<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><?xml-stylesheet href="/includes/rss.xsl" type="text/xsl" media="screen" ?><rss version="2.0" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>फिल्म समीक्षा</title><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/</link><description>मनोरंजन &gt; बॉलीवुड &gt; फिल्म समीक्षा</description><copyright>Copyright Webdunia.com</copyright><lastBuildDate>Fri, 20 Nov 2009 11:23:56 GMT</lastBuildDate><language>hi-IN</language><image><title></title><url></url><link></link></image><item about="handheld"><title>कुर्बान = न्यूयॉर्क + फना</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/20/1091120082_1.htm</link><description>लगभग एक सी कहानी पर थोड़े से फेरबदल के साथ ‘न्यूयॉर्क’ और ‘कुर्बान’ सामने आई। करण ने ‘कुर्बान’ में ‘फना’ को भी जोड़ दिया है। ‘कुर्बान’ के जरिये भी आतंकवाद को अपने तरीके से विश्लेषित किया गया है। कुछ मुसलमान इस्लाम की गलत व्याख्या कर आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं, जो कि गलत है। वही दूसरी ओर आतंकवादियों को ढूँढने के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में बेकसूर लोगों को मारा है वो भी आतंकवाद ही है। फिल्म की सोच भले ही सही हो, लेकिन अपनी बात कहने के लिए जो ड्रामा रचा गया है वो कमियों के साथ-साथ उबाऊ भी है। निर्देशक रेंसिल डीसिल्वा ने कहानी को वास्तविकता के नजदीक रखने की कोशिश की है, लेकिन कहानी में कुछ ऐसी कमियाँ हैं, जो हजम नहीं होती। सैफ का किरदार बीच फिल्म में अपनी धार खो देता है। न तो वह आतंकवादी लगता है और न ही ऐसा इंसान जिसकी सोच प्यार की वजह से बदल रही है। फिल्म के प्रचार में इसे एक प्रेम कहानी बताया गया है, लेकिन सैफ और करीना के प्रेम में गर्माहट नजर नहीं आती। कुल मिलाकर ‘कुर्बान’ न तो कुछ ठोस बात सामने रख पाती है और न ही मनोरंजन कर पाती है।</description><pubDate>Fri, 20 Nov 2009 11:24:12 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/20/1091120082_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/20/1091120082_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">कुर्बान = न्यूयॉर्क + फना</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/20/images/img1091120082_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>2012 : पृथ्वी की एक्सपायरी डेट</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/14/1091114106_1.htm</link><description>माया सभ्यता के कैलेंडर ने पृथ्वी की एक्सपायरी डेट दिसंबर 2012 घोषित की है, जिसको आधार बनाकर ‘2012’ का निर्माण किया है। कुछ वैज्ञानिक तथ्यों का भी इस्तेमाल किया गया है और चार्ल्स हैपगुड की 1958 में प्रस्तुत की गई अर्थ क्रस्ट डिस्प्लेसमेंट थ्योरी का हवाला भी दिया गया है। दुनिया खत्म किस तरह से होगी इसकी कल्पना ‘2012’ में की गई है। तबाही का जो खौफनाक मंजर पेश किया है वो दिल दहला देता है। फिल्म में कई किरदार हैं जिनके जरिये प्यार, नफरत, विश्वास, अविश्वास जैसे मानवीय स्वभावों को दिखाया गया है। फिल्म में ड्रामे की बजाय स्पेशल इफेक्ट्स पर जोर दिया है। स्पेशल इफेक्ट्स सुपरवाइज़र माइक वज़ीना नि:संदेह इस फिल्म के हीरो हैं। ‘इंडिपेडेंस डे’ और ‘द डे ऑफ्टर टूमारो’ जैसी फिल्म बनाने वाले रोलैंड एमरिच नेएक बार फिर उन्होंने उम्दा काम किया है, हालाँकि वे अपनी पिछले काम के नजदीक नहीं पहुँच पाए हैं। फिल्म का अंत थोड़ा लंबा हो गया है। जॉन क्यूसैक, अमांडा पीट, डैनी ग्लोवर सहित सारे कलाकारों का अभिनय उम्दा है। यह फिल्म आपको कल्पना की ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहाँ आप सब कुछ भूल जाते हैं।</description><pubDate>Sat, 14 Nov 2009 13:59:28 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/14/1091114106_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/14/1091114106_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">2012 : पृथ्वी की एक्सपायरी डेट</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/14/images/img1091114106_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>तुम मिले : फिल्म समीक्षा</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/13/1091113100_1.htm</link><description>‘तुम मिले’ के प्रचार में भले ही 26 जुलाई 2005 को मुंबई में बारिश से हुई तबाही की बात की जा रही हो, लेकिन निर्देशक कुणाल देशमुख ने अपना सारा ध्यान लव स्टोरी पर केन्द्रित किया है और बारिश वाली घटना को सिर्फ पृष्ठभूमि में रखा है। यदि 26 जुलाई वाले घटनाक्रम को अलग कर दिया जाए तो फिल्म की कहानी एकदम सामान्य है। 6 वर्ष पहले अलग हुए एक्स लवर्स अक्षय और संजना मुंबई में 26 जुलाई को मिलते हैं और मुसीबतों का सामना करते हुए उन्हें महसूस होता है कि वे अभी भी एक-दूसरे को चाहते हैं। जिंदगी से मिले दूसरे मौके को वे नहीं गँवाते हैं। इस प्रेम कहानी में कोई खास बात नहीं है। उनका प्रेम और तकरार दर्शकों को जोड़ नहीं पाता है। इमरान का चरित्र भी कन्फ्यूज्ड है। प्रीतम ने मधुर संगीत दिया है। अभिनय की बात की जाए तो इमरान कई दृश्यों में भावहीन हो जाते हैं। सोहा अली खान से उन्हें सीखना चाहिए, जिन्होंने बेहतरीन अभिनय किया है। कुल मिलाकर ‘तुम मिले’ में मधुर संगीत और कुछ अच्छे दृश्य हैं, लेकिन पूरी फिल्म के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है।</description><pubDate>Fri, 13 Nov 2009 11:22:19 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/13/1091113100_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/13/1091113100_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">तुम मिले : फिल्म समीक्षा</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/13/images/img1091113100_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>जेल : जेल का खेल</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/07/1091107105_1.htm</link><description>मधुर भंडारकर की ‘जेल’ से बहुत आशाएँ थीं क्योंकि उनकी फिल्म वास्तविकता के निकट होती है, लेकिन ‘जेल’ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। मधुर भंडारकर हार्ड हिटिंग फिल्मों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन ‘जेल’ में मधुर के आक्रामक तेवर गायब हैं। बजाय जेल के उन्होंने फिल्म के मुख्य किरदार पराग दीक्षित को ज्यादा अहमियत दी, इससे फिल्म उतनी प्रभावी नहीं बन पाई। जेल का वास्तविक चित्रण इस फिल्म का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट होना था। मधुर ने इसे दिखाने की कोशिश तो की है, लेकिन सॉफ्टनेस के साथ। इससे फिल्म का पैनापन कम हो गया। साथ ही ‘जेल’ देखने के बाद ऐसा लगता है कि सारे अपराधी बेगुनाह हैं और जेल में रखकर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है। पराग को मासूम दिखाने के चक्कर में मधुर ने दूसरे किरदारों को भी दिल का अच्छा दिखाया है। जरूरी नहीं है कि जेल में सजा भोग रहे सभी अपराधियों के दिल नेक हो। पोल-खोल अभियान में जुटे मधुर फॉर्मूले का शिकार हो गए हैं। हर बार वे जिंदगी से वे एक खास वर्ग या सिस्टम को चुनते हैं और फॉर्मूले की तरह उनका चित्रण करते हैं। कुल मिलाकर ‘जेल’ से मधुर का वो टच गायब है, जिसके लिए वे जाने जाते हैं।</description><pubDate>Sat, 07 Nov 2009 13:47:05 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/07/1091107105_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/07/1091107105_1.htm" height="148" width="148" medium="image" /><media:title type="plain">जेल : जेल का खेल</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/07/images/img1091107105_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>अजब प्रेम की गजब कहानी : हँसी का खजाना</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/06/1091106068_1.htm</link><description>‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ में दर्शकों का हँसना पहली रील से शुरू होता है और वो सिलसिला फिल्म की अंतिम रील तक चलता है। एक लव स्टोरी को हास्य की चाशनी में डूबोकर पेश किया गया है। फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है। लेकिन जो बात इस फिल्म को खास बनाती है वो है इसका प्रस्तुतिकरण। स्क्रीनप्ले इस तरह से लिखा गया है कि हँसी का सिलसिला थमता ही नहीं है। एक दृश्य को देख हँसी थमती नहीं कि दूसरा आ टपकता है। कॉमेडी का स्तर पूरी फिल्म में एक जैसा बना रहता है। निर्देशक राजकुमार संतोषी ने रोमांस और कॉमेडी का संतुलन बनाए रखा है और हास्य को अश्लीलता से दूर रखा है। उन्होंने नया करने के बजाय ये ध्यान में रखकर फिल्म बनाई है कि दर्शकों को क्या पसंद है और उसी चीज को उन्होंने दोहराया है। फिल्म की कहानी में कुछ खामियाँ है, लेकिन हास्य के तले वे कमियाँ दब जाती हैं। रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की कैमेस्ट्री गजब ढाती है। प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध कुछ गाने अच्छे हैं तो कुछ बुरे। कुल मिलाकर ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ बच्चे, बूढ़े और नौजवान सभी को पसंद आएगी।</description><pubDate>Fri, 06 Nov 2009 10:57:18 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/06/1091106068_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/06/1091106068_1.htm" height="120" width="120" medium="image" /><media:title type="plain">अजब प्रेम की गजब कहानी : हँसी का खजाना</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0911/06/images/img1091106068_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>अलादीन : फिल्म समीक्षा</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/31/1091031143_1.htm</link><description>सालों पुरानी अलादीन और जिन्न की कहानी को निर्देशक सुजॉय घोष वर्तमान में खींच लाए हैं। इस कहानी में उन्होंने अपनी कल्पना मिला दी और नई कहानी तैयार कर दी। लेकिन चार साल तक इस फिल्म पर मेहनत करने वाले सुजॉय यह तय नहीं कर पाए कि ये फिल्म वे किस दर्शक वर्ग को ध्यान में रखकर बना रहे हैं। बच्चों और वयस्कों दोनों को खुश करने में संतुलन बिगड़ गया। दूसरी बात जो ‘अलादीन’ के खिलाफ जाती है वो है इसकी अवधि। 133 मिनट जो उन्होंने अपनी बात कहने में लगाए हैं, उसे वे 90 मिनट में भी कह सकते थे, बशर्ते वे गानों और लंबे क्लायमैक्स का मोह छोड़ देते। कुल मिलाकर ‘अलादीन’ ऐसी फिल्म है जो बच्चे या बड़े में से किसी का भी दिल नहीं जीत पाती।</description><pubDate>Sat, 31 Oct 2009 13:40:13 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/31/1091031143_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/31/1091031143_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">अलादीन : फिल्म समीक्षा</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/31/images/img1091031143_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>लंदन ड्रीम्स : दोस्ती, संगीत और प्रेम का त्रिकोण</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/30/1091030096_1.htm</link><description>विपुल शाह द्वारा निर्देशित फिल्म ’लंदन ड्रीम्स’ बनाने की प्रेरणा कई फिल्मों से ली गई है। दोस्ती, प्रेम त्रिकोण और संगीत को आधार बनाया गया है, लेकिन फिल्म का सिर्फ पैकेजिंग उम्दा हो पाया है। फिल्म से इतने बड़े नाम जुड़े होने के कारण जो अपेक्षाएँ फिल्म से रहती हैं उन पर यह खरी नहीं उतर पाती है। कहानी में तमाम तरह के मसाले हैं, इसके बावजूद कहानी को ठीक से लिखा नहीं गया है। कहानी को कहने में जल्दबाजी की गई है। हर महत्वपूर्ण घटना अचानक हो जाती है और उनके पीछे कोई ठोस कारण नजर नहीं आता। निर्देशक विपुल शाह भी संभवत: कहानी की इन कमियों से वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने अपना सारा जोर रोमांस, कॉमेडी और भव्यता पर लगाया। उन्होंने फिल्म की गति तेज रखी ताकि दर्शकों का ध्यान इन कमियों पर न जाए और इसमें वे कामयाब भी रहे हैं। फिल्म संगीत पर आधारित है, लेकिन शंकर-अहसान-लॉय का संगीत निराश करता है। अजय के मुकाबले सलमान का अभिनय उम्दा है। असिन ने पता नहीं क्यों यह कमजोर भूमिका की। कुल मिलाकर ‘लंदन ड्रीम्स’ का मजा आप कहानी की कमजोरी पर ध्यान न देकर ही उठा सकते हैं।</description><pubDate>Fri, 30 Oct 2009 14:00:19 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/30/1091030096_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/30/1091030096_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">लंदन ड्रीम्स : दोस्ती, संगीत और प्रेम का त्रिकोण</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/30/images/img1091030096_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>मैं और मिसेस खन्ना : दूर रहिए इस परिवार से</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/17/1091017030_1.htm</link><description>‘मैं और मिसेस खन्ना’ को प्रेम सोनी ने लिखा और निर्देशित भी किया है। यह बताना बहुत मुश्किल है कि उनका निर्देशन खराब है या लेखन। ‘मैं और मिसेस खन्ना’ की कहानी अच्छी हो सकती थी, यदि इसमें ड्रामा मजबूत होता। फिल्म में कई घटनाक्रम अविश्वसनीय है। समझ में नहीं आता कि क्या सोचकर सलमान और करीना जैसे सितारों ने यह फिल्म साइन की है। कहानी को इस तरह फिल्माया गया है कि दर्शक ऊँघने लगता है और स्क्रीन पर क्या चल रहा है, इसमें उसे कोई रूचि नहीं होती है। सलमान खान ने अपना किरदार गंभीरता से निभाया है। करीना का अभिनय शानदार है। सोहेल खान ने एक बार फिर अभिनय करने की असफल कोशिश की है। साजिद-वाजिद के एक-दो गाने ठीक-ठाक है। दीपिका पादुकोण, प्रिती जिंटा, डीनो मेरिय और बप्पी लाहिरी ने भी कुछ देर के लिए अपने चेहरे सलमान की खातिर फिल्म में दिखाए हैं। कुल मिलाकर इस खन्ना परिवार से दूर रहने में ही भलाई है।</description><pubDate>Sat, 17 Oct 2009 06:18:03 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/17/1091017030_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/17/1091017030_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">मैं और मिसेस खन्ना : दूर रहिए इस परिवार से</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/17/images/img1091017030_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>ऑल द बेस्ट : फिल्म समीक्षा</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016135_1.htm</link><description>‘गोलमाल’ और ‘गोलमाल रिटर्न’ की सफलता के बाद रोहित शेट्टी उस भ्रम का शिकार हो गए, जो कई फिल्मकारों को लील गया। रोहित को लगने लगा है कि उन्हें सफलता का फॉर्मूला मिल गया है, जिसका नतीजा ‘ऑल द बेस्ट’ में नजर आता है। यह फिल्म दोहराव का शिकार है और रोहित कुछ नया नहीं दे पाए। ‘मिस्टेकन आइडेंटिटी’ को लेकर कई हास्य फिल्में बनी हैं और यही थीम ‘ऑल द बेस्ट’ की भी है, लेकिन इस फिल्म के हास्य में वो धार नहीं है जो पूरी फिल्म में दर्शकों को हँसने पर मजबूर कर दे। ‘राइट बैड, रांग हसबैण्ड’ से प्रेरित ‘ऑल द बेस्ट’ सिंगल ट्रेक पर चलती है। पूरी फिल्म में प्रेम और वीर, धरम के आगे यह साबित करने में लगे रहते हैं कि जाह्नवी ही विद्या है। फिल्म में कई किरदार आते हैं, जिससे कई बार प्रेम और वीर की पोल खुलते-खुलते रह जाती है। तरह-तरह के बहाने वे बनाकर धरम को बेवकूफ बनाते हैं। दो-चार बार तो यह बहाने ठीक लगते हैं, लेकिन बार-बार इन्हें देख कोफ्त होने लगती है। निर्देशक रोहित शेट्टी ने हर सीन में हास्य पैदा करने की कोशिश की है लेकिन बात नहीं बनी। कुल मिलाकर ‘ऑल द बेस्ट’ एक औसत फिल्म है।</description><pubDate>Fri, 16 Oct 2009 13:48:36 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016135_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016135_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">ऑल द बेस्ट : फिल्म समीक्षा</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/images/img1091016135_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>ब्लू : पानी में डूबोने लायक</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016116_1.htm</link><description>यह बात हजार बार दोहराई जा चुकी है कि फिल्म बनाते समय सबसे ज्यादा ध्यान कहानी और स्क्रीनप्ले पर दिया जाना चाहिए क्योंकि ये किसी ‍भी फिल्म की सफलता का मुख्य आधार होते हैं। बड़े फिल्म स्टार्स साइन करने से, स्टंट और गानों से, पानी के अंदर या आसमान में करोड़ों रुपए खर्च कर फिल्माए दृश्यों से कुछ नहीं होता है। लेकिन ये बुनियादी बात अभी तक कई लोगों के समझ में नहीं आई है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई ‘ब्लू’ इसका ताजा उदाहरण है।एक ढंग की कहानी इससे जुड़े निर्माता-निर्देशक नहीं खोज पाए। कहानी ऐसी है, जिसे कोई भी लिख सकता है। इसे भी निर्देशक एंथनी डिसूजा स्क्रीन पर मनोरंजक तरीके से पेश नहीं कर पाएँ। एंथोनी डिसूजा ने सारा ध्यान स्टाइल पर दिया है। फिल्म के प्रचार में अंडर वॉटर एक्शन की काफी बात की गई हैं, लेकिन ये खासियत फिल्म में कहीं नजर नहीं आती। कुल मिलाकर &apos;ब्लू&apos; निराश करती है।</description><pubDate>Fri, 16 Oct 2009 13:50:54 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016116_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/1091016116_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">ब्लू : पानी में डूबोने लायक</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/16/images/img1091016116_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>एसिड फैक्ट्री : स्टाइलिश और रोचक</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/10/1091010111_1.htm</link><description>यूँ तो ‘एसिड फैक्ट्री’ का निर्देशन सुपर्ण वर्मा ने किया है, लेकिन फिल्म पर निर्माता संजय गुप्ता की छाप साफ नजर आती है। संजय गुप्ता लार्जर देन लाइफ और स्टाइलिश फिल्म बनाना पसंद करते हैं। उनकी फिल्म के किरदार अपराध जगज से जुड़े रहते हैं और ग्रे शेड लिए रहते हैं। ‘एसिड फैक्ट्री’ भी गुप्ता की फैक्ट्री से निकली एक ऐसी ही फिल्म है। फिल्म की कथा रोचक है और दर्शक भी याददाश्त खोए हुए सभी किरदारों की तरह जानना चाहता है कि उनकी असलियत क्या है। यह उत्सुकता फिल्म में दिलचस्पी बनाए रखती है। एक एसिड फैक्ट्री में दो लोग ऐसे हैं जिन्हें अपहृत कर ‍लाया गया है और कुछ लोग अपहरणकर्ता हैं। फैक्ट्री में गैस लीकेज हो जाती है और वे कुछ घंटों के लिए याददाश्त खो बैठते हैं। उन्हें समझ में नहीं आता कि वे कौन हैं? यहाँ क्यों आए हैं? उनका क्या मकसद है। फिल्म को स्टाइलिश बनाने में एक्शन डॉयरेक्टर और सिनेमॉटोग्राफर का अहम योगदान है। एक्शन डॉयरेक्टर टीनू वर्मा ने बेहतरीन तरीके से स्टंट और चेज़ सीक्वेंस को अंजाम दिया है। यदि आप थ्रिलर और स्टाइलिश फिल्म पसंद करते हैं तो 98 मिनट का यह सौदा बुरा नहीं है।</description><pubDate>Sat, 10 Oct 2009 13:42:45 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/10/1091010111_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/10/1091010111_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">एसिड फैक्ट्री : स्टाइलिश और रोचक</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/10/images/img1091010111_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>डू नॉट डिस्टर्ब : गोविंदा-डेविड की कमजोर फिल्म</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/03/1091003092_1.htm</link><description>कई कामयाब फिल्म देने वाली गोविंदा-डेविड धवन की सफल जोड़ी एक बार फिर ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ लेकर हाजिर है। उम्मीद ज्यादा होना स्वाभाविक है, लेकिन इस बार यह जोड़ी उम्मीद पर खरी नहीं उतरती। ऐसा लगता है कि दोनों के पास नया देने के लिए कुछ नहीं बचा है। अपनी ही पुरानी फिल्मों को देख इन्होंने नई फिल्म तैयार कर दी है। माना कि डेविड धवन की फिल्मों में दिमाग नहीं लगाया जाना चाहिए या उनकी फिल्म में कहानी पर गौर नहीं करना चाहिए, लेकिन ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ के कॉमेडी सीन दोहराव और बासीपन के शिकार हैं। फिल्म की कहानी कमजोर है, इसलिए कॉमिक दृश्यों का सशक्त होना जरूरी है ताकि दर्शक कहानी को छोड़ इनका मजा ले सकें। यहीं पर फिल्म कमजोर साबित होती है। अधिकांश दृश्यों को देख हँसी नहीं आती बल्कि बोरियत पैदा होती है। निर्देशक डेविड धवन फॉर्म में नजर नहीं आए और यही हाल गोविंदा का रहा। गोविंदा का अभिनय ‘अच्छे से बुरे’ के बीच झूलता रहा। लारा दत्ता निराश करती हैं। कुल मिलाकर ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ डेविड-गोविंदा की एक कमजोर फिल्म है।</description><pubDate>Sat, 03 Oct 2009 13:48:50 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/03/1091003092_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/03/1091003092_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">डू नॉट डिस्टर्ब : गोविंदा-डेविड की कमजोर फिल्म</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/03/images/img1091003092_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>वेक अप सिड, सारे पल कहें</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/02/1091002042_1.htm</link><description>&apos;वेक अप सिड&apos; जिंदगी के प्रति भिन्न नजरिया रखने वाले दो लोगों की कहानी है। सिड का कोई लक्ष्य नहीं है। लांग ड्राइव, सुपार्टियाँ, इंटरनेट और वीडियो गेम्स के सहारे सिड की जिंदगी गुजरती है। आयशा की सोच सिड से अलग है। उसके कुछ लक्ष्य हैं। उम्र में सिड से थोड़ी बड़ी आयशा, सिड को बच्चा मानती है और उसे परिपक्व इंसान की तलाश है। जिंदगी के प्रति विपरीत नजरिया रखने वाले जब दो इंसान साथ रहते हैं तो एक-दूसरे के गुण-अवगुण वे अपना लेते हैं। सिड और आयशा के रिश्ते और जिंदगी के प्रति नजरिये को फिल्म बखूबी उभारती है, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि में चल रहे घटनाक्रमों पर ध्यान नहीं दिया गया, जिससे फिल्म का समग्र प्रभाव कम हो जाता है। कहानी में ज्यादा उतार-चढ़ाव और ड्रामा नहीं है। यह सिर्फ संवादों के सहारे आगे बढ़ती है और सिर्फ दो किरदारों के इर्दगिर्द घूमती है, इसलिए निर्देशक पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि दर्शकों की दिलचस्पी बनी रहे। इसमें अयान थोड़े बहुत कामयाब रहे हैं। फिल्म की धीमी गति अखरती है। यह यादगार फिल्म नहीं है, लेकिन इसमें ताजगी है, जिसकी वजह से यह एक बार देखी जा सकती है।</description><pubDate>Fri, 02 Oct 2009 10:24:56 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/02/1091002042_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/02/1091002042_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">वेक अप सिड, सारे पल कहें</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0910/02/images/img1091002042_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>व्हाट्स योर राशि</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/25/1090925128_1.htm</link><description>गंभीर फिल्म बनाने वाले ज्यादातर फिल्म निर्देशक ये मानते हैं‍ हल्की-फुल्की मनोरंजक फिल्म बनाना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है, लेकिन ये बात उतनी आसान नहीं है। निर्देशक आशुतोष गोवारीकर भी इस मामले में मात खा गए। वे अपनी बात को विस्तार से रखते हैं, इसलिए उनकी फिल्मों की अवधि ज्यादा होती है। फिल्म की लंबाई से कोई समस्या नहीं है, लेकिन उसमें इतना दम होना चाहिए कि वो दर्शकों को बाँधकर रख सके। 3 घंटे 31 मिनट की ‘व्हाट्स योर राशि’ का ग्राफ मनोरंजन और बोरियत के बीच लगातार उतरता-चढ़ता रहता है और फिल्म बिखरी हुई नजर आती है। फिल्म से कसावट नदारद है। ऐसा लगता है कि संपादन हुआ ही नहीं है। परिणामस्वरूप फिल्म प्रभावित नहीं करती है। कहानी है एनआरआई लड़के की जो शादी के लिए 12 राशियों की लड़कियों से मुलाकात करता है। फिल्म के लेखक इन मुलाकातों को दिलचस्प तरीके से पेश नहीं कर सके। 13 गानें ठूँसे गए लगते हैं। प्रियंका चोपड़ा ने 12 भूमिकाएँ अभिनीत की हैं। मेकअप के साथ आवाज और बॉडी लैंग्वेज के जरिये उन्होंने विविधता पेश की। हरमन का अभिनय भी उम्दा है। कुल मिलाकर &apos;व्हाट्स योर राशि&apos; की राशि में कुछ खास नहीं है।</description><pubDate>Fri, 25 Sep 2009 12:40:39 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/25/1090925128_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/25/1090925128_1.htm" height="179" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">व्हाट्स योर राशि</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/25/images/img1090925128_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>दिल बोले हड़िप्पा : वीर, वीरा और क्रिकेट</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918137_1.htm</link><description>यशराज फिल्म्स वालों की सोच सीमित हो गई है। अपनी ही पिछली कुछ फिल्मों को घुमा-फिराकर उन्होंने ‘दिल बोले हड़िप्पा’ बना दी है। वही पंजाब, भारत-पाकिस्तान (वीर जारा), खेल (चक दे इंडिया), नाच-नौटंकी (आजा नच ले), भेष बदलना (रब ने बना दी जोड़ी) जैसी चीजें इस फिल्म में नजर आती है। डीडीएलजे को हर फिल्म में याद किया जाता है। वीरा (रानी मुखर्जी) को क्रिकेट खेलके का शौक है, लेकिन लड़कों के साथ वह कैसे खेले। वह भेष बदलकर रोहन (शाहिद कपूर) की टीम में शामिल हो जाती है जो अपने पिता की टीम को अमन कप में जितवाने लंदन से आया हुआ है, जो नौ सालों से हार रही है। यहाँ तक तो फिल्म ठीक है, लेकिन दिक्कत शुरू तब होती है जब रोहन और वीरा में रोमांस शुरू होता है। रोमांस एकदम ठंडा है। निर्देशक अनुराग सिंह की यह फिल्म में बनावटीपन ज्यादा झलकता है, इसलिए फिल्म प्रभावित नहीं करती। अंत में रोहन अपने पिता की टीम को जिताकर ही दम लेता है। ‘दिल बोले हड़िप्पा’ बुरी फिल्म नहीं है, लेकिन यशराज फिल्म्स अपनी उन्हीं बातों को अब रबर की तरह खींचने लगा है, जिससे वे अब अपना प्रभाव खोती जा रही हैं। जनाब आदित्य, अब कुछ नया करिए।