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कॉफी विद डी : फिल्म समीक्षा

कॉफी विद डी का सबसे रोचक हिस्सा होना था दाऊद का काल्पनिक इंटरव्यू। इसके लिए लंबा इंतजार कराया गया। इंटरवल होने के बाद 15 मिनट बीत जाते हैं तब जाकर वो इंटरव्यू शुरू होता है जिसके लिए इस फिल्म का निर्माण किया गया है। यह इंटरव्यू इतना कमजोर और घटिया है कि आश्चर्य होता है कि इस पर फिल्म बनाने का निर्णय कैसे ले लिया गया। 
 
इस इंटरव्यू में न हंसी-मजाक है और न कोई गंभीर  बात। लेखक कुछ सोच ही नहीं पाए। केवल आइडिया सोच लिया गया कि दाऊद का काल्पनिक इंटरव्यू दिखाना है और फिल्म बना दी गई। कायदे से तो पूरी फिल्म दाऊद का इंटरव्यू होनी थी, लेकिन इतना मसाला लेखक के पास नहीं था। इसलिए इंटरव्यू के शुरू होने के पहले जिस तरह से फिल्म को खींचा गया है वो दर्शाता है कि फिल्म से जुड़े लोग कितने कच्चे हैं। ऐसा लगा है कि उनकी सोचने-समझने की शक्ति खत्म हो गई हो। इंटरवल तक फिल्म में बैठे रहना मुश्किल हो जाता है और राहत तो तभी मिलती है जब फिल्म खत्म होती है। 
 
अर्णब गोस्वामी से प्रेरित होकर अर्णब नामक किरदार गढ़ा गया है जो एक टीवी चैनल पर काम करता है। लोगों से बातचीत करते समय चीखता चिल्लाता रहता है। अर्णब का बॉस उसके काम से खुश नहीं है। टीआरपी लगातार गिर रही है। दो महीने का समय दिया जाता है। 'डी' का इंटरव्यू लेने का विचार अर्णब को आता है। वह सोशल मीडिया के जरिये डी को उकसाता है, उसके बारे में झूठी बातें प्रचारित करता है। आखिरकार डी उसे कराची इंटरव्यू के लिए बुलाता है। 
 
ये सारा प्रसंग या कहे कि पूरी फिल्म दोयम दर्जे की है। इस फिल्म का निर्माण ही क्यों किया गया है यह समझ से परे है। न इसमें मनोरंजन है और न ही डी के बारे में कुछ नई बात इसमें की गई हैं। बेहूदा प्रसंग डाल कर फिल्म को पूरा किया गया है।  
फिल्म का निर्देशन विशाल मिश्रा ने किया है। कहानी भी उनकी ही है। विशाल को आइडिया तो अच्छा सूझा था, लेकिन उस पर फिल्म बनाने लायक न उनके पास स्क्रिप्ट थी और न ही निर्देशकीय कौशल। ‍विशाल का निर्देशन स्तरहीन है।कई शॉट्स तो उन्होंने कैमरे के सामने कलाकार खड़े कर फिल्मा लिए। 
 
विशाल का काम ऐसा है मानो किसी शख्स ने निर्देशन सीखना शुरू किया हो और उसे फिल्म बनाने को मिल गई हो। कई दृश्यों में उनकी कमजोरी उभर कर सामने आती है। जैसे, अर्णब और उसकी पत्नी बात कर रहे हैं। टीवी भी चालू है। जब पंच लाइन की जरूरत हो तो टीवी की आवाज सुनाई देती थी बाकी समय टीवी गूंगा हो जाता था। 
 
लेखक के रूप में विशाल मिश्रा ने रोमांस और कॉमेडी डाल कर दर्शकों को बहलाने की कोशिश की है, लेकिन ये ट्रेजेडी बन गए हैं। फिल्म का नाम कॉफी विद डी है, लेकिन यह फिल्म में कही सुनाई या दिखाई नहीं देता। कम से कम इस इंटरव्यू को ही 'कॉफी विद डी' का नाम दिया जा सकता था।   
 
अभिनय के मामले में भी फिल्म निराशाजनक है। प्रभावित नहीं कर पाए। कई बार उन्होंने ओवरएक्टिंग की तो कई बार उनके चेहरे पर सीन के अनुरुप भाव नहीं आ पाए। दीपान्निता शर्मा को फिल्म में ग्लैमर बढ़ाने के लिए रखा गया। अंजना सुखानी और राजेश शर्मा का अभिनय ठीक रहा। डी का रोल ज़ाकिर हुसैन ने निभाया और एक खास किस्म का मैनेरिज़्म उन्होंने अपने किरदार को दिया है। पंकज त्रिपाठी निराश करते हैं।  
 
इस डी के साथ कॉफी पीने से सिर दर्द की शिकायत हो सकती है। 
 
बैनर : एपेक्स एंटरटेनमेंट 
निर्माता : विनोद रमानी
निर्देशक : विशाल मिश्रा
संगीत : सुपरबिआ 
कलाकार : सुनील ग्रोवर, अंजना सुखानी, दी‍पान्निता शर्मा, ज़ाकिर हुसैन, पंकज त्रिपाठी 
सेंसर सर्टिफिकेट : ए * 2 घंटे 3 मिनट 
रेटिंग : 1/5 

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