आकलनकर्ता का उत्थान

पिछले सप्ताह मैंने बताया था कि किस प्रकार हमारे अंदर बैठा एक आकलनकर्ता हमारे प्रत्येक कार्य को आकलित करता है और इस आकलन के आधार पर हमारे मन में अपने बारे में एक आत्म-बिम्ब (सेल्फ-इमेज) का निर्माण करता है। ऐसे में जब हम किसी कठिन कार्य को करने का बीड़ा उठाते हैं तो हमारा आत्म-बिम्ब यदि सकारात्मक हो तो वह हमें कार्य को कामयाबी से पूरा करने का साहस और आत्मविश्वास देता है। यदि हमारा आत्म-बिम्ब नकारात्मक हो तो वह हमारे धैर्य को कमजोर करता है। 
 
आकलनकर्ता मन की एक प्रक्रिया है या यों कह लीजिए कि मन की एक व्यवस्था है, परंतु इसकी कल्पना एक व्यक्ति के रूप में करने से हम इसके कार्यकलापों को अधिक अच्छी प्रकार समझ सकते हैं इसलिए आकलनकर्ता की कल्पना ऐसे की‍‍जिए जैसे कि हमारे अंदर कोई कॉपी-पेंसिल लेकर बैठा हमारे हर काम पर नजर रख रहा है और नोट करता है कि हम कौन-सा काम कितनी अच्छी प्रकार करते हैं।   
 
आकलनकर्ता आता कहां से है? 
 
नवजात शिशु अपने इर्द-गिर्द के संसार को समझने की कोशिश करता है। आरंभ में तो उसे सब कुछ रंग-बिरंगे धब्बों जैसा दिखाई देता है, परंतु धीरे-धीरे उसे चलते-फिरते मनुष्य दिखाई देने लगते हैं। वह उन्हें ‘मामा’, ‘पापा’, ‘दीदी’ के नाम से बुलाना सीख जाता है।
 
इसी दौरान वह सीखता है कि क्या करना उचित है और क्या उचित नहीं है। जब वह मेज पर हाथ मार-मारकर चिल्लाता है तो सभी ताली मार-मार हंसते हैं, लेकिन जब वह अपने किसी बड़े-बजुर्ग के गाल पर थप्पड़ मारकर इस अपेक्षा से इधर-उधर देखता है कि सभी हंसेंगे तो डांट पड़ती है। वह धीरे-धीरे समझ जाता है कि कुछ कामों से शाबाशी मिलती है और कुछ से डांट पड़ती है। इंगलिश में कहें तो He learns the Dos and Donts of the society। समाज में अनुशासन में रहने की इसी सीख को समाजीकरण (Socialisation) कहते हैं। समाजीकरण मानव जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है। जिन व्यक्तियों का समाजीकरण सही ढंग से नहीं होता वे कानूनों को तोड़ने वाले समाज-विरोधी तत्व बन जाते हैं। 
 
समाजीकरण के साथ-ही-साथ एक और प्रक्रिया भी व्यक्ति की मानसिकता को बहुत प्रभावित करती है। बड़े हो रहे बच्चे के इर्द-गिर्द बहुत से लोग उसके बारे में कुछ-न-कुछ कहते रहते हैं। नितिन 5वीं कक्षा में पढ़ता है और अपने बारे में उसका आत्म-बिम्ब तेजी से उसके मन में आकार ले रहा है। आइए देखते हैं उसके बारे में कौन क्या कहता है- 
 
नितिन का अध्यापक नितिन के पिता से : आपके बेटे से तो कुछ भी कराना बहुत मुश्किल है। यह तो रोने-रुला देता है। ऐसा सुस्त बच्चा मैंने पहले कभी नहीं देखा। 
 
नितिन की मां अपनी सहेली से : रोज किसी-न-किसी से पिटकर आता है। जाने क्यों यह गधा हाथ उठाकर बदला नहीं ले सकता। 
 
नितिन का मित्र नितिन से : तुम्हारा गला तो बहुत सुरीला है और डांस भी इतना बढ़िया करते हो। भगवान ने तुम्हें रफी का गला दिया है और गोविंदा की टांगें। 
 
दूसरों द्वारा उसके बारे में कही गई बातें नितिन के मन में बैठ जाती हैं। उसके मन में अपने बारे में एक आत्म-बिम्ब बनता है। यह आत्म-बिम्ब उसे अपने बारे में ‘मैं कैसा व्यक्ति हूं? मेरे गुण--अवगुण क्या हैं?’ यह सब जानने में सहायता करता है। यदि हम उससे उसके बारे में पूछें तो शायद वह कुछ ऐसा जवाब देगा : 
 
* मैं थोड़ा सुस्त हूं। मैं तब तक कुछ नहीं करता, जब तक कि मुझे मजबूर न किया जाए। 
* मैं कायर हूं और जब मुझे कोई मार-पीट दे तो मैं बदले में कुछ नहीं करता। 
* मेरे माता-पिता मुझे बेकार समझते हैं और मैं उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता। 
* मैं बहुत बढ़िया गाता हूं और डांस करता हूं।
 
परिपक्वता :  जैसे-जैसे समय गुजरता है तो नितिन की अपने बारे में इस सोच में परिपक्वता आती जाती है। उसके मन में यह बात और पक्की होती जाती है कि वह सुस्त है और कायर है। उसे वह काम करना अच्छा नहीं लगता जिसमें चुस्त-दुरुस्त होना जरूरी हो, लेकिन उसे गाना अच्छा लगता है। पढ़ाई में कमजोर होने से उसे पढ़ाई में अक्सर डांट पड़ती है इसलिए उसका मन पढ़ाई से और अधिक उठता जाता है। गाने में उसे सफलता मिलती है इसलिए उसे गाना अच्छा लगता है। वह जब गाता है, मन से गाता है। धीरे-धीरे वह गाने के क्षेत्र में कामयाब होकर नाम कमा लेता है। तब उसके मां-बाप भी उसे उसकी इस उपलब्धि के लिए सराहते हैं। 
 
इसी प्रकार धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व का विकास होता है और हमारा व्यक्तित्व सबसे अलग बनता है। इस विश्व में हर व्यक्ति का स्वभाव बाकी सबसे अलग है। इस अंतर को मनोवैज्ञानिक individual differences की संज्ञा देते हैं। व्यक्तित्व में अंतर का अध्ययन मनोविज्ञान की एक बहुत अहम शाखा है। जैसे-जैसे लेखों की यह श्रृंखला आगे बढ़ेगी, हम भी इस विषय पर बात करेंगे। तब आप समझ पाओगे कि ऐसा क्यों होता है कि एक ही परिवार में एक बच्चा संत बन जाता है और एक डाकू। 
 
एक परिशोध : मानव मन के बारे में और गहन विचार करने से पहले आइए एक छोटा-सा टेस्ट करते हैं। नीचे 5 वाक्य दिए गए हैं। इनमें से प्रत्येक बात से आप किस हद तक सहमत हैं, इसे 0 से 9 तक अंक देकर बताइए। यदि आप पूरी तरह सहमत हैं तो 9 अंक दीजिए। यदि बिलकुल भी सहमत नहीं तो 0 अंक दीजिए अन्यथा जितने अंक ठीक समझें, दीजिए। 
 
1. जीवन में हमारी कामयाबी अधिकतर हमारे भाग्य पर निर्भर है। 
 
2. मेरे लिए यह उतना महत्वपूर्ण नहीं कि मेरा बॉस क्या कहता है जितना यह कि मैं अपने काम की शैली के बारे में क्या सोचता हूं। 
 
3. मेरे विचार में यदि अधिकारी अपने नीचे काम करने वालों को डिटेल में बताएं कि उन्हें कौन-सा काम कैसे करना है और फिर पूरी निगरानी रखें तो ऑफिस का काम अच्छा चलेगा। 
 
4. आजकल माता-पिता काम के बोझ में इतने दबे रहते हैं कि अच्छा हो यदि बच्चों की देखरेख का काम सरकार अपने ऊपर ले ले। इस प्रकार पति-पत्नी अपने जीवन का आनंद ले पाएंगे। 
 
5. कुल मिलाकर मानव एक सुस्त प्राणी है और काम नहीं करना चाहता।  
 
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