फुकरे रिटर्न्स : फिल्म समीक्षा

फुकरे गैंग की वापसी हुई है। चार वर्ष पहले गुड फॉर ‍नथिंग किस्म के इन युवाओं की कहानी पसंद की गई थी, जिन्हें भोली पंजाबन ने खूब सताया था। चूंचा, हनी, लाली, जफर, पंडितजी, भोली पंजाबन के किरदार फिल्म से ज्यादा लोकप्रिय हो गए थे, शायद इसी बात ने निर्माताओं को 'फुकरे रिटर्न्स' नाम से दूसरा भाग बनाने के लिए प्रेरित किया।

की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां फुकरे खत्म हुई थी। एक वर्ष में हनी ने थोड़ी कमाई कर ली है। गाड़ी में घूमने लगा है। चूंचा सपने तो देख रहा है, लेकिन अब एक और शक्ति उसे मिल गई है। वह जागते हुए भविष्य देख लेता है। लाली अभी भी बाप की डांट खा रहा है। जफर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ सेट होने के मूड में हैं। भोली पंजाबन एक वर्ष से जेल के अंदर है। एक मंत्री से उसकी डील होती है जिसमें एक शर्त यह भी है कि दस दिन में उसे दस करोड़ रुपये देना होंगे। इसके आधार पर वह मंत्री, भोली पंजाबन को जेल से बाहर करवा देता है।

दस करोड़ की रकम जुटाने के लिए भोली पंजाबन को चारों फुकरों की याद आती है जो जेब से कड़के हैं, लेकिन ऊंचे सपने देखते रहते हैं। भोली को उम्मीद है कि कुछ न कुछ जुगाड़ ये लगा ही लेंगे। फुकरे गैंग क्या जुगाड़ लगाती है? क्या भोली दस करोड़ रुपये दे पाती है? इन बातों को फिल्म में दर्शाया गया है।

फिल्म की स्क्रिप्ट विपुल विग ने लिखी है जिसमें सहयोग मृगदीप सिंह लांबा का भी है। फिल्म की कहानी दमदार नहीं है और फनी डायलॉग्स और चुटकुलानुमा दृश्यों से काम चलाया गया है। फिल्म की शुरुआत में ही एक गाना है जो फुकरे की याद ताजा करता है। इसके बाद के कुछ दृश्यों का कहानी से ज्यादा लेना-देना नहीं है, लेकिन ये सीन हैं मजेदार जो मनोरंजन करते हैं।

दिक्कत तब आती है जब फिल्म आगे बढ़ती है। कहानी के अभाव में जोक्स भी हांफने लगते हैं और फिल्म में मनोरंजन का ग्राफ ऊंचा-नीचा होने लगता है। बेहतरीन संवाद और वरुण शर्मा की कॉमेडी के डोज़ लगातार मिलते रहते हैं इससे कहानी की कमजोरी पर से ध्यान हटता रहता है, लेकिन अंत में मजबूत कहानी की कमी अखरती है।

स्क्रिप्ट में कई बातें अस्पष्ट हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में चिड़ियाघर में जो हरकत दिखाई गई है वो अविश्वसनीय है। दिल्ली के चि‍ड़ियाघर में शेर के पिंजरे में घुस जाना और किसी को पता न चलने वाली बात हजम नहीं होती। फिल्म के अंत में दर्शक धमाके की उम्मीद कर रहे थे क्योंकि माहौल ही कुछ ऐसा बनाया गया था, लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं है।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके किरदार हैं। वे लगातार अपनी हरकतों से हंसाते रहते हैं। इतने मजबूत किरदारों को लेकर एक अच्छी स्क्रिप्ट लिखने का मौका गंवा दिया गया है। विपुल विग ने किरदारों की स्ट्रीट स्मार्टनेस तो खूब दिखाई लेकिन इन किरदारों को पिरोने के लिए वे ढंग की कहानी नहीं लिख पाए।

हालांकि फिल्म में ऐसे कई सीन हैं, जैसे- चूंचा का सपना देखना, चूंचा का शेर को कहानी सुनाना, एक गंदे से आदमी का चूंचा की जान बचाने के लिए उसे मुंह से मुंह लगाकर सांस देना, चूंचा का जब सांप कांटने पर बहकी-बहकी बातें करना, चूंचा का लड़की से पहली मुलाकात के दौरान अपनी पीठ खुजवाना, जो हंसाते हैं।

'राजनीति में गुंडों के लिए स्कोप होता है मूर्खों के लिए नहीं' और 'आजकल जात नहीं औकात देखी जाती है' जैसे कुछ बेहतरीन संवाद भी सुनने को मिलते हैं।

निर्देशक के रूप में मृगदीप सिंह लांबा का काम अच्‍छा है। उन्होंने अपने कलाकारों से बेहतरीन अभिनय करवाया है। उन्होंने दृश्यों को अच्छी तरह फिल्माया है और उनका योगदान नजर भी आता है। स्क्रिप्ट के दोष को कुछ हद तक वे छिपाने में भी सफल रहे हैं। क्लाइमैक्स में जरूर उनका नियंत्रण फिल्म से छूट जाता है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी बढ़िया है। गाने कहानी के अनुरूप हैं जो देखते समय ही अच्‍छे लगते हैं। बैकग्राउंड म्युजिक का इस्तेमाल सूझबूझ के साथ किया गया है।

अभिनय के मामले में वरुण शर्मा सब पर भारी पड़े हैं। उनकी टाइमिंग और चेहरे के भाव जोरदