधी ताकतों के बीच जिस सावधानी से संतुलन बनाए रखा है, वह उसकी बड़ी उपलब्धि रही है। हालांकि, मौजूदा संकट यह संकेत दे रहा है कि यह संतुलन बनाए रखना भारत के लिए कितना मुश्किल होता जा रहा है।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="narendra modi " class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-04/18/full/1776536090-7302.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="narendra modi " width="1200" /></p>
	मुरली कृष्णन</p>
<p>
	भारत को लंबे समय से इस बात पर गर्व रहा है कि उसने ऐसे काम किए हैं, जिन्हें कुछ बड़ी ताकतें ही कर पाई हैं। उसने ईरान से तेल खरीदा, इजराइल के साथ रक्षा संबंध बनाए, अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत किए और खाड़ी देशों के राजघरानों के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाए। साथ ही, उसने इस बात पर भी जोर दिया कि वह किसी क्षेत्रीय गुट या औपचारिक गठबंधन में शामिल नहीं होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, ईरान युद्ध भारत के इस पुराने फॉर्मूले की कड़ी परीक्षा ले रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी इसका दबाव साफ दिख रहा है। वे 15 से 20 मई के बीच 6 दिनों में पांच देशों एक अहम कूटनीतिक दौरे पर निकले हैं, जिसमें वे संयुक्त अरब अमीरात और चार यूरोपीय देशों की यात्रा कर रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत के लिए ईरान युद्ध केवल किसी दूरदराज इलाके में पैदा हुआ ऊर्जा संकट भर नहीं है। यह भारत की मध्य-पूर्व विदेश नीति के उस मूल सिद्धांत के लिए सीधी चुनौती है, जिसके तहत भारत यह मानता आया है कि वह इस क्षेत्र की हर बड़ी शक्ति के साथ संबंध बनाए रखते हुए भी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बरकरार रख सकता है। भले ही, उन शक्तियों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता क्यों न हो।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	ज्यादा मुश्किल माहौल का सामना कर रहा है भारत</h3>
<p>
	अमिताभ मट्टू, दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के डीन हैं। वह कहते हैं कि भारत ने दशकों तक ऐसा संतुलन बनाने में महारत हासिल की, जिसकी जड़ें ‘कठोर यथार्थवाद&#39; में थीं। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत ने अपनी विदेश नीति को जमीनी हकीकत और राष्ट्रीय हितों के आधार पर बेहद सधे हुए अंदाज में तय किया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मट्टू ने डीडब्ल्यू से कहा, "लेकिन ईरान युद्ध ने इस समीकरण को कहीं ज्यादा मुश्किल बना दिया है। रणनीतिक स्वायत्तता सबसे अच्छी तरह तब काम करती है, जब दुनिया में कई शक्तियां हों और हालात बदलते रहते हों।” उन्होंने आगे कहा, "यह तब और भी मुश्किल हो जाता है, जब विरोधी खेमे एक ही समय पर राजनीतिक वफादारी, प्रतिबंधों का पालन और सुरक्षा तालमेल इन सभी की मांग करने लगते हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मट्टू इस बात को लेकर बिल्कुल स्पष्ट हैं कि जब संकट गहराता है और दबाव अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तो रणनीतिक व्यवस्था का कौन सा हिस्सा सबसे पहले बिखरता है। बतौर मट्टू, "अगर बात हद से आगे बढ़ जाती है, तो भारत हमेशा अपनी आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देगा। भारत की कोई भी सरकार लंबे समय तक तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव, होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में रुकावटें या लगातार बढ़ती घरेलू महंगाई को बर्दाश्त नहीं कर सकती।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, वे इस तरह के कदमों को अमेरिका या इजराइल के साथ रिश्तों में दरार कहने से बचते हैं। मट्टू कहते हैं, "भारत के व्यापक रणनीतिक भविष्य के लिए अमेरिका के साथ बेहतर संबंध बहुत जरूरी है। चाहे वह तकनीक हो, रक्षा हो, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाना हो या वैश्विक पूंजी तक पहुंच। इजराइल एक महत्वपूर्ण रक्षा और खुफिया साझेदार बना हुआ है। खाड़ी देश ऊर्जा, प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले धन और वहां रहने वाले भारतीयों की स्थिरता के लिए मायने रखते हैं। वहीं, भौगोलिक स्थिति और महाद्वीपीय पहुंच के लिए ईरान का अपना महत्व है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उनके आकलन के मुताबिक, इस संकट ने जिस चीज को उजागर किया है वह महज एक नीतिगत दुविधा से कहीं ज्यादा बड़ी बात है। उन्होंने कहा, "भारत अब पश्चिम एशिया में सिर्फ एक दर्शक बनकर नहीं रह गया है। इस क्षेत्र पर उसकी निर्भरता का मतलब है कि वहां तनाव बढ़ने की हर घटना अब सीधे तौर पर भारत की ‘महाशक्ति&#39; बनने की महत्वाकांक्षाओं की परीक्षा लेती है। रणनीतिक स्वायत्तता अब महज एक नारा नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ‘कड़ी परीक्षा&#39; बन गई है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मट्टू जिस विरोधाभास की बात कर रहे हैं, वह किसी बाहरी विफलता से नहीं, बल्कि भारत की अपनी कूटनीतिक कामयाबियों से उपजा है। भारत ने पिछले दशकों में जो सफलता हासिल की है, वही अब उसके लिए जटिल पहेली बन गई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मट्टू कहते हैं, "भारत रणनीतिक स्वायत्तता चाहता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर उसका जुड़ाव जितना गहरा होता जा रहा है, बड़े संघर्षों के समय भू-राजनीतिक रूप से ‘गुटनिरपेक्ष&#39; रहना उतना ही कठिन होता जा रहा है। मौजूदा दौर में गुटों में बंटे हुए पश्चिम एशिया में तटस्थ बने रहना अब एक सामान्य नीति नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘विशेषाधिकार&#39; है जिसे बरकरार रखना अब भारत के बस के बाहर होता जा रहा है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	कठिन समय में बहु-पक्षीय कूटनीति पर टिके रहना</h3>
<p>
	हर कोई इस बात को नहीं मानता कि भारत का यह सिद्धांत पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर है। रिटायर्ड राजनयिक और फलीस्तीनी अथॉरिटी में भारत के पहले प्रतिनिधि रहे टी। एस। तिरुमूर्ति का तर्क है कि ईरान युद्ध वास्तव में, नई दिल्ली के लिए इसी मौजूदा रास्ते पर बने रहने का एक बड़ा कारण है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "अब तक, पश्चिम एशिया सहित अन्य देशों के मामले में हमारी बहु-पक्षीय नीति ने हमें बहुत लाभ पहुंचाया है। स्वतंत्र निर्णय लेने तथा क्षेत्रीय विवादों के बीच रास्ता खोजने के हमारे दायरे को बढ़ाया है। जब हम इस नीति से भटकते हैं और किसी एक पक्ष की ओर झुकने की कोशिश करते हैं, तब हमारी रणनीतिक आजादी और विकल्प सीमित हो जाते हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने इस विचार को भी खारिज कर दिया कि भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों के बीच किसी एक को चुनने का ही विकल्प है। उन्होंने कहा, "असल में, हमने हाल के दिनों में ऐसे मुद्दों के बीच सफलतापूर्वक संतुलन बनाया है। हमने अपनी ऊर्जा आपूर्ति भी सुरक्षित रखी है। साथ ही, इजराइल और अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंध भी बनाए रखे हैं। हाल का इतिहास ऊर्जा सुरक्षा पर भारत के फैसलों की समझदारी को साबित करता है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भारत का तेल भंडार घटने से बढ़ रहा दबाव</h3>
<p>
	भारत की संतुलन बनाए रखने वाली इस रणनीति को जारी रखने की क्षमता सिर्फ कूटनीतिक कौशल पर निर्भर नहीं करती। यह देश की आर्थिक मजबूती पर भी निर्भर करती है। अगर क्षेत्रीय संघर्ष लंबे समय तक चलता है, तो उससे पड़ने वाला आर्थिक बोझ भारत के लिए संभालना लगातार मुश्किल होता जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े हिस्से के आयात के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। 90 लाख से अधिक भारतीय खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं। उनके द्वारा भेजा गया पैसा भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सहारा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है। इसमें रुकावट की जरा सी आशंका भी भारत के आयात के हिसाब-किताब, बीमा लागत, महंगाई और वित्तीय स्थिरता के लिए एक बड़ा झटका साबित होती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भारत ने इस स्थिति से निपटने के लिए अलग-अलग देशों से तेल खरीदना शुरू किया है। व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना को तैनात किया गया है, लेकिन ये दोनों ही कदम काफी महंगे साबित हो रहे हैं। हालांकि, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार अस्थायी झटकों को तो झेल सकते हैं, लेकिन वे खाड़ी क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाले किसी संघर्ष का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	ईरान में पूर्व राजदूत: &#39;भारत को तटस्थ बने रहना चाहिए&#39;</h3>
<p>
	ईरान में पूर्व राजदूत रहे गद्दम धर्मेंद्र का कहना है कि भारत, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के सदस्यों के साथ अपने ‘ऐतिहासिक रूप से करीबी रिश्तों&#39; का विस्तार कर रहा है। इन सदस्यों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन शामिल हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	धर्मेंद्र ने डीडब्ल्यू को बताया, "इसलिए, नई उभरती दरारों के बीच भारत किसी एक पक्ष का साथ देने से बचेगा। ऊर्जा के बड़े आयातक के तौर पर, भारत की रणनीतिक प्राथमिकता अपनी हाइड्रोकार्बन (तेल और गैस) आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करनी होगी। होर्मुज में रुकावट और खाड़ी देशों में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान ने इस क्षेत्र पर भारत की पारंपरिक निर्भरता को गंभीर दबाव में डाल दिया है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, धर्मेंद्र यह भी मानते हैं कि भारत संतुलन बनाने की अपनी रणनीति को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसमें कुछ बदलाव करेगा। बतौर धर्मेंद्र, "इस स्थिति में अमेरिका, भारत के ऊर्जा आयात में बड़ी भूमिका निभा सकता है। चूंकि अमेरिका अब भारी मात्रा में कच्चे तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस का निर्यात कर रहा है, वह भारत की खाड़ी देशों पर निर्भरता को कम कर सकता है। इसलिए, हमें इसे ‘जीरो-सम गेम&#39; (एक का नुकसान, दूसरे का फायदा) के रूप में देखने के बजाय, ‘नेट-नेट विन&#39; (दोनों के लिए फायदेमंद स्थिति) के रूप में देखना चाहिए।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ‘तटस्थता का रुख बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन खाड़ी में हो रहे बदलावों के कारण अब यह जरूरत बन गया है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या भारत अब अमेरिका-इजराइल की ओर झुक रहा है?</h3>
<p>
	सबसे असहज करने वाला सवाल यह नहीं है कि क्या भारत औपचारिक रूप से किसी एक पक्ष को चुनेगा, बल्कि यह है कि क्या उसके फैसलों का असर पहले से ही उसके लिए वह चुनाव कर रहा है?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	स्वतंत्र शोध मंच ‘मांत्रया&#39; की संस्थापक शांथी मैरिएट डिसूजा कहती हैं कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से ‘रणनीतिक स्वायत्तता&#39; को ऐसे लचीले सिद्धांत के रूप में इस्तेमाल किया है जो विरोधाभासी संबंधों के बीच भी तालमेल बिठाने में सक्षम है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डिसूजा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह अवधारणा खुद दबाव में नहीं आई है, लेकिन परस्पर विरोधी हितों वाले देशों के साथ संबंधों को संतुलित करने की भारत की क्षमता निश्चित रूप से भारी दबाव में है। यदि यह युद्ध और अधिक लंबा खिंचता है, तो यह संतुलन बनाए रखना लगभग असंभव हो जाएगा।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	भले ही भारत औपचारिक रूप से किसी गुट में शामिल होने का विरोध करना जारी रखे हुए है, लेकिन उसकी सबसे गहरी रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक साझेदारियां तेजी से अमेरिका, इजराइल और प्रमुख खाड़ी देशों के साथ मजबूत हो रही हैं। इस दौरान, वह ईरान के साथ भी कामकाजी संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डिसूजा ने कहा, "भारत अभी भी इस बात पर दांव लगाएगा कि मध्यस्थता के जरिए युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाए, जो कि सबसे अच्छी स्थिति होगी। प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा बहु-राष्ट्रीय दौरा, जिसकी शुरुआत यूएई से हो रही है, संभवतः इन्हीं राजनयिक कोशिशों को दिखाता है।”</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 08:38:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 20 May 2026 08:47:19 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईयू में जेट फ्यूल की कमी का खतरा, उड़ानें हो सकती हैं रद्द]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-war-jet-fuel-price-hike-air-travel-crisis-hormuz-blockade-126051900003_1.html</link>
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      <description><![CDATA[ईरान में अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित पड़ा है। तनाव की वजह से यहां तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। दुनियाभर में जेट ईंधन महंगा हो गया है। इसकी कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गई हैं। विमानन कंपनियों ने कटौती ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="aviation turbine fuel" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/19/full/1779162456-6196.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="aviation turbine fuel (Photo : AI generated)" width="1200" /></p>
	</p>
	शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	ईरान में अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू होने के बाद से होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित पड़ा है। तनाव की वजह से यहां तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। दुनियाभर में जेट ईंधन (एविएशन फ्यूल) महंगा हो गया है। इसकी कीमतें दोगुने से ज्यादा बढ़ गई हैं। जेट ईंधन की कीमत पहले 85-90 डॉलर प्रति बैरल थी। यह बढ़कर 150-200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। विमानन कंपनियों ने कटौती करना शुरू कर दिया है। हवाई यात्रा के टिकट महंगे हो रहे हैं। लुफ्थांसा, एयर कनाडा और एयर फ्रांस (केएलएम) जैसी कई बड़ी एयरलाइंस तो कई उड़ानों को भी रद्द कर रही हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस बीच यूरोपीय संघ के ऊर्जा आयुक्त डैन यॉर्गेंसन ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में बताया कि फिलहाल जेट ईंधन की आपूर्ति पर कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। लेकिन भविष्य में इसकी कमी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जेट ईंधन की कमी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की आगे की स्थिति पर निर्भर करती है। यह भी देखना अहम होगा कि एयरलाइंस क्या फैसला लेती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दुनिया भर का करीब 20 फीसदी तेल और गैस होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से गुजरता है। डैन यॉर्गेंसन कहते हैं, "फिलहाल जेट ईंधन की कमी जैसी स्थिति नहीं बनी है। लेकिन यूरोपीय संघ का कार्यकारी निकाय सदस्य देशों के साथ इस स्थिति से निपटने के तरीकों पर बातचीत शुरू करेगा।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बंद भी हो सकती है हवाई यात्रा</h3>
<p>
	ईरान युद्ध की वजह से फरवरी के आखिर से कई बाजारों में जेट ईंधन की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। एयरलाइंस पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। ईंधन का खर्च उनकी कुल संचालन लागत का बड़ा हिस्सा होता है। पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने एसोसिएटेड प्रेस को दिए इंटरव्यू में बताया कि यूरोप के पास जेट ईंधन का भंडार शायद केवल करीब छह हफ्तों के लिए ही बचा है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर ईरान युद्ध की वजह से तेल की सप्लाई बंद रही, तो जल्द ही उड़ानें रद्द करनी पड़ सकती हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डैन यॉर्गेंसन के मुताबिक ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ईयू ने उतनी ही मात्रा में ईंधन खरीदने के लिए 35 अरब यूरो (करीब 41 अरब डॉलर) ज्यादा खर्च करने पड़े हैं। यानी यूरोप को जल्द ही पेट्रोल, डीजल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी और दूसरे ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ना होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डैन यॉर्गेंसन ने कहा, "असल में यह ऊर्जा संकट नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधन का संकट है। 2022 में रूस द्वारा यूक्रेन पर हमला करने के बाद से ईयू ने अपनी ऊर्जा सप्लाई के स्रोत बढ़ाए हैं। ऊर्जा का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर तरीके से किया जा रहा है। नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया है।"</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	संकट से उबरने की कैसी है तैयारी</h3>
<p>
	साइप्रस के ऊर्जा मंत्री और यूरोपीय संघ के रोटेटिंग प्रेजिडेंट माइकल डेमियानोस को उम्मीद की है कि देश के दक्षिणी तट के पास मिले प्राकृतिक गैस भंडार से गैस की सप्लाई 2027 के आखिर या 2028 की शुरुआत तक यूरोपीय बाजार तक पहुंच सकती है। वह बताते हैं कि यूरोप प्रदूषण कम करना चाहता है और 2040 तक ग्रीनहाउस गैसों को 90 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखे हुए है। इसके बावजूद आने वाले समय में प्राकृतिक गैस जैसे ईंधनों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	साथ ही यूरोप खाड़ी देशों से बात कर रहा है। अगर आगे चलकर ईरान के साथ शांति समझौता हो जाता है, तो यूरोप चाहता है कि उस क्षेत्र से तेल और गैस की सप्लाई फिर से पहले की तरह शुरू हो जाए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पिछले महीने यूरोपीय संघ परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेयर लाएन ने कहा था कि यूरोपीय संघ खाड़ी देशों के साथ ऐसे नए प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए तैयार है जिनके जरिए दुनिया के बाजारों तक ऊर्जा पहुंचाई जा सके और जो भू-राजनीतिक तनाव के कारण प्रभावित न हों।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 08:50:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 19 May 2026 09:18:22 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या अमेरिका के पास है ईरान का यूरेनियम हटाने का कोई प्लान?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-nuclear-program-uranium-stockpile-donald-trump-126051600004_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/iran-nuclear-program-uranium-stockpile-donald-trump-126051600004_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/03/thumb/1_1/1777774802-6964.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/03/thumb/1_1/1777774802-6964.jpg</image>
      <description><![CDATA[ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से विवादों का कारण रहा है। आज कई ईरानी नागरिक ‘येलोकेक', ‘सेंट्रीफ्यूज' और ‘संवर्धन' जैसे शब्दों को संकट, अस्थिरता और युद्ध से जोड़कर देखते हैं। यूरेनियम संवर्धन पर सरकार की जिद के कारण देश पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="US plan on Iran uranium" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/03/full/1777774802-6964.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="US plan on Iran uranium" width="1200" /></p>
	एरफान कासरेई | डार्को जानजेविच</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से विवादों का कारण रहा है। आज कई ईरानी नागरिक ‘येलोकेक&#39;, ‘सेंट्रीफ्यूज&#39; और ‘संवर्धन&#39; जैसे शब्दों को संकट, अस्थिरता और युद्ध से जोड़कर देखते हैं। यूरेनियम संवर्धन पर सरकार की जिद के कारण देश पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक, इससे देश को लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर का सीधा आर्थिक नुकसान हुआ है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान और अमेरिका के बीच हालिया सैन्य संघर्षों और अस्थिर संघर्ष-विरामों के दौरान, परमाणु कार्यक्रम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। अमेरिका का पूरा ध्यान विशेष रूप से ईरान के परमाणु भंडार पर है। माना जाता है कि ईरान के पास 440 किलोग्राम से अधिक ऐसा यूरेनियम है जो 60 फीसदी तक संवर्धित हो चुका है। नागरिक ऊर्जा जरूरतों, जैसे कि परमाणु संयंत्रों से बिजली उत्पादन के लिए इतनी शुद्धता की जरूरत नहीं होती है। सैद्धांतिक रूप से, इस सामग्री को बहुत कम समय में 90 फीसदी तक संवर्धित किया जा सकता है, जो परमाणु बम बनाने के लिए काफी है।</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	क्या अमेरिका और ईरान मिलकर ये काम करेंगे?</h3>
<p>
	राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस यूरेनियम भंडार के लिए अक्सर ‘न्यूक्लियर डस्ट&#39; शब्द का इस्तेमाल करते हैं। यह जून 2025 के उस सैन्य हमले की ओर इशारा है, जिसके बारे में ट्रंप का मानना है कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षमताओं को ‘जड़ से खत्म&#39; कर दिया था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ट्रंप ने बार-बार कहा है कि अमेरिका इस परमाणु सामग्री पर कब्जा कर लेगा, लेकिन यह कैसे किया जाएगा, इसके बारे में उन्होंने विरोधाभासी बयान भी दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ‘ईरान के साथ मिलकर ढेर सारी खुदाई मशीनों के साथ&#39; मलबे के नीचे से इसे खोदकर निकालेगा, शायद किसी शांति समझौते के बाद। अप्रैल में, ट्रंप ने कहा था कि ईरान अपना भंडार सौंपने को तैयार है, जबकि पिछले हफ्ते उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका को ‘नुकसान उठाना&#39; पड़ सकता है क्योंकि ‘परमाणु हथियार लेने के लिए हमें ईरान तक का सफर तय करना होगा।&#39;</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान ने अभी तक यूरेनियम भंडार से संबंधित किसी भी समझौते की पुष्टि नहीं की है। मार्च में अमेरिकी ब्रॉडकास्टर ‘सीबीएस&#39; से बात करते हुए, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि पिछले साल के हमले के बाद यह सामग्री अभी भी मलबे के नीचे दबी हुई है। ईरान के पास इसे बाहर निकालने का ‘कोई कार्यक्रम&#39; या ‘कोई योजना&#39; नहीं है। हालांकि, अराघची ने इस बात का भी ध्यान रखा कि भविष्य में अमेरिका के साथ किसी समझौते के तहत अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम की ‘गुणवत्ता कम करने&#39; की संभावना को पूरी तरह खारिज न किया जाए।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	ईरान के परमाणु भंडार का ठिकाना स्पष्ट नहीं</h3>
<p>
	हालिया मीडिया रिपोर्टों से यह भी संकेत मिले हैं कि ईरान अपने भंडार के एक हिस्से की ‘गुणवत्ता कम करने&#39; और बाकी बचे हिस्से को किसी तीसरे देश को सौंपने के लिए तैयार था। इसी बीच, पिछले हफ्ते के आखिर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि उनका देश ईरान के संवर्धित यूरेनियम को सुरक्षित रखने के लिए तैयार है। हालांकि, अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह सामग्री असल में कहां रखी हुई है। इसे हासिल करने के लिए किन तकनीकी चुनौतियों को दूर करने की जरूरत होगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्र इस्फहान, फोर्डो और नतांज पिछले साल हुए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर&#39; के दौरान भारी नुकसान झेल चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने अप्रैल 2026 के आखिर में कहा था कि ईरान का अधिकांश अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम संभवतः अभी भी इस्फहान परमाणु परिसर में ही मौजूद है। उनके मुताबिक, नीले रंग के 18 कंटेनर में लगभग 200 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम होने का अनुमान था, जो 9 जून 2025 को इस्फहान परमाणु प्रौद्योगिकी केंद्र की एक सुरंग में ले जाए गए थे। यह घटना 12 दिवसीय युद्ध शुरू होने से ठीक चार दिन पहले की है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, परमाणु भंडार को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि यह सामग्री अब फोर्डो या ईरान के बुशेहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में जमा कर के रखी गई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ईरान ने संकेत दिया है कि वह केवल अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की देखरेख में ही इस सामग्री को वापस निकालेगा। मेडिकल फिजिक्स और रेडिएशन सुरक्षा के विशेषज्ञ रोलैंड वोल्फ ने कहा, "ईरान से इस सामग्री को हटाना तकनीकी रूप से असंभव नहीं है, लेकिन यह कई अन्य बातों पर भी निर्भर करता है। आईएईए की कड़ी निगरानी में, इस सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है और देश से बाहर पहुंचाया जा सकता है।” वह आगे बताते हैं, "इसके लिए विशेष सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा। चूंकि ईरान संवर्धित यूरेनियम को फोर्डो जैसे भूमिगत स्थानों पर जमा करके रखता है। इसलिए, वहां तक पहुंचने और सामग्री को सुरक्षित बाहर निकालने का काम तकनीकी और भौतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	क्या लीबिया एक रोल मॉडल बन सकता है?</h3>
<p>
	ईरान से 440 किलोग्राम से अधिक संवर्धित यूरेनियम को हटाने में शामिल तकनीकी चुनौतियां इस पूरी समस्या का केवल एक पहलू हैं। सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शायद ज्यादा अहमियत रखेंगे।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के पूर्व राजदूत रहे जॉन बोल्टन ने ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर काम किया था। उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में लीबिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म किए जाने का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वह कार्यक्रम ‘काफी छोटा&#39; था। 2003 और 2004 में परमाणु सामग्री को हटाने की पहल किसी संघर्ष के बीच नहीं, बल्कि एक ‘अनुकूल माहौल&#39; में हुई थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बोल्टन ने डीडब्ल्यू को बताया, "अमेरिका और ब्रिटेन के अधिकारी लीबिया गए। उन्होंने सब कुछ पैक किया और उसे ओक रिज, टेनेसी ले आए, जहां वह आज भी मौजूद है। मुझे लगता है कि हम ईरान के कार्यक्रम के साथ भी ऐसा ही कुछ कर सकते हैं, बशर्ते वहां का माहौल अनुकूल हो, लेकिन इसमें बहुत अधिक समय लगेगा क्योंकि ईरान का कार्यक्रम काफी आगे बढ़ चुका है। बतौर बोल्टन, "सबसे जरूरी बात यह है कि अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम या कार्यक्रम के अन्य पहलुओं को आतंकवादियों या अन्य ‘दुष्ट देशों&#39; के हाथों में न पड़ने दिया जाए।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	बोल्टन ने ईरान के शासन की विचारधारा को &#39;कट्टर&#39; बताया</h3>
<p>
	बोल्टन ने डीडब्ल्यू को यह भी बताया कि जब तक ईरान में अयातोल्लाहों की सत्ता और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का वर्चस्व है, तब तक परमाणु खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, ईरान के परमाणु हथियारों के सपने को स्थायी रूप से रोकने के लिए वहां के शासन को जड़ से उखाड़ना ही एकमात्र विकल्प है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह कहते हैं, "उनकी विचारधारा कट्टरपंथी है। इस्लामिक समुदाय के भीतर अपना दबदबा बनाने तथा भौगोलिक रूप से मध्य-पूर्व में अपना वर्चस्व स्थापित करने की आकांक्षाओं पर आधारित है। वे अस्थायी रूप से रियायतें दे सकते हैं। मुझे उन पर भरोसा नहीं है कि वे लंबे समय तक अपने वादों पर टिके रहेंगे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 09:37:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Sat, 16 May 2026 09:44:28 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बड़े शहरों में 'बिहारी' पहचान के मायने और हिंसा पर उठे सवाल]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/delhi-police-constable-shoots-bihari-migrant-pandav-kumar-identity-discrimination-126051500010_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/15/thumb/1_1/1778824571-9616.jpg"/>
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      <description><![CDATA[बिहार के खगड़िया जिले के मूल निवासी 21 वर्षीय पांडव कुमार दिल्ली में रह कर फूड डिलीवरी का काम करते थे। 25 अप्रैल की रात करीब ढाई बजे वह अपने दोस्त रूपेश कुमार के साथ घर लौट रहे थे। इसी दौरान उनकी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात कॉन्स्टेबल नीरज ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="bihar family in delhi" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/15/full/1778824571-9616.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="Photo : DW/Shivangi Saxena" width="1200" /></p>
	</p>
	शिवांगी सक्सेना</p>
<p>
	बिहार के खगड़िया जिले के मूल निवासी 21 वर्षीय पांडव कुमार दिल्ली में रह कर फूड डिलीवरी का काम करते थे। 25 अप्रैल की रात करीब ढाई बजे वह अपने दोस्त रूपेश कुमार के साथ घर लौट रहे थे। इसी दौरान उनकी दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात कॉन्स्टेबल नीरज से कहासुनी हो गई। रूपेश के मुताबिक, बहस के दौरान नीरज चिल्लाने लगा, "तुम बिहारी हो, यहां से निकल जाओ।” इसके बाद उसने पांडव पर गोली चला दी। गंभीर हालत में पांडव को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऊपरी तौर पर पांडव कुमार की मौत आपराधिक घटना लग सकती है। लेकिन कई और बड़े शहरों के उनके अनुभव दिखाते हैं कि बिहार से आए लोगों को उनकी पहचान की वजह से काफी परेशान और प्रताड़ित किया जाता है। देश में कई बार प्रवासी मजदूर भाषा और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर निशाना बनाए गए हैं। इसी साल मुंबई में बीएमसी चुनाव के दौरान राज ठाकरे ने उत्तर प्रदेश और बिहार से आने वाले लोगों को लेकर कहा कि महाराष्ट्र में हिंदी &#39;थोपने&#39; की कोशिश करने वालों को वह बाहर कर देंगे।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	&#39;बिहारी&#39; होना गुनाह?</h3>
<p>
	दिल्ली के शाहबाद डेरी इलाके में बस्ती अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई है। यहां पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश से आए लोग अपने-अपने मोहल्ले में रहते हैं। इसी इलाके में ऐसे परिवार भी हैं जो खुद को दिल्ली का मूल निवासी मानते हैं। लक्ष्मी देवी को इस बस्ती में रहते एक दशक बीत गया। वह मूल रूप से बिहार के सिमरी की रहने वाली हैं। वह घरों में काम कर महीने में करीब 8 हजार रुपये तक कमा लेती हैं। डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में लक्ष्मी ने बताया कि बिहारी होने की वजह से उन्हें अक्सर ताने सुनने पड़ते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह कहती हैं, "जिन लोगों के घरों में हम काम करते हैं, वे सोचते हैं कि सभी मजदूर बिहार से ही आते हैं। लोग ‘बिहारी&#39; शब्द का इस्तेमाल अक्सर किसी गाली की तरह हमें अपमानित करने के लिए करते हैं। चाहे बिहार से हो या उत्तर प्रदेश से, आपको ‘बिहारी&#39; कहा जाता है। मैं बाजार में थी। मेरे पास 10 रुपये का नोट नहीं था। पास खड़े आदमी ने कहा, &#39;अरे जाने दे, ये तो बिहारन है।&#39; मुझे बहुत बुरा लगा।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में गिना जाता है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम है। खेती के अलावा काम के अवसरों की कमी के कारण हर साल लाखों लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार से करीब 74।54 लाख प्रवासी देश के 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रह रहे हैं। वे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में निर्माण कार्य, सेवा क्षेत्र और असंगठित कामों में रोजगार तलाशते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	लक्ष्मी सिमरी लौटना नहीं चाहती। वह इसकी वजह बताती हैं, "वहां काम के लिए कोई उद्योग और फैक्ट्री नहीं है। मैं पहले अपने गांव में रहती थी। हमारे परिवार को पत्ते जलाकर खाना बनाना पड़ता था क्योंकि जलाने के लिए लकड़ी तक नहीं थी। मैं लौट भी गई, तो बच्चों को खाना कैसे खिलाऊंगी?" वह मानती हैं कि यह सरकार की नाकामी है जिसकी कीमत शहरों में बिहारी प्रवासी चुका रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	स्कूल से ही हो जाती है उत्पीड़न की शुरुआत</h3>
<p>
	कॉलोनी के अधिकतर लोग पांडव कुमार की घटना के बारे में सोशल मीडिया के जरिए जान चुके थे। अनिल कुमार रीटेल शॉप में काम करते हैं। बिहारी होने की वजह से उन्हें स्कूल में बच्चे तंग करते थे। अनिल याद करते हैं, "शायद अगर मैं आरा में अपने गांव में पढ़ाई करता, तो वह बेहतर होता। मेरे पिता दिहाड़ी मजदूर थे। उस वक्त हम समृद्ध नहीं थे। स्कूल के लड़के मुझे मारते हुए घर तक आते थे। वे जानते थे कि हम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। मेरे कजिन भाई कभी दिल्ली नहीं आए। उन्होंने गांव में रहकर पढ़ाई की और सरकारी परीक्षाएं पास कर लीं। मैं वर्कर ही रह गया। दिल्ली का माहौल हमारे लिए अच्छा नहीं है। मानो किसी खास राज्य से होना कोई गलती है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दरभंगा के दुग्धेश्वर पिछले 20 वर्षों से दिल्ली में रह रहे हैं। वह मजदूरी किया करते थे। अब उन्होंने घर पर एक छोटी-सी दुकान शुरू की है। पांडव कुमार के बारे में जानकर वह दुखी हैं। उनका कहना है कि बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा से लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं। लेकिन निशाना खास तौर पर बिहारियों को बनाया जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर बिहार के लोग इस शहर को छोड़ दें, तो दिल्ली वाले भूखे रह जाएंगे। उनके घर साफ नहीं होंगे। ऊंची इमारतें नहीं बनेंगी। हम हर शहर की लाइफलाइन हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	&#39;गरीब, चोर और मजदूर की पहचान बन गया है बिहारी&#39;</h3>
<p>
	दुग्धेश्वर के पड़ोसी ज्ञानेंद्र (बदला हुआ नाम) पास की एक फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। वह अपना अनुभव बताते हैं, "बिहारियों को बदनाम किया जाता है। धारणा बना दी गई है कि बिहारी शहरों में कमाने और चोरी करने आते हैं। मैं नोएडा में बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था। एक बिल्डिंग में चोरी हो गई। आरोप हमारे साथी पर लगा दिया। यह कहकर कि तुम बाहर से हमारे घरों में डकैती करने आते हो। जबकि उसकी कोई गलती नहीं थी। पुलिस के आने से पहले ही उसे पकड़ लिया और बहुत मारा।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुन्ना कुमार उत्तर प्रदेश में बलिया के रहने वाले हैं। वह 1990 के दशक से शाहबाद डेरी में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह बस्ती 2010 के बाद तेजी से बढ़ी। उससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार से लोग दिल्ली काम ढूंढने आते और झोपड़ियां बनाकर रहते थे। उस वक्त से उन्हें यहां से हटाने की कोशिश की जा रही है। मुन्ना बताते हैं, "पहले कंझावला, बवाना और आसपास रहने वाले लोग आते थे और हमें धमकाते थे। वे अब तक कहते हैं कि हमने उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया है। यहां मुख्य बाजार में रहने वाले कुछ लोग खुद को दिल्ली का मूल निवासी बताते हैं। वे बोलते हैं कि इन बिहारी लोगों ने आकर दिल्ली को गंदा कर दिया है। इसके अलावा खासकर बिहारी पुरुषों को लेकर मानसिकता बना दी गई है कि वे दिल्ली में अपराध और हिंसा करते हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इस कॉलोनी में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग अलग-अलग गलियों में रहते हैं। यूपी के लोग खुद को बिहारी कहलाना पसंद नहीं करते, बल्कि वे इससे चिढ़ते हैं। ठेकेदार और फैक्ट्री मालिक इसका फायदा उठाकर मजदूरों का शोषण करते हैं। मुन्ना ने कहा, "फैक्ट्री मैनेजर यूपी के मजदूरों को बिहारियों के खिलाफ भड़काते हैं कि ये लोग कम पैसों में काम कर रहे हैं। जिससे यूपी के मजदूरों को लगता है कि अगर बिहारी नहीं होते, तो उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती।"</p>
<h3>
	 </h3>
<h3>
	मामले ने पकड़ा राजनीतिक तूल</h3>
<p>
	पांडव कुमार की मौत के बाद यह मामला राजनीतिक विवाद का विषय बन गया। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और खगड़िया सांसद राजेश वर्मा ने परिवार से मुलाकात की। बिहार सरकार ने मृतक के परिजनों को आठ लाख रुपये अनुग्रह अनुदान देने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा जनसुराज पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन भी किया।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बिहार के ही आदित्य मोहन ने भी इस प्रदर्शन में भाग लिया था। उनका कहना है कि कुशल कामगारों और अफसरों को भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता, मगर बिहार से आने वाले मजदूरों को काम की जगह पर उत्पीड़न झेलना पड़ता है। स्थानीय लोग मजदूरी का अधिक पैसा मांगते हैं। इसलिए ठेकेदार बिहार के गांवों से मजदूर बुलाते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह डीडब्ल्यू से अपनी बात रखते हैं, "दिल्ली के बदरपुर, नांगलोई, बुराड़ी और ऐसे कई इलाकों में बिहार से आए लोगों ने छोटे प्लॉट खरीदकर एक या दो कमरों के घर बना लिए हैं। दिल्ली की प्रभावशाली और खुद को ताकतवर बताने वाली जातियों को लगता है कि बिहारी आकर उनके संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं। इसी वजह से उनके मन में नफरत है। जो पुलिस कॉन्स्टेबल में भी दिखी। कोई नेता बिहारी प्रवासियों की बात नहीं करता। इसलिए हमें निशाना बनाया जा रहा है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	आदित्य मानते हैं कि इसका अंत तभी होगा जब बिहार में नई फैक्टरियां आएंगी और रोजगार पैदा होगा।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 11:17:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 15 May 2026 11:26:42 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[समुद्री रास्ते बनेंगे ताकत का अखाड़ा?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/malacca-strait-toll-controversy-global-trade-impact-geopolitics-126051400046_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/15/thumb/1_1/1_1/1778824571-9616.jpg"/>