</description><pubDate>Fri, 18 Sep 2009 14:03:13 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918137_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918137_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">दिल बोले हड़िप्पा : वीर, वीरा और क्रिकेट</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/images/img1090918137_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>वॉन्टेड : राधे का जलवा</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918114_1.htm</link><description>तमिल फिल्म ‘पोकिरी’ पर आधारित ‘वान्टेड’ की कहानी धागे जैसी पतली है। आगे क्या होने वाला है ये सभी को पता रहता है। क्लाइमेक्स के थोड़ा पहले तक कहानी आगे खिसकती भी नहीं है। फिर भी फिल्म में रूचि बनी रहती है क्योंकि निर्देशक प्रभुदेवा ने दृश्यों की असेंबलिंग बहुत ही उम्दा तरीके से की है। एक्शन, हास्य और रोमांस का मिश्रण बिलकुल बराबर मात्रा में किया है। सलमान खान को बेहतरीन तरीके से पेश किया है। उनके ढेर सारे प्रशंसक उन्हें इसी रूप में देखना पसंद करते हैं। सलमान की जो इमेज है वह राधे के किरदार से बिलकुल मेल खाती है। अक्खड़, थोड़ा बिगड़ैल लेकिन दिल का हीरा, बेखौफ, लार्जर देन लाइफ सी शख्सियत, अपनी मर्जी से जीने वाला, स्टाइलिश। लगता ही नहीं कि सलमान एक्टिंग कर रहे हैं। पूरी फिल्म में सलमान का प्रभुत्व है। सल्लू की हीरोगिरी दिखाने के लिए स्क्रिप्ट की खामियों को भी नजरअंदाज कर दिया गया है। एक्शन इस फिल्म का प्रमुख आकर्षण है। कई एक्शन/स्टंट बेहतरीन बन पड़े हैं। यदि आप एक्शन फिल्म पसंद करते हैं और सलमान खान के प्रशंसक हैं तो ‘वॉन्टेड’ आपके लिए है तीखे मसालों के साथ।</description><pubDate>Fri, 18 Sep 2009 11:55:18 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918114_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/1090918114_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">वॉन्टेड : राधे का जलवा</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/18/images/img1090918114_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>बाबर : हर तरह से कमजोर</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/14/1090914119_1.htm</link><description>सच्ची कहानी होने के बावजूद अगर आपके पास स्क्रिप्ट के नाम पर कचरा और दिमाग के नाम पर सड़ा हुआ खरबूजा है, तो आप &quot;बाबर&quot; जैसी फिल्म बना मारेंगे। आशु त्रिखा की इस फिल्म को कानपुर के किसी अपराधी पर आधारित बताया गया है, मगर फिल्म में बहुत-सी गलतियाँ हैं। पहली गलती है कास्टिंग की। नए नायक सोहम अभिनय के मामले में जीरो हैं। उनका चेहरा सपाट है।गोलियाँ तो फिल्म में ऐसे चलती हैं, जैसे हवा चल रही हो। फिल्म देख यह भी लगता है कि निर्देशक आशु त्रिखा पर बहुत-सी फिल्मों का प्रभाव है। वे उर्वशी को मकबूल की तब्बू की तरह वापरना चाहते थे। फिल्म में लगातार मार-धाड़ चलती रहती है, पर यह समझ नहीं आता कि क्यों चल रही है, कैसे चल रही है। अपराध की दुनिया में अंधाधुँध गोलीबारियाँ तो बहुत कम होती हैं, घात-प्रतिघात और विश्वासघात ज्यादा होते हैं। पूरी फिल्म में केवल ओमपुरी ही हैं, जो बाँधे रखते हैं, वरना सब फालतू हैं। कहानी भी किसी एंगल से गले नहीं उतरती। कुल मिलाकर यह बेहूदा-सी फिल्म है जिसे देखने के बाद घंटों सिर भारी रहता है।</description><pubDate>Mon, 14 Sep 2009 12:50:31 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/14/1090914119_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/14/1090914119_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">बाबर : हर तरह से कमजोर</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/14/images/img1090914119_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>वादा रहा : नहीं निभाती वादा</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/11/1090911111_1.htm</link><description>‘वादा रहा’ कहानी है दो मरीजों की। जिसमें से एक वयस्क है और दूसरा बच्चा। इन दोनों के जरिये आशा और निराशा को पेश किया गया है। विचार अच्छा है, लेकिन लेखन ऐसा नहीं है जो गले उतर जाए। इससे फिल्म ठीक से प्रभाव नहीं छोड़ पाती है। ड्यूक चावला (बॉबी देओल) के पास हर खुशी है, लेकिन एक दुर्घटना के बाद उसकी जिंदगी बदल जाती है। गर्लफ्रेंड साथ छोड़ देती है और ड्यूक अस्पताल में लाचार पड़ा रहता है। ऐसे में उसकी जिंदगी में रोशन आता है। वह ड्यूक के अंदर से निराशा को निकालता है और जिंदगी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रवैया अपनाने की सलाह देता है। धीरे-धीरे ड्यूक फिर से चलने-फिरने लायक हो जाता है। स्क्रीनप्ले ‍फिल्म की कमजोर कड़ी है। कंगना का किरदार ठीक से पेश नहीं किया गया है। बॉबी का ठीक होना फिल्मी लगता है। द्विज यादव के मुँह से संवाद बुलवाए गए हैं उन्हें सुन लगता है मानो कोई बच्चा नहीं बल्कि उम्रदराज अनुभवी इंसान बोल रहा हो। संगीत भी इस फिल्म का निराशाजनक पहलू है। अभिनय की बात की जाए तो पूरी फिल्म में बॉबी छाए रहे। कुल मिलाकर ‘वादा रहा’ अच्छी फिल्म का वादा नहीं निभा पाती है।</description><pubDate>Fri, 11 Sep 2009 13:46:21 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/11/1090911111_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/11/1090911111_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">वादा रहा : नहीं निभाती वादा</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/11/images/img1090911111_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>मूरख चिंटूजी की बोगस फिल्म</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/07/1090907028_1.htm</link><description>भरोसे की भैंस कभी-कभी पाड़ा भी दे दिया करती है। कभी-कभी तो आप दूध के लिए ही बैठे रह जाते हैं और भैंस कुछ भी नहीं देती... न पाड़ा, न पाड़ी और न दूध... गोबर तक नहीं। बॉबी बेदी की प्रोड्यूस की हुई फिल्म &quot;चिंटूजी&quot; ऐसी ही भरोसे भी भैंस निकली। इंटरवेल तक तो कई बार लगा कि हम श्याम बेनेगल की &quot;वेलकम टू सज्जनपुर&quot; जैसी कोई चीज देख रहे हैं। मगर इंटर के बाद फिल्म एकदम ही चौपट हो जाती है। फिल्म का कोई चरित्र ही नहीं बन पाया कि आखिर यह है क्या? व्यंग्य है, हास्य है, करुण कहानी है, मसाला फिल्म है और आखिरकार है क्या? इस कहानी में अपार संभावनाएँ थीं। फिल्म वाले राजनीति में कैसे जाते हैं, जाकर क्या करते हैं, कैसे उन्हें राजनीति में माहौल अजनबियत भरा लगता है, कैसे उनका मोहभंग होता है...। मगर यह फिल्म कुछ नहीं कर पाई। चिंटूजी का चरित्र भी फिल्म के चरित्र की तरह बेबूझ है। गाँव का चरित्र भी अनगढ़ है। कभी-कभी बड़े नाम भी भरमा देते हैं। इस बार भी यही हुआ। जिस फिल्म से बहुत उम्मीदें थीं, वह गलत निकल गई है।</description><pubDate>Mon, 07 Sep 2009 11:05:43 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/07/1090907028_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/07/1090907028_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">मूरख चिंटूजी की बोगस फिल्म</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/07/images/img1090907028_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item><item about="handheld"><title>फॉक्स : नहीं बनी बात</title><category domain="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/">फिल्म समीक्षा</category><link>http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/04/1090904113_1.htm</link><description>सस्पेंस-थ्रिलर ‘फॉक्स’ के साथ के साथ वहीं समस्या है जो आमतौर पर इस तरह की फिल्मों के साथ होती है। रहस्य का ताना-बाना तो अच्छी तरह बुन लिया जाता है, लेकिन जब रहस्य पर से परदा उठाने की बारी आती है तो लेखक ऐसे तर्क और घटनाक्रम सामने रखता है जो तर्कसंगत नहीं लगते और मामला टाँय-टाँय फिस्स हो जाता है। निर्देशक और लेखक कहानी को ठीक तरह से समेट नहीं पाए। कहानी को पूरा करने के लिए उन्होंने तर्क-वितर्कों को परे रखकर फिल्म के नाम पर खूब छूट ले ली। फिल्म देखते समय कई प्रश्न दिमाग में उठते हैं,‍ जिनके जवाब देने में लेखक असफल रहे हैं। दीपक का निर्देशन उनके लेखन से बेहतर है। इंटरवल के ठीक पहले फिल्म में एंट्री लेने वाले सनी देओल का किरदार भी ठीक से नहीं लिखा गया है। अर्जुन रामपाल का अभिनय औसत है और उनके द्वारा बोले गए कुछ संवाद अधूरे लगते हैं। सनी देओल ने नियंत्रित अभिनय किया है। सागरिका घाटगे के मुकाबले उदिता गोस्वामी बेहतर रही। कुल मिलाकर ‘फॉक्स’ एक औसत फिल्म है।</description><pubDate>Fri, 04 Sep 2009 10:46:22 GMT</pubDate><source url="http://www.webdunia.com" media="handheld" /><guid isPermaLink="true">http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/04/1090904113_1.htm</guid><media:group><media:content url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/04/1090904113_1.htm" height="150" width="150" medium="image" /><media:title type="plain">फॉक्स : नहीं बनी बात</media:title><media:thumbnail url="http://hindi.webdunia.com/entertainment/film/review/0909/04/images/img1090904113_1_1.jpg" /><media:description></media:description><media:credit></media:credit></media:group></item></channel></rss>