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      <description><![CDATA[क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, "अगर इसे इंडोनेशिया, ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="ship filled with lPG" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-03/27/full/1774579656-7778.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="ship filled with lPG : AI generated" width="1200" /></p>
	कैर्स्टन क्निप</p>
<p>
	क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, "अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी। इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, "होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति‑निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं। यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम</h3>
<p>
	मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया। इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं। नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता चुन रही हैं,  जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं।" उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी इन तीन बातों पर टिकी होती है: ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति। जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार</h3>
<p>
	होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है। लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में &#39;भूगोल की वापसी&#39; हो रही है। होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं। इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है। इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में ‘फ्री ट्रांजिट&#39; यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं। इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं। इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती। यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे कृत्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पर बढ़ता दबाव</h3>
<p>
	लेकिन शोलिक कहते हैं कि असली चुनौती राजनीतिक वास्तविकताएं हैं। उनके मुताबिक, "अंतरराष्ट्रीय कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब उनमें शामिल देश उन्हें मानने को तैयार हों।" और ऐसा हमेशा नहीं होता। ऐसा ही एक उदाहरण है दक्षिण चीन सागर, जहां चीन ने फिलीपींस के हक में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय फैसले को नहीं माना।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरी ओर, विशेषज्ञ मानते हैं कि आज के दौर में बड़ी सैन्य ताकत ही सब कुछ नहीं है। शोलिक का कहना है, "अब किसी जलडमरूमध्य को बाधित करने के लिए बड़ी नौसेना की जरूरत नहीं है।" ईरान का उदाहरण देते हुए वह बताते है कि कैसे ईरान ने छोटी तेज नावों, मिसाइलों और ड्रोन के जरिए भी प्रभावी दबाव बनाया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, विर्थ का यह भी कहना है कि किसी जलडमरूमध्य की पूरी नाकाबंदी करने से उसे रोकने वाले देश को भी बड़ा नुकसान होता है। खास तौर पर ऐसा करने वाले देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में अगर ताइवान और मलक्का जलडमरुमध्य में तनाव कि स्थिति बनती है, तो चीन को इसका भारी खामियाजा भुगतना होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विर्थ बताते हैं कि दक्षिण‑पूर्व एशिया में कुछ दूसरे समुद्री रास्ते भी हैं, जैसे सुंडा जलडमरूमध्य जो सुमात्रा और जावा के बीच स्थित है, या फिर लोम्बोक और बाली के बीच लोम्बोक जलडमरूमध्य। हालांकि इन मार्गों से गुजरना ज्यादा लंबा और खर्चीला है, लेकिन अगर ताइवान या मलक्का जलडमरूमध्य में रुकावट आती है, तो इन मार्गों के होने की वजह से वैश्विक व्यापार कम से कम पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समुद्री रास्तों के अहम बिंदु</h3>
<p>
	दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ रही है। शोलिक "जस्ट‑इन‑टाइम” सप्लाई चेन का जिक्र करते हैं, जिसमें  कंपनियां ज्यादा सामान स्टॉक में नहीं रखतीं। ऐसे में छोटी‑सी आपूर्ति रुकावट भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसी वजह से, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक लक्षण है, कोई अपवाद नहीं। इसका मतलब यह कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कुछ चुनिंदा समुद्री मार्गों पर टिकी हुई है। अगर इनमें से किसी भी मार्ग में रुकावट आती है, तो इसके नतीजे पूरी दुनिया में महसूस होते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यही वजह है कि मलक्का जलडमरूमध्य पर चल रही बहस सिर्फ दक्षिण‑पूर्व एशिया तक सीमित नहीं है। जिस तरह सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया ने टोल या ट्रांसिट शुल्क की बात पर कड़ा विरोध जताया, यह दिखाता है कि भौगोलिक नियंत्रण का इस्तेमाल राजनीतिक और आर्थिक दबाव के रूप में करना कितना आकर्षक हो सकता है। लेकिन अहम मार्गों में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को चुनौती देना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 15:46:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 14 May 2026 15:56:01 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[समुद्री रास्ते बनेंगे ताकत का अखाड़ा?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/malacca-strait-toll-controversy-global-trade-impact-geopolitics-126051400045_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-03/27/thumb/1_1/1774579656-7778.jpg"/>
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      <description><![CDATA[क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, "अगर इसे इंडोनेशिया, ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="ship filled with lPG" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-03/27/full/1774579656-7778.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="ship filled with lPG : AI generated" width="1200" /></p>
	कैर्स्टन क्निप</p>
<p>
	क्या हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने पर शुल्क यानी टॉल लगाना फायदे का सौदा हो सकता है? इंडोनेशिया के वित्त मंत्री पुर्बाया युधि सदेवा ने अप्रैल के अंत में यह बात उछाली। उन्होंने कहा, "अगर इसे इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच बांटा जाए, तो यह काफी फायदेमंद हो सकता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बाद में, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह बात गंभीरता से नहीं कही थी। इसी बीच, इंडोनेशिया के विदेश मंत्री सुगियानो ने कहा कि मलक्का जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही पर कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा और उनका देश इस अहम जलमार्ग में जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही का समर्थन करता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फिर भी, सदेवा के बयान ने यह आशंका तो पैदा कर ही दी कि समुद्री रास्तों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक फायदा हासिल करने के लिए हो सकता है, सिर्फ होर्मुज में नहीं, बल्कि दूसरे जलमार्गों पर भी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने लिखा, "होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इस तरह के अन्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर एशियाई नीति‑निर्माताओं की चिंता बढ़ गई है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	खासकर मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर चिंताएं हैं। यह पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच सबसे अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया का 22 फीसदी समुद्री व्यापार होता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम</h3>
<p>
	मौजूदा दौर में समुद्री लूट और क्षेत्रीय तनाव ही नहीं, अन्य मुद्दे भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले साल नवंबर में सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने इस नए खतरे को लेकर सावधान किया। इस थिंकटैंक ने लाल सागर में हूथी विद्रोहियों के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि अब गैर-राज्य ताकतें भी वैश्विक व्यापार को बाधित करने में सक्षम हैं। नतीजतन, कई शिपिंग कंपनियां स्वेज नहर से दूरी बना रही हैं और अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता चुन रही हैं,  जिसके कारण सप्लाई चेन में देरी और कीमतों में इजाफा हो रहा है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ऑस्ट्रियाई सेना के पूर्व कर्नल और ऑस्ट्रिया इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी के वरिष्ठ सलाहकार निकोलाउस शोलिक मानते हैं कि यह सब भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन में एक बुनियादी बदलाव के संकेत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "आज हम एक घटनाक्रम के नतीजे देख रहे हैं, जिसमें कुछ देश यह मानने लगे हैं कि वे रणनीतिक रूप से अहम समुद्री जलडमरूमध्यों पर कानूनी रूप से प्रभुत्व जमा सकते हैं।" उन्होंने आगाह किया कि अगर होर्मुज, मलक्का या ताइवान के रास्ते भू-राजनीतिक दबाव का जरिया बनते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स के एशिया विश्लेषक क्रिस्टियान विर्थ भी इससे सहमत हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि किसी समुद्री मार्ग की कमजोरी इन तीन बातों पर टिकी होती है: ट्रांसपोर्ट समझौते, वैकल्पिक रास्ते और उसके आसपास के इलाके में राजनीतिक स्थिति। जो मार्ग जितना ज्यादा अहम होता है, उसे अनदेखा करना उतना ही कठिन होता है, और उसकी रणनीतिक अहमियत भी उतनी ही ज्यादा होती है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	भूगोल फिर बना ताकत का नया आधार</h3>
<p>
	होर्मुज जलडमरूमध्य इस समय जोखिम में नजर आ रहा है, जहां से होकर दुनिया भर के लिए बड़ी मात्रा में तेल और गैस जाती है। लेकिन विशेषज्ञ शोलिक कहते हैं कि हमें सिर्फ होर्मुज के तनाव पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका मानना है कि अगर चीन और ताइवान के बीच तनाव बढ़ता है, तो ताइवान जलडमरूमध्य और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। ताइवान जलडमरूमध्य के साथ ही मलक्का जलडमरूमध्य से भी एशियाई व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, आज की दुनिया में &#39;भूगोल की वापसी&#39; हो रही है। होर्मुज, बाब-एल-मंदेब या ताइवान जैसे जलडमरूमध्य अब सिर्फ समुद्री मार्ग नहीं रह गए हैं, बल्कि वे वैश्विक राजनीति में ताकत का हथियार बन चुके हैं। इस इंस्टीट्यूट का यह भी कहना है कि दुनिया के बढ़ते जुड़ाव ने देशों को एक-दूसरे पर अधिक निर्भर बना दिया है। इससे देश अब एक दूसरे पर ज्यादा दबाव भी बना सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विर्थ कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून में यह साफ है कि अहम समुद्री जलडमरूमध्य में ‘फ्री ट्रांजिट&#39; यानी जहाजों को स्वतंत्र रूप से गुजरने का अधिकार होता है। इसका मतलब है कि सभी जहाज, चाहे वे सैन्य हों या असैन्य, बिना रोक-टोक अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र से गुजर सकते हैं। इसीलिए विर्थ कहते हैं कि किसी अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य को बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि तो युद्धपोतों को भी उन तटीय जल सीमाओं के पास से शांतिपूर्ण रूप से गुजरने का अधिकार देती है, जो जलडमरूमध्य के आसपास स्थित देशों की सीमा में आते हैं। इन रास्तों पर कोई टोल या फीस भी नहीं देनी होती। यह टोल सिर्फ पनामा और स्वेज नहरों जैसे कृत्रिम रूप से तैयार जलमार्गों पर ही लिया जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून पर बढ़ता दबाव</h3>
<p>
	लेकिन शोलिक कहते हैं कि असली चुनौती राजनीतिक वास्तविकताएं हैं। उनके मुताबिक, "अंतरराष्ट्रीय कानून तभी प्रभावी होते हैं, जब उनमें शामिल देश उन्हें मानने को तैयार हों।" और ऐसा हमेशा नहीं होता। ऐसा ही एक उदाहरण है दक्षिण चीन सागर, जहां चीन ने फिलीपींस के हक में आए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय फैसले को नहीं माना।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	दूसरी ओर, विशेषज्ञ मानते हैं कि आज के दौर में बड़ी सैन्य ताकत ही सब कुछ नहीं है। शोलिक का कहना है, "अब किसी जलडमरूमध्य को बाधित करने के लिए बड़ी नौसेना की जरूरत नहीं है।" ईरान का उदाहरण देते हुए वह बताते है कि कैसे ईरान ने छोटी तेज नावों, मिसाइलों और ड्रोन के जरिए भी प्रभावी दबाव बनाया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हालांकि, विर्थ का यह भी कहना है कि किसी जलडमरूमध्य की पूरी नाकाबंदी करने से उसे रोकने वाले देश को भी बड़ा नुकसान होता है। खास तौर पर ऐसा करने वाले देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में अगर ताइवान और मलक्का जलडमरुमध्य में तनाव कि स्थिति बनती है, तो चीन को इसका भारी खामियाजा भुगतना होगा।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विर्थ बताते हैं कि दक्षिण‑पूर्व एशिया में कुछ दूसरे समुद्री रास्ते भी हैं, जैसे सुंडा जलडमरूमध्य जो सुमात्रा और जावा के बीच स्थित है, या फिर लोम्बोक और बाली के बीच लोम्बोक जलडमरूमध्य। हालांकि इन मार्गों से गुजरना ज्यादा लंबा और खर्चीला है, लेकिन अगर ताइवान या मलक्का जलडमरूमध्य में रुकावट आती है, तो इन मार्गों के होने की वजह से वैश्विक व्यापार कम से कम पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	समुद्री रास्तों के अहम बिंदु</h3>
<p>
	दोनों विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ रही है। शोलिक "जस्ट‑इन‑टाइम” सप्लाई चेन का जिक्र करते हैं, जिसमें  कंपनियां ज्यादा सामान स्टॉक में नहीं रखतीं। ऐसे में छोटी‑सी आपूर्ति रुकावट भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसी वजह से, सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने चेतावनी दी है कि होर्मुज जलडमरूमध्य एक लक्षण है, कोई अपवाद नहीं। इसका मतलब यह कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कुछ चुनिंदा समुद्री मार्गों पर टिकी हुई है। अगर इनमें से किसी भी मार्ग में रुकावट आती है, तो इसके नतीजे पूरी दुनिया में महसूस होते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यही वजह है कि मलक्का जलडमरूमध्य पर चल रही बहस सिर्फ दक्षिण‑पूर्व एशिया तक सीमित नहीं है। जिस तरह सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया ने टोल या ट्रांसिट शुल्क की बात पर कड़ा विरोध जताया, यह दिखाता है कि भौगोलिक नियंत्रण का इस्तेमाल राजनीतिक और आर्थिक दबाव के रूप में करना कितना आकर्षक हो सकता है। लेकिन अहम मार्गों में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को चुनौती देना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 15:46:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Thu, 14 May 2026 15:53:16 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या भारत में 'एंटी-रैगिंग सिस्टम' कमजोर पड़ रहा है?]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-ragging-deaths-uugc-system-failure-rajendra-kachroo-126051300006_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/india-ragging-deaths-uugc-system-failure-rajendra-kachroo-126051300006_1.html</guid>
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      <description><![CDATA[करीब 17 साल पहले राजेंद्र काचरू का बेटा अमन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। 8 मार्च 2009 को रैगिंग के दौरान लगी चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई। उस समय अमन काचरू की उम्र केवल 19 साल थी। इस मामले में उसके चार सीनियर छात्रों को ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="india ragging deaths uugc system failure rajendra kachroo" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/13/full/1778653456-6917.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="" /></p>
	</p>
	<strong>शिवांगी सक्सेना</strong><br />
	देश के मेडिकल कॉलेजों में रैगिंग के मामले डराने वाले हैं।  साल 2022 से 2024 के बीच देश में रैगिंग से जुड़ी 51 मौतें दर्ज की गईं। कुल शिकायतों में सबसे ज्यादा 38.6 प्रतिशत मामले मेडिकल कॉलेजों में सामने आए। अमन काचरू के पिता का आरोप है कि 2022 के बाद एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन को कमजोर किया गया है।</p>
<p>
	<br />
	करीब 17 साल पहले राजेंद्र काचरू का बेटा अमन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। 8 मार्च 2009 को रैगिंग के दौरान लगी चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई। उस समय अमन काचरू की उम्र केवल 19 साल थी। इस मामले में उसके चार सीनियर छात्रों को 2010 में चार साल जेल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद अमन के पिता राजेंद्र काचरू ने &#39;अमन मूवमेंट&#39; नाम से एनजीओ की शुरुआत की थी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रोफेसर राजेंद्र काचरू ने 2009 यूजीसी एंटी-रैगिंग नियमों तथा नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन विकसित करने में अहम भूमिका निभाई थी। इस ढांचे में 24x7 हेल्पलाइन, प्रशिक्षित रिस्पॉन्डर्स, रियल-टाइम केस ट्रैकिंग, गुमनाम शिकायत की सुविधा, अभिभावकों को रोजाना ईमेल अपडेट और कॉलेजों में वार्षिक सर्वे जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं। उन्होंने इस प्रणाली पर नजर रखने वाला सॉफ्टवेयर भी डिजाइन किया था। वह सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एंटी-रैगिंग टास्क फोर्स के सदस्य भी रह चुके हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हाल ही में ग्रेटर नोएडा की बेनेट यूनिवर्सिटी में कथित रैगिंग और फिर मौत का मामला सामने आने के बाद देश में रैगिंग के बढ़ते आंकड़ों पर एक बार फिर ध्यान गया है। साल 2022 से 2024 के बीच देश में रैगिंग से जुड़ी 51 मौतें दर्ज की गईं। कुल शिकायतों में सबसे ज्यादा 38.6 प्रतिशत मामले मेडिकल कॉलेजों में सामने आए।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2017 में 901, 2018 में 1,016 और 2019 में 1,070 शिकायतें आईं। साल 2020 में कोविड महामारी के कारण इनमें 79.5 प्रतिशत की तेज गिरावट आई और आंकड़ा घटकर 219 रह गया। अगले साल कॉलेज फिर से खुलने लगे और इसी के साथ रैगिंग के मामलों में तेज इजाफा भी देखने को मिला।<br />
	<br />
	2021 में 532 और 2022 में 883 शिकायतें आईं। साल 2023 में 962 शिकायतें मिलीं।  2024 में 1,084 शिकायतें दर्ज हुईं, जो इस अवधि में सबसे अधिक हैं। साल 2022 से 2024 के बीच दर्ज कुल शिकायतों में से 38.6 प्रतिशत शिकायतें मेडिकल संस्थानों से संबंधित थीं। ये आंकड़े एजुकेशन, वीमेन, यूथ एंड स्पोर्ट्स की संसदीय स्थायी समिति ने मुहैया कराए थे। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में राजेंद्र काचरू ने कहा कि उन्हें लगता है कि साल 2022 के बाद से एंटी-रैगिंग सिस्टम के कई अहम प्रावधानों को धीरे-धीरे कमजोर या खत्म करने की कोशिश की जा रही है। कोविड-19 के बाद यूजीसी प्रशासन की प्राथमिकताओं में बदलाव आया है। उन्होंने बताया, "नेशनल एंटी-रैगिंग सेंटर चलाने के लिए कॉन्टैक्ट पर निजी एजेंसियों का चयन किया गया। पहले यह नामांकन के जरिए होता था। ऐसी कई व्यवस्थाएं कथित तौर पर बंद कर दी गईं। हेल्पलाइन केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गई है। संस्थानों की निगरानी नहीं हो रही है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	डीडब्ल्यू हिंदी ने इस मामले में यूजीसी को अपना पक्ष रखने के लिए सवाल भेजे हैं और उन पर लगाए गए आरोपों और रैगिंग के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों को लेकर जवाब मांगा है। इस लेख के प्रकाशित होने तक उनका जवाब नहीं मिल पाया था। जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	यूजीसी के खिलाफ अदालत में याचिका</h3>
<p>
	पिछले साल &#39;अमन मूवमेंट&#39; ट्रस्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। आरोप लगाया गया कि 2009 में अमन काचरू की मौत के बाद देश में जो एंटी-रैगिंग व्यवस्था बनाई गई थी, उसे 2022 के बाद लचर करने का प्रयास  किया गया। जिनसे कॉलेजों की जवाबदेही तय होती थी। याचिका में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा नेशनल रैगिंग प्रिवेंशन प्रोग्राम को एक एनजीओ ‘सेंटर फॉर यूथ (C4Y)&#39; को सौंपने के फैसले पर भी सवाल उठाए गए। ट्रस्ट का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं और चुनी गई संस्था के पास जरूरी अनुभव नहीं है। C4Y अभी भी राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग मॉनिटरिंग एजेंसी के तौर पर सक्रिय है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	प्रोफेसर राजेंद्र काचरू बल देते हुए कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि इस काम के लिए एजेंसी का चयन नामांकन के जरिए होना चाहिए, न कि टेंडर प्रक्रिया से। लेकिन यूजीसी इस पर अड़ा रहा।" एंटी-रैगिंग प्रणाली की दिक्कतों के बारे में काचरू कहते हैं, "अब एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन केवल शिकायतें रिसीव करके कॉलेजों को बताने का काम करता है। गुप्त शिकायत करने की सुविधा में बदलाव आया है। सर्वे के जरिए कार्रवाई की व्यवस्था बंद हो गई है।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	उस दौरान हाई कोर्ट ने छात्र आत्महत्याओं और रैगिंग के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए स्वीकारा कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मजबूत और प्रभावी एंटी-रैगिंग सिस्टम की तुरंत जरूरत है। साथ ही इस बात पर नाराजगी जताई कि एंटी-रैगिंग पहलों पर केवल 44 लाख रुपये खर्च किए गए। हालांकि, कोर्ट ने &#39;सेंटर फॉर यूथ&#39; को दिए गए कॉन्ट्रैक्ट में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।<br />
	<br />
	लेकिन अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए बड़े मुद्दों, जैसे एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन का कमजोर होना, निगरानी व्यवस्था खत्म होना और रैगिंग मामलों में वृद्धि की जांच सुप्रीम कोर्ट की टास्क फोर्स को करनी चाहिए। पिछले साल यूजीसी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वह रैगिंग रोकने के लिए कदम उठा रहा है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए नई एडवाइजरी भी जारी की गई है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	रैगिंग के बढ़ते मामलों पर कैसे लगेगी रोक</h3>
<p>
	समस्या एंटी-रैगिंग दिशानिर्देशों के लागू होने में है। दिल्ली स्थित एंटी-रैगिंग संगठन, &#39;सोसाइटी अगेंस्ट वायलेंस इन एजुकेशन&#39; (सेव) की लीगल हेड और सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता मीरा कौरा पटेल डीडब्ल्यू हिन्दी से बातचीत में कहती हैं कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में रैगिंग से निपटने के लिए अलग कानून मौजूद हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अब तक सिर्फ दिशानिर्देश हैं। इसी वजह से कई मामलों में कार्रवाई कॉलेज प्रशासन की इच्छा पर निर्भर करती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	वह अपना अनुभव साझा करते हुए कहती हैं, "कॉलेजों में एंटी-रैगिंग समिति और एंटी-रैगिंग स्क्वॉड बनाया जाता है। इन सदस्यों का चयन कॉलेज स्वयं करता है। अधिकतर मामलों में देखा गया कि कॉलेज ऐसा करते वक्त पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं। कॉलेज प्रशासन अपनी छवि बचाने के लिए  रैगिंग के मामलों को &#39;आपसी विवाद&#39; बताकर दरकिनार कर देता है। इसका छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है और कई मामलों में यह आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं तक भी पहुंच जाता है।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	रैगिंग पर लगाम कैसे लगाई जाए? इस पर मीरा जवाब देती हैं, "पीड़ित छात्र पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जाता है। ऐसे हालात में रैगिंग साबित करने की जिम्मेदारी भी अक्सर उसी पर आ जाती है। रैगिंग जैसे मामलों में जिम्मेदारी का बोझ पीड़ित पर नहीं, बल्कि आरोपी पर होना चाहिए। जांच पूरी होने तक आरोपित छात्रों को अस्थायी रूप से निलंबित किया जाना चाहिए। इन नियमों के सही तरीके से लागू होने की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाने पर विचार करना होगा।"</p>
<p>
	 </p>
<p>
	राजेंद्र काचरू भी अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि रैगिंग अब कई कॉलेजों में कैंपस &#39;संस्कृति&#39; का हिस्सा बन चुकी है और इससे छुटकारा पाने के लिए लगातार और गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। भारत में उच्च शैक्षिक संस्थानों में 4 करोड़ से भी अधिक छात्र पढ़ते हैं। केवल कानून या गाइडलाइंस पर्याप्त नहीं हैं। वह सुझाव देते हैं कि रैगिंग को स्पष्ट रूप से अपराध मानने के लिए एक राष्ट्रीय कानून बनाया जाए।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 09:20:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Wed, 13 May 2026 12:28:32 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[NEET 2026: बच्चों के सपनों के ‘सौदागरों’ को कभी सजा मिलेगी या...]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/neet-2026-paper-leak-nta-controversy-student-struggle-126051200023_1.html</link>
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      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/thumb/1_1/1778576419-9009.jpg"/>
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      <description><![CDATA[भारत में डॉक्टर बनना केवल एक करियर विकल्प नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों का सामाजिक स्वप्न है। गांव का किसान अपनी जमीन गिरवी रखता है, मध्यमवर्गीय पिता अपनी रिटायरमेंट बचत कोचिंग फीस में झोंक देता है, मां अपने गहने बेच देती है— सिर्फ इसलिए कि उनका ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="NEET Paper Leak" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/full/1778576419-9009.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="1200" /></p>
</p>
<br />
<strong>NEET Paper Leak: भारत में डॉक्टर बनना केवल एक करियर विकल्प नहीं, </strong><strong>बल्कि करोड़ों परिवारों का सामाजिक स्वप्न है। गांव का किसान अपनी जमीन गिरवी रखता है, </strong><strong>मध्यमवर्गीय पिता अपनी रिटायरमेंट बचत कोचिंग फीस में झोंक देता है, </strong><strong>मां अपने गहने बेच देती है— </strong><strong>सिर्फ इसलिए कि उनका बच्चा “</strong><strong>डॉक्टर” </strong><strong>कहलाए।</strong> <strong>लेकिन इसी सपने के ऊपर आज एक ऐसा तंत्र बैठ गया है, </strong><strong>जो शिक्षा नहीं, </strong><strong>बल्कि उम्मीदों का कारोबार करता है। और इस कारोबार का सबसे बड़ा चेहरा बन चुकी है — NTA</strong><strong>।</strong><br />
<br />
NEET 2026 परीक्षा रद्द हो चुकी है। कारण — पेपर लीक के गंभीर आरोप। देशभर के लाखों छात्रों को अब फिर से परीक्षा देनी होगी।<br />
<ul>
	<li>
		फिर वही तनाव।</li>
	<li>
		फिर वही कोचिंग नोट्स।</li>
	<li>
		फिर वही रातों की नींद।</li>
	<li>
		फिर वही मानसिक यातना।</li>
</ul>
NTA कह रही है कि फीस वापस होगी, दोबारा रजिस्ट्रेशन नहीं करना होगा, नए एडमिट कार्ड जारी होंगे। लेकिन क्या कोई एजेंसी यह भी बताएगी कि बच्चों के टूटे आत्मविश्वास की भरपाई कौन करेगा? क्या कोई संस्था उन माता-पिता की चिंता का मूल्य चुकाएगी जिन्होंने अपने बच्चों को यह कहकर सांत्वना दी थी कि “इस बार सब ठीक होगा”? <strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/neet-ug-2026-exam-cancelled-paper-leak-rajasthan-sog-investigation-update-126051200012_1.html" target="_blank">NEET UG 2026 परीक्षा रद्द, 22 लाख छात्रों को लगा बड़ा झटका</a></strong>
<h3>
	<strong>यह केवल पेपर लीक नहीं, </strong><strong>व्यवस्था का नैतिक पतन है</strong></h3>
राजस्थान के सीकर से जो कहानी सामने आई, वह किसी अपराध थ्रिलर से कम नहीं। हाथ से लिखे गए “गेस पेपर” छात्रों तक पहुंचे। 720 में से 600 नंबर के सवाल कथित रूप से पहले ही उपलब्ध थे। 300 से अधिक प्रश्नों वाला “क्वेश्चन बैंक” वायरल हुआ, जिनमें से करीब 150 सवाल हूबहू परीक्षा में आए। अब सवाल यह नहीं कि पेपर लीक हुआ या नहीं। सवाल यह है कि देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बार-बार इतनी “संयोगवश समानता” क्यों दिखाई देती है?<br />
<br />
क्या यह केवल लापरवाही है? या फिर शिक्षा व्यवस्था के भीतर एक ऐसा समानांतर बाजार विकसित हो चुका है, जहां ‘सपनों की कीमत’ तय होती है?<br />
<h3>
	<strong>बच्चों के सपनों के असली सौदागर कौन हैं?</strong></h3>
वे केवल दलाल नहीं जो लाखों रुपए लेकर प्रश्न बेचते हैं। वे केवल कोचिंग माफिया नहीं जो “100% सिलेक्शन” के विज्ञापन लगाते हैं। असल सौदागर वे संस्थान भी हैं जो हर वर्ष विफलताओं के बावजूद जवाबदेही से बच निकलते हैं। जब तक शीर्ष पदों पर बैठे लोगों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी तब तक इस तरह के मामलों पर कभी रोक नहीं लगेगी। <strong>इस मामले के बाद क्या केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा नहीं दे देना चाहिए?</strong><br />
<br />
<strong>NTA </strong><strong>पिछले सात वर्षों में शायद ही कोई ऐसा वर्ष रहा हो, </strong><strong>जब किसी न किसी विवाद में न घिरी हो—</strong><br />
कभी गलत आंसर-की, कभी तकनीकी गड़बड़ी, कभी डमी कैंडिडेट, कभी कैटेगरी टॉपर को फेल, कभी 6 नंबर देकर छात्रा को आत्महत्या तक पहुंचा देना, कभी एक ही सेंटर से असामान्य संख्या में टॉपर्स।<br />
<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="NEET Paper Leak" class="imgCont" height="1200" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/full/1778576510-9763.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="676" /></p>
</p>
<br />
<br />
लेकिन हर बार कहानी एक जैसी रहती है—<br />
<ol>
	<li>
		“जांच होगी”,</li>
	<li>
		“सिस्टम मजबूत किया जाएगा”,</li>
	<li>
		“भविष्य में ऐसा नहीं होगा।”</li>
</ol>
और फिर अगले साल वही दोहराव। 
<h3>
	<strong>यह केवल परीक्षा नहीं, </strong><strong>भारत का सामाजिक मनोविज्ञान है</strong></h3>
भारत में NEET और JEE अब परीक्षाएं नहीं रहीं; वे सामाजिक प्रतिष्ठा की युद्धभूमि बन चुकी हैं। कोटा, सीकर, प्रयागराज, हैदराबाद, पटना, इंदौर — पूरा एक “एग्जाम इकॉनमी” खड़ी हो चुकी है। हजारों करोड़ रुपए का कोचिंग उद्योग बच्चों की असुरक्षा पर फल-फूल रहा है। 16-17 साल के बच्चे मशीनों की तरह पढ़ते हैं। उनके बचपन को “ड्रॉप ईयर” और “रैंक” में मापा जाता है। दोस्तियां खत्म हो जाती हैं, मानसिक स्वास्थ्य टूट जाता है और परिवारों में प्रेम की जगह प्रदर्शन का दबाव ले लेता है। फिर जब परीक्षा ही संदिग्ध हो जाए, तो बच्चे किस पर भरोसा करें?<br />
<h3>
	<strong>सबसे खतरनाक चीज : अन्याय का सामान्यीकरण</strong></h3>
आज सबसे भयावह बात यह नहीं कि पेपर लीक हुआ। सबसे भयावह यह है कि समाज अब इन खबरों पर चौंकना बंद कर चुका है। पेपर लीक अब “ब्रेकिंग न्यूज” नहीं, एक वार्षिक परंपरा जैसा लगता है। जैसे हम मान चुके हों कि भारत में बड़ी परीक्षाएं ईमानदारी से हो ही नहीं सकतीं।<br />
यह सामान्यीकरण किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है। क्योंकि जब मेहनत पर भरोसा खत्म होता है, तब प्रतिभा नहीं, जुगाड़ जीतता है। और जिस देश में जुगाड़ प्रतिभा पर भारी पड़ने लगे, वहां संस्थाएं धीरे-धीरे खोखली हो जाती हैं। 
<h3>
	<strong>NTA</strong> : <strong>एजेंसी या जवाबदेही से मुक्त तंत्र?</strong></h3>
सबसे बड़ा प्रश्न यही है। अगर हर साल विवाद होंगे, जांच होगी, पेपर रद्द होंगे, छात्रों का भविष्य दांव पर लगेगा— तो फिर जवाबदेह कौन है? क्या कभी किसी शीर्ष अधिकारी ने नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दिया? क्या किसी प्रशासनिक विफलता पर संस्थागत दंड तय हुआ? क्या संसद में इस पर गंभीर राष्ट्रीय बहस हुई?<br />
<br />
भारत में विफलता का सबसे सुरक्षित स्थान शायद सरकारी संस्थान ही हैं— जहां गलती होती है, नुकसान जनता झेलती है और सिस्टम अगले दिन फिर सामान्य हो जाता है। डॉक्टर बनने से पहले ही बच्चे “सिस्टम” सीख जाते हैं, यह त्रासदी केवल परीक्षा की नहीं, नैतिक शिक्षा की भी है। जब एक छात्र देखता है कि लाखों की रिश्वत देकर कोई प्रश्न खरीद सकता है, जब वह सुनता है कि किसी ने डमी कैंडिडेट बैठाया, जब वह महसूस करता है कि मेहनत से ज्यादा “नेटवर्क” महत्वपूर्ण है— तब उसके भीतर व्यवस्था के प्रति सम्मान खत्म होने लगता है। और यही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी हार होती है।<br />
<h3>
	<strong>समाधान क्या है?</strong></h3>
<ul>
	<li>
		समस्या केवल NTA बदलने से हल नहीं होगी।</li>
	<li>
		जरूरत है पूरे परीक्षा मॉडल की पुनर्समीक्षा की।</li>
	<li>
		क्या एक ही परीक्षा पर करोड़ों बच्चों का भविष्य टिका होना चाहिए?</li>
	<li>
		क्या स्कूल शिक्षा को इतना कमजोर कर दिया गया है कि कोचिंग संस्थान समानांतर शिक्षा मंत्रालय बन जाएं?</li>
	<li>
		क्या परीक्षा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा जितनी गंभीरता नहीं मिलनी चाहिए?</li>
	<li>
		क्या डिजिटल मॉनिटरिंग, विकेंद्रीकृत मूल्यांकन और बहु-स्तरीय टेस्ट मॉडल पर गंभीर काम नहीं होना चाहिए?</li>
</ul>
जब तक शिक्षा को “रैंक उत्पादन उद्योग” की तरह चलाया जाएगा, तब तक पेपर लीक केवल लक्षण रहेगा, बीमारी नहीं।<br />
<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
	<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
		<img align="center" alt="NEET Paper Leak" class="imgCont" height="1200" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/12/full/1778576566-7208.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="" width="676" /></p>
</p>
<br />
हर साल बच्चे बदलते हैं, लेकिन कहानी वही रहती है। कहीं कोई छात्र अवसाद में चला जाता है, कहीं कोई परिवार कर्ज में डूब जाता है, कहीं कोई प्रतिभाशाली बच्चा सिस्टम से विश्वास खो देता है। और दूसरी तरफ, कुछ लोग करोड़ों का खेल खेलते रहते हैं— बच्चों के सपनों की दलाली करके।<br />
<br />
भारत में शिक्षा अब केवल ज्ञान का माध्यम नहीं रही; यह एक ऐसा बाजार बनती जा रही है, जहां उम्मीदें खरीदी और बेची जाती हैं।<br />
<br />
<strong>सवाल सिर्फ इतना है— </strong><strong>क्या हम आने वाली पीढ़ी को डॉक्टर, </strong><strong>इंजीनियर और वैज्ञानिक बना रहे हैं, </strong><strong>या उन्हें यह सिखा रहे हैं कि इस देश में ईमानदारी सबसे ‘कमजोर’ विकल्प है?</strong><br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 14:12:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Tue, 12 May 2026 15:07:15 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[national news]]></category>
      <authorname>संदीप सिंह सिसोदिया</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कैसे जानलेवा गर्मी में काम करते हैं नमक बनाने वाले श्रमिक]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/kutch-salt-workers-survival-extreme-heat-gujarat-traditional-cooling-methods-126051100007_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/kutch-salt-workers-survival-extreme-heat-gujarat-traditional-cooling-methods-126051100007_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/11/thumb/1_1/1778474361-9274.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/11/thumb/1_1/1778474361-9274.jpg</image>
      <description><![CDATA[चिलचिलाती, बर्दाश्त ना होने पाने वाली गर्मी और जानलेवा हीटवेव अब भारत के लिए कोई नई बात नहीं रह गई है। हर साल बढ़ते गर्मियों में भारत के अधिकतर इलाके मुश्किल हालात का सामना करते हैं। लेकिन देश के पश्चिमी रेगिस्तानी नमक के मैदानों में इंसानों को ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="kutch namak ki kheti" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/11/full/1778474361-9274.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="kutch namak ki kheti" width="1200" /></p>
	</p>
	-रीतिका एएफपी<br />
	चिलचिलाती, बर्दाश्त ना होने पाने वाली गर्मी और जानलेवा हीटवेव अब भारत के लिए कोई नई बात नहीं रह गई है। हर साल बढ़ते गर्मियों में भारत के अधिकतर इलाके मुश्किल हालात का सामना करते हैं। लेकिन देश के पश्चिमी रेगिस्तानी नमक के मैदानों में इंसानों को झुलसा देने वाली गर्मी बहुत कम जगहों पर होती है। फिर भी यहां के मजदूर इस असहनीय तापमान में जिंदा रहने के लिए आसान तकनीकों पर भरोसा करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गुजरात में लगभग 50,000 मजदूर बिना बिजली या स्वास्थ्य सेवा के दूरदराज के नमक के मैदानों में आठ महीने बिताते हैं, और पीने और नहाने-धोने के पानी के लिए हर 25 दिनों में आने वाले टैंकर पर निर्भर रहते हैं। इस तापमान में वे जिंदा रहने के लिए आराम के लिए छायादार जगहों, कपड़े से ठंडी की गई पानी की बोतलों और काम के घंटों में बदलाव जैसे उपायों का इस्तेमाल करते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	गुजरात के ‘लिटिल रन ऑफ कच्छ&#39; में गर्मियों का तापमान आमतौर पर 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है और ये कभी कभी तो 47-48 डिग्री सेल्सियस तक जा सकता है। तपती गर्मी जो यहां के मजदूरों के जीवन को कष्टदायक बनाती है, वही गर्मी रेगिस्तान में नमक के उत्पादन के लिए बेहद जरूरी है। गुजरात भारत के कुल नमक उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा पैदा करता है।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	गर्मी से बचने के लिए मजदूरों के अनोखे तरीके</h3>
<p>
	नमक के मैदान में काम करने वाले 42 वर्षीय बाबूलाल नारायण कहते हैं,  "हम अलग-अलग समय पर काम करते हैं, सुबह जल्दी और शाम को सूरज ढलने के बाद अपना काम करते हैं।" दिन के सबसे गर्म घंटों के दौरान, कई लोग अस्थायी झोपड़ियों में शरण लेते हैं। ये झोपड़ियां लकड़ियों के ढांचे पर मोटे कपड़े से ढक कर बनाई जाती हैं और इन्हें जंगली गधे के गोबर से लीपा जाता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	यहां काम करने वाली 17 साल की भावना राठौर बताती हैं, "हम यहां हर दो से तीन घंटे में बैठते हैं, ताकि हमें कमजोरी या चक्कर महसूस ना हो।” साथ ही उन्होंने बताया कि गोबर सूरज की रोशनी को रोकता है और गर्मी को बाहर निकलने देता है, जबकि खुरदरा कपड़ा हवा को आर-पार होने देता है। इस इलाके में ना तो पेड़ हैं और न ही प्राकृतिक छाया, और यहां सफेद नमक की परत से सूरज की रोशनी बहुत तेजी से रिफ्लेक्ट होती है। ऐसे में ये झोपड़ियां यहां काम करने वाले लोगों के लिए जीवन रेखा के जैसी हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	काली चाय से लेकर कपड़ों में लिपटी बोतल तक</h3>
<p>
	44 वर्षीय कंचन नारायण रस्सी पर लटकी और गीले कपड़े में लिपटी बोतल का इस्तेमाल करती हैं, जो वाष्पीकरण के जरिये से भीतर के पीने के पानी को ठंडा करती है। वह कहती हैं कि हवा पानी को ठंडा करने में मदद करती है। वहीं, गर्मी से बचने के लिए पूर्णिमा दिन में काली चाय पीती हैं। उनका कहना है कि गर्म पेय कच्छ की सूखी गर्मी में पसीना लाता है जिससे शरीर ठंडा रहता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	नमक बनाने के लिए मजदूर यहां क्रिस्टलाइजेशन की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए हर दिन सतह को खुरचते हैं। हफ्तों बाद, नमक की एक मोटी परत बन जाती है, जिसे श्रमिक तोड़कर नमक के ढेरों में जमा कर देते हैं। यह काम हमेशा से ही बेहद मुश्किल परिस्थितियों वाला रहा है, लेकिन इस साल भारत के मौसम विज्ञान विभाग ने गुजरात सहित कई इलाकों में सामान्य से अधिक लू वाले दिनों का अनुमान लगाया है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मजदूर पहले की तुलना में अब काम के दौरान अधिक समय तक गर्मी के संपर्क में रहते हैं। पहले, वे खारे पानी को सतह पर लाने के लिए महंगे डीजल पंपों पर निर्भर थे। लेकिन सौर ऊर्जा अपनाने से लागत कम हो गई है और परिवारों को लंबे समय तक काम करने की सुविधा मिली है। इसका मतलब है कि नमक बनाने का जो काम पहले मार्च में खत्म हो जाता था, वह अब सबसे गर्म महीनों तक जारी रहता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 08:42:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Mon, 11 May 2026 10:09:36 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर कैसे आए ये चुनाव परिणाम]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/my-blog/how-did-these-election-results-come-about-126050800007_1.html</link>
      <guid>https://hindi.webdunia.com/my-blog/how-did-these-election-results-come-about-126050800007_1.html</guid>
      <media:thumbnail url="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/04/thumb/1_1/1777895645-9925.jpg"/>
      <image>https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/04/thumb/1_1/1777895645-9925.jpg</image>
      <description><![CDATA[वैसे तो असम में भी भाजपा की तीसरी बार लगातार विजय महत्वपूर्ण है पर ये दोनों घटनाएं ऐतिहासिक और युगांतरकारी हैं। बंगाल में एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं के बहुमत का खतरनाक तरीके से हर हाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और तृणमूल के समर्थन में ...]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<img align="center" alt="पांच राज्यों के चुनाव परिणाम संबंधी जानकारी देती तस्वीर" class="imgCont" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/04/full/1777895645-9925.jpg" style="border: 1px solid rgb(221, 221, 221); margin-right: 0px; z-index: 0; width: 1200px; height: 675px;" title="election results" /></p>
</p>
<p>
	पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर कोई एक सुसंबद्ध टिप्पणी संपूर्ण स्थितियों का विश्लेषण नहीं कर सकता। सारे राज्यों के राजनीतिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे अलग-अलग थे तथा मतदाताओं ने उसी अनुसार मतदान किया। किंतु सबको मिलाकर एक तस्वीर बनाएं तो इसमें दो ऐतिहासिक युगांतरकारी परिणतियां हैं। एक, पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐसी विजय जो एक समय अकल्पनीय थी तथा तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी टीवीके का चमत्कारिक प्रदर्शन। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	वैसे तो असम में भी भाजपा की तीसरी बार लगातार विजय महत्वपूर्ण है पर ये दोनों घटनाएं ऐतिहासिक और युगांतरकारी हैं। बंगाल में एक तिहाई मुस्लिम मतदाताओं के बहुमत का खतरनाक तरीके से हर हाल में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और तृणमूल के समर्थन में आक्रामकता से काम करने के बावजूद भाजपा की इतनी बढ़त सामान्य घटना नहीं है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	आम सोच यही थी कि ममता की शुरुआत ही 30 प्रतिशत मत और लगभग 65-70 सीटों से होती है जबकि भाजपा को शून्य से शुरुआत करनी होगी। वैसे असम में इससे ज्यादा मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा ने जीत हासिल कर कई मिथकों को तोड़ा। पर असम और बंगाल की राजनीति और सत्ता के चरित्र में मौलिक अंतर है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी राजनीति और सत्ता का चरित्र ऐसा बना दिया था जिसमें किसी भी पार्टी के लिए उसको भेजना असंभव सी चुनौती थी। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पिछले एक दशक से ज्यादा समय के चुनावों का एक पहलू हर जगह लागू होता है वह यह कि हिंदुत्व व अपनी संस्कृति‌, धर्म के प्रति हिंदुओं के पुनर्जागरण के कारण एक निश्चित वोट का आधार हर राज्य में निर्मित हो गया है और यह मत भाजपा से संतुष्ट असंतुष्ट या कुछ मायनो में नाराज होने के बावजूद वह हारे या जीते उसे या साथी दलों या उसकी अनुपस्थिति में दूसरे दलों को जाता है। स्वाभाविक ही इसके समानांतर प्रतिक्रिया में भाजपा विरोधी मतों का एक अंश भी उसे चुनौती देने वाले प्रमुख दल या उसके साथियों के खाते चला जाता है। यह प्रवृत्ति पांचो राज्यों में रही है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	आप देखेंगे कि पांचो राज्यों के परिणाम निर्धारण में इनकी भूमिका है। भाजपा स्थानीय-क्षेत्रिय मुद्दों को प्रमुखता से उठाते हुए भी चुनावों को मतदाताओं को सीधे अपील करने वाले राष्ट्रीय विषयों के साथ संबद्ध करती है। भाजपा ने राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकी को बंगाल एवं असम दोनों जगह प्रमुख मुद्दे के रूप स्थापित कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा महिलाओं के उत्थान संबंधी कार्यों तथा नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण को लागू करने की संसदीय पहल ने भी चुनावी माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	वस्तुत: बंगाल के परिणाम ने उन सबको चौंकाया है जो जमीनी वास्तविकता और 2018 से मतदाताओं मुख्यतः हिन्दुओं के बड़े वर्ग के अंदर बदलाव की छटपटाहट को महसूस नहीं कर रहे थे। बंगाल में सुरक्षित वातावरण में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव करा पाना चुनाव आयोग, न्यायिक संस्थाएं और पूरे देश के लिए चुनौती बन गई थी। तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता और पूरी राजनीति को निहित स्वार्थी तत्वों की गिरफ्त में दिए जाने से बंगाल की संस्कृति चुनावों को हर हाल में अपने पक्ष में करने की हो चुकी है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	कट्टरपंथी तत्वों को प्रत्यक्ष-परोक्ष संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण पूरा प्रदेश हमेशा सांप्रदायिक भय और तनाव की स्थिति में रहा। मतदाताओं की इच्छा नहीं तृणमूल नेताओं की चाहत से आप मतदान करिए या चुपचाप घर बैठिये अन्यथा हिंसा, आगजनी, दमन, उत्पीड़न और संबंधित स्थान या प्रदेश से पलायन का दंश झेलिये। साइलेंट रीगिंग बंगाल की मुख्य चुनावी प्रवृत्ति रह रही है। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	पहले इसी रास्ते वाम मोर्चा ने लगातार जीत सुनिश्चित किया और उसके विरुद्ध लंबा संघर्ष करते-करते ममता बनर्जी ने भी अपनी पूरी पार्टी को उससे ज्यादा हिंसक और दमनकारी तत्वों में परिणत कर दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तृणमूल की सत्ता और राजनीति विरोधियों के विरुद्ध ज्यादा खूंखार हुई अन्यथा 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव परिणाम वैसे नहीं आते।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पलायन या हिंसा की सर्वाधिक शिकार महिलाएं होतीं हैं। पुरुषों के मुकाबले 1.5 महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया महिला होने के बावजूद ममता बनर्जी के विरुद्ध इनका बहुत बड़ा मत भाजपा को गया है। भाजपा पर ध्रुवीकरण का आरोप लगाकर सतही विश्लेषण करने वाले विचार करें कि भद्र लोक माने जाने वाले बंगाल के हिंदुओं ने ममता बनर्जी की सत्ता संस्कृति के विरुद्ध विद्रोह कर भाजपा को मत दिया तो क्या इसे केवल ध्रुवीकरण कहेंगे और ऐसा हुआ भी तो क्यों?</p>
<p>
	 </p>
<p>
	बंगाल में राजनीतिक संघर्ष वास्तविक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तथा सत्ता संस्कृति को सर्वसमावेशी बनाने का था। यह जिम्मेवारी मुख्यत: प्रदेश के गैर मुस्लिमों यानी हिंदुओं को ही लेना था। धीरे-धीरे हिंदुओं के बहुमत के अंदर अगर यह भाव पैदा हुआ कि इस सरकार के रहते हमारा अस्तित्व संकट में है तो इसके कारण अत्यंत गहरे हैं। बांग्लादेश की घटनाओं ने इस मनोविज्ञान को सशक्त किया कि हमें कुछ हद तक जान की बाजी लगानी होगी। हिंदू आबादी में लगभग 75 प्रतिशत ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया। यह बहुत बड़ी बात है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तमाम विरोधों के बावजूद एसआईआर में 90 लाख से ज्यादा मृत, संदिग्ध और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के कारण फर्जी मतदाताओं का खेल खत्म हो गया। सवा 2 लाख केंद्रीय बलों की उपस्थिति, चुनाव के बाद भी सुरक्षा बलों के बने रहने की घोषणा, दूसरे राज्यों के अधिकारियों को चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्ति, प्रदेश के अधिकारियों का व्यापक पैमाने पर स्थानांतरण या चुनाव प्रक्रिया तक कार्य मुक्ति तथा चुनावी हिंसा वाले चिन्हित व्यक्तित्वों के विरुद्ध कार्रवाई व सतर्क दृष्टि आदि ने भय व संशयग्रस्त मतदाताओं के अंदर सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया जिससे चुनावी वातावरण में आमूल परिवर्तन आया। भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पहले दिन से यह विश्वास दिलाने की रणनीति अपनाई कि हम सत्ता में आ रहे हैं तथा किसी के साथ अन्याय हुआ तो पूरी पार्टी खड़ी रहेगी। इन सबका सम्मिलित परिणाम है असंभव सा लगने वाला सत्ता परिवर्तन। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	असम में पहले दिन से स्पष्ट था कि  वह भाजपा को बड़ी चुनौती नहीं है। किंतु गौरव गोगोई भी जोरहाट से हार जाएंगे इसकी कल्पना कांग्रेस को नहीं रही होगी। कांग्रेस ने शुरुआत देर से की तथा राहुल गांधी एवं प्रियंका वाड्रा व उनके रणनीतिकारों के कारण टिकट बंटवारे तक नेता पार्टी छोड़कर जाते रहे। हिमंतो विस्वासरमा के पूर्व कांग्रेसी होने के कारण उन नेताओं का सीधा संपर्क भी रहा इसलिए उन्हें भाजपा में शामिल होने में समस्या नहीं आई। दूसरे, भाजपा ने पिछले लंबे समय से असम अस्मिता व आसामी संस्कृति को भारत के व्यापक हिंदुत्व संस्कृति और राष्ट्रभाव से जोड़ने में सफलता पाई है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	मुगलों से युद्ध करने वाले लचित बरफ़ुकन से लेकर महाराज शंकर देव को जिस तरह भाजपा ने प्रस्तुत किया एवं जनजाति गौरव को निचले स्तर तक ले गए उन सबसे सामाजिक सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ है। सरकार की आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा नीति ने उसे बल दिया है। हिमांतो की छवि देश में भले घुसपैठी और मुस्लिम विरोधी बनाई गई किंतु इसके साथ असम में उन्होंने बच्चों व युवाओं के मामा और महिलाओं के भाई के रूप में भी छवि बनई है। गौरव गोगोई के प्रति अहोम समुदाय का आकर्षण तो था किंतु राज्यव्यापी लोकप्रियता हिंमातों की ही थी। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	जमीनी कार्यों उदाहरण के लिए तीन लाख चाय बागान मजदूरों के परिवारों को जमीन का पट्टा मिलना महत्वपूर्ण घटना थी। अंग्रेज उन्हें काम पर ले गए, उन्हें जमीन का पट्टा नहीं दिया। असम में घुसपैठ लंबे समय से मुद्दा रहा है और इसके आधार पर वहां 80 के दशक में छात्र नेताओं की सरकार बनी। तो यह मुद्दा समाप्त नहीं हो सकता और बाकी पार्टियों ने इसका उपहास उड़ाया और भाजपा आज भी इस पर कायम है। इन सबका असर हुआ है और भाजपा तीसरी बार सत्ता बनाए रखने में कामयाब रही।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	तमिलनाडु के परिणामों की तो शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। थलापति विजय की टीवीके या तमिलगा वेत्री कझगम दोनों मुख्य गठबंधन द्रमुक नेतृत्व वाला आईडिया तथा अन्य धार्मिक भाजपा गठबंधन नंबर एक की पार्टी बन जाएगी इसकी भी कल्पना किसी को नहीं थी। दरअसल, द्रमुक के विरुद्ध सत्ता विरोधी रुझान जमीन पर दिख रहा था।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसी कारण एमके स्टालिन ने एक तिहाई विधायकों का टिकट काटा। वहां जहरीली शराब पीने से मृत्यु की घटनाएं लगातार हुई और पिछले चुनाव में उन्होंने महिलाओं के समक्ष शराबबंदी लागू करने का वादा किया था। लागू नहीं करने से महिलाओं में नाराजगी थी। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी थे और दो मंत्री जेल जा चुके थे। उन्होंने तमिलवाद और तमिल भाषा को लेकर आक्रामक राजनीति की। पूरी पार्टी और कांग्रेस को छोड़कर गठबंधन सनातन और हिंदुत्व के विरुद्ध जहर उगलने लगी।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	विधानसभा में अलग से तमिल राष्ट्रगान तक की परंपरा शुरू कर दी। सब अपनी सत्ता बचाने की ही कवायदें थीं। आम लोगों को इस तरह का अतिवाद स्वीकार नहीं था और द्रमुक को इसका आभास हुआ। चुनाव आते-आते सनातन विरोधी वक्तव्य बंद हो गए और उदयनिधि स्टालिन जो एक समय सनातन के समूल नाश की बात करते थे, मंदिर-मंदिर घूमने लगे। अन्नाद्रमुक और भाजपा गठबंधन यद्यपि बेहतर चुनाव लड़ी। सत्ता विरोधी जन असंतोष और लोगों की आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने में सफल नहीं रहे और इसका लाभ विजय को मिला। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	वैसे भी भाजपा वहां केवल 27 सीटों पर लड़ रही थी। विजय फिल्मी करियर छोड़कर तमिलनाडु की राजनीति बदलने की घोषणा के साथ आए और 2024 में पार्टी बनाने के बाद लगातार सक्रिय रहे। यद्यपि उन्होंने दोनों पक्षों का मत काटा किंतु द्रमुक को ज्यादा क्षति पहुंचाई। ईसाई होने के कारण लगभग चार प्रतिशत ईसाइयों के मत का बड़ा हिस्सा उनके खाते आया और मुस्लिम मतों का भी। यहां से तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो रही है और एमजी रामचंद्रन के बाद विजय दूसरे बड़े फिल्म स्टार होंगे जिनके राजनीति में लंबे समय तक रहने की संभावना है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	केरल में प्रति पांच-छ वर्ष पर सरकार बदलती रही है। किंतु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के दुर्बल व दिशाहीन होने के कारण प्रदेश में भी पार्टी प्रभावित हुई और माकपा के बुजुर्ग पी विजयन के नेतृत्व में वाम मोर्चा 2021 में भी दूसरी बार सत्ता कायम रखने में कामयाब हुई थी। भाजपा ने वहां खूब काम किया,  जमीनी मुद्दे उठाए, धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए लोगों की इच्छा को वाणी भी दी। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	इन सबके परिणामस्वरूप उसके जनाधार में उछाल आया, 2024 में त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत तथा तिरुवनंतपुरम के नगर निगम पर आधिपत्य इसका प्रमाण है। कुछ वर्ष पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। किंतु अभी प्रदेश में व्यापक जनाधार और चुनावी सफलता की दृष्टि से यह कम है। हालांकि भाजपा के कारण मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा या यूडीएफ के पक्ष में हुआ। </p>
<p>
	 </p>
<p>
	तो कुल मिलाकर इन परिणामों का भी निष्कर्ष यही है कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य 2024 के लोकसभा चुनाव के समय से काफी बदल चुका है। भारत के लोगों के लिए भाजपा अभी भी व्यक्तिगत-आंतरिक व राष्ट्रीय सुरक्षा, हिंदुत्व अभिप्रेरित व्यापक राष्ट्रवाद तथा, क्षेत्रीय अस्मिता को सकारात्मक महत्व देने वाली, आर्थिक विकास के प्रति प्रतिबद्ध, विरासत के संरक्षण तथा  सामाजिक न्याय व लैंगिक समानता को सही परिप्रेक्ष्य में जमीन पर उतरने वाली पार्टी के रूप में मुख्य विकल्प बनी हुई है।<br />
	<br />
	प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्वमें 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम से यह मिथक टूटा था कि बगैर मुस्लिम मत के केंद्र में किसी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिल सकता। बंगाल के चुनाव परिणाम ने इस मिथक को अंतिम बार ध्वस्त कर दिया।<br />
	<br />
	<p>
		(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। &#39;वेबदुनिया&#39; इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)</p>
</p>
<br />]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 09:40:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 08 May 2026 10:29:45 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[My Blog]]></category>
      <authorname>अवधेश कुमार</authorname>
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ब्रश करते ही खत्म होगी मसूड़ों की बीमारी? जर्मनी के वैज्ञानिकों ने खोजा दांतों को सुरक्षित रखने का जादुई तरीका]]></title>
      <link>https://hindi.webdunia.com/latest-deutsche-welle-news/german-scientists-develop-periotrap-toothpaste-for-gum-disease-periodontitis-treatment-126050800006_1.html</link>
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      <description><![CDATA[जिस मसूड़ों की बीमारी को हम मामूली समझकर नजरअंदाज करते हैं, वह चुपचाप पूरी सेहत पर असर डाल रही होती है। जर्मनी के फ्राउनहोफर संस्थान के रिसर्चरों ने एक ऐसा टूथपेस्ट बनाया है, जिससे बिना अलग से दवा लिए इलाज हो जाएगा।]]></description>
      <content:encoded><![CDATA[<p>
	<p style="float: left;width:100%;text-align:center;">
		<p style="position:relative;display: inline-block;color: #fff;">
			<img align="center" alt="teeth" class="imgCont" height="675" src="https://nonprod-media.webdunia.com/public_html/_media/hi/img/article/2026-05/08/full/1778212839-2458.jpg" style="border: 1px solid #DDD; margin-right: 0px; float: none; z-index: 0;" title="teeth" width="1200" /></p>
	</p>
	स्तुति लाल</p>
<p>
	दांत और मसूड़ों की तकलीफ से तो हम सब वाकिफ हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की मानें तो भारत में दांतों की सड़न (डेंटल केरिज) और मसूड़ों की बीमारी (पेरियोडोंटाइटिस) बहुत आम है। इस रिपोर्ट के अनुसार लगभग 51 फीसदी भारतीय वयस्क किसी ना किसी प्रकार की मसूड़ों की समस्या से जूझ रहे हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	हम इंसानों के मुंह में करोड़ों‑अरबों बैक्टीरिया रहते हैं। इन बैक्टीरिया की लगभग 700 प्रजातियां होती हैं, जो खान‑पान, आदतों और उसके माहौल के अनुसार हर किसी में अलग‑अलग हो सकती हैं। ज्यादातर बैक्टीरिया हमें नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन इनमें से कुछ हानिकारक बैक्टीरिया मसूड़ों की बीमारी का कारण बन सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	ये बैक्टीरिया दांतों पर जमी परत (प्लाक) में, विशेष रूप से मसूड़ों की लाइन के पास, इकट्ठा होकर सूजन पैदा करते हैं। अगर मसूड़ों की सूजन लंबे समय तक बनी रहे, तो यह लंबी चलने वाली मसूड़ों की बीमारी (क्रॉनिक पेरियोडॉन्टाइटिस) का रूप ले सकती है। जब यही हानिकारक बैक्टीरिया खून में मिल जाते हैं, तो डायबिटीज, गठिया, दिल की बीमारी और भूलने की बीमारी जैसी तकलीफों का खतरा बढ़ा सकते हैं।</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	इलाज के बाद भी मसूड़ों की बीमारी क्यों लौट आती है?</h3>
<p>
	हम रोजमर्रा की जिंदगी में दांत और मुंह की सफाई के लिए सामान्य टूथपेस्ट और माउथवॉश का इस्तेमाल करते हैं। इनमें कई बार अल्कोहल वाले माउथवॉश और क्लोरहेक्सिडिन जैसे एंटीसेप्टिक वाले ओरल केयर उत्पाद भी शामिल होते हैं। ऐसे उत्पाद हानिकारक बैक्टीरिया को मारते तो जरूर हैं, लेकिन साथ-साथ अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देते हैं। बाद में जब मुंह में बैक्टीरिया दोबारा बनते हैं, तो हानिकारक बैक्टीरिया जैसे ‘पोर्फाइरोमोनास जिंजिवालिस‘ जल्दी बढ़ जाते हैं, खासकर सूजे हुए मसूड़ों में। वहीं, अच्छे बैक्टीरिया को बनने में वक्त थोड़ा ज्यादा लगता है। यही वजह है कि मुंह का संतुलन बिगड़ता है और बीमारी जल्दी ही लौट आती है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अच्छे बैक्टीरिया को नष्ट होने से बचाने के लिए जर्मनी के फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर सेल थेरेपी एंड इम्यूनोलॉजी की हाले शाखा के शोधकर्ताओं ने एक विशेष पदार्थ खोज निकाला है। यह &#39;पोर्फाइरोमोनास जिंजिवालिस&#39; जैसे हानिकारक बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है और अन्य बैक्टीरिया को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाता। इस पदार्थ का नाम &#39;गुआनिडिनो‑एथाइल‑बेंजाइल‑अमीनो इमिडाजोपाइरीडीन एसीटेट&#39; है। यह नाम बोलने में थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन, इसका काम उतना ही अहम है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	फ्राउनहोफर की मॉलिक्यूलर ड्रग बायोकैमिस्ट्री एंड थेरेपी डेवलपमेंट शाखा के प्रमुख डॉ। स्टीफन शिलिंग बताते हैं, "यह पदार्थ जिंजिवाइटिस पैदा करने वाले बैक्टीरिया को खत्म करने के बजाय उनके विकास को रोक देता है। जब वे निष्क्रिय हो जाते हैं, तो अच्छे बैक्टीरिया को उस जगह पर पनपने का मौका मिलता है, जहां वह आम तौर पर नहीं पहुंच पाते। इस तरह यह पदार्थ मुंह में बैक्टीरिया का संतुलन प्राकृतिक तरीके से दोबारा ठीक करता है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	एक सोच से प्रॉडक्ट तक का सफर</h3>
<p>
	फ्राउनहोफर की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पदार्थ के खोज की तकनीक को &#39;पेरियोट्रैप&#39; का नाम दिया गया। यह तकनीक एक ऐसे प्रोजेक्ट से विकसित हुई, जिसे यूरोपीय संघ ने वित्तीय सहायता दी थी और जिसमें कई देशों के साझेदार भी शामिल थे। वर्ष 2018 में इस पदार्थ की खोज को एक ओरल केयर प्रॉडक्ट का रूप देने के लिए पेरिओट्रैप फार्मा नामक कंपनी स्थापित की गई। इसी के तहत इस कंपनी ने फ्राउनहोफर संस्थानों के साथ मिलकर एक माइक्रोबायोम‑अनुकूल टूथपेस्ट विकसित किया है, जो मुंह के अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। कंपनी के सह‑संस्थापक मिर्को बुकहोल्स के अनुसार, "यह टूथपेस्ट पेरियोडोंटाइटिस से बचाव के लिए बनाया गया है और इसमें आम टूथपेस्ट की तरह फ्लोराइड और सफाई करने वाले तत्व मौजूद हैं।”</p>
<p>
	 </p>
<p>
	इसे एक उच्च गुणवत्ता वाला उत्पाद माना जा रहा है। इस प्रॉडक्ट की गुणवत्ता के बारे में डॉ। स्टीफन शिलिंग कहते हैं, "इस उत्पाद के निर्माण में गुणवत्ता मानक ‘जीएलपी‘ का पालन बेहद जरुरी था। हमने सिर्फ नई सामग्री वाला टूथपेस्ट नहीं बनाया, बल्कि मेडिकल‑ग्रेड गुणवत्ता वाला पूरा ओरल केयर समाधान बनाया है।”</p>
<p>
	 </p>
<h3>
	दिल के दौरों से कैसे जुड़ी है मसूड़ों की बीमारी?</h3>
<p>
	इंडियन डेंटल एसोसिएशन के अनुसार, भारत में मसूड़ों की समस्या को लेकर कम जागरूकता ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखी जाती है। दांतों से खून आना, खाना चबाने में दर्द, मसूड़ों में सूजन(जिंजीवाइटिस) और मसूड़ों के कमजोर होने से हिलते हुए दांत जैसे लक्षण मसूड़ों की बीमारी का संकेत देते है। लंबे समय तक बना रहने वाला दर्द मानसिक और शारीरिक जीवन को कमजोर कर देता है</p>
<p>
	 </p>
<p>
	अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के सर्कुलेशन नामक जर्नल की 2026 के एक बड़े अध्ययन के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया कि जिन लोगों को मसूड़ों की गंभीर बीमारी होती है, उन्हें दिल का दौरा पड़ने का खतरा ज्यादा होता है। यह खतरा अन्य कारकों को हटाने के बाद भी बना रहता है, जिससे मसूड़ों की बीमारी और हार्ट अटैक के बीच सीधा संबंध होने के संकेत मिलते हैं। यानी दांतों और मसूड़ों की सेहत को बनाए रखने के तरीकों के बारे में जागरूक होना बेहद जरूरी है। हालांकि, सच यह भी है कि कभी‑कभी हमारी पूरी कोशिशें भी नाकाम हो जाती हैं। तब इलाज ही एकमात्र रास्ता बचता है।</p>
<p>
	 </p>
<p>
	पेरियोट्रैप तकनीक का इस्तेमाल कर आगे भी ओरल और डेंटल केयर के नए उत्पाद बनाने की योजना है। उदाहरण के तौर पर, शोधकर्ता वर्तमान में एक विशेष माउथवॉश विकसित कर रहे हैं और साथ ही अन्य क्षेत्रों के बाजारों के लिए भी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। तकनीक का विकास अभी भी जारी है। दंत चिकित्सा में इसके उपयोग को ध्यान में रखते हुए, पेरियोट्रैप की टीम ने फ्राउनहोफर संस्थानों के साथ मिलकर एक विशेष केयर जेल भी बनाया है, जिसे दांतों की पेशेवर सफाई के बाद लगाया जाता है।  यह जेल हानिकारक बैक्टीरिया को ब्लॉक करता है, मुंह के माइक्रोबायोम को संतुलित रखता है और मसूड़ों की सेहत भी बनाए रखता है।</p>]]></content:encoded>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 09:25:00 +0530</pubDate>
      <updatedDate>Fri, 08 May 2026 09:38:42 +0530</updatedDate>
      <category><![CDATA[deutsche welle news]]></category>
      <authorname>DW</authorname>
    </item>
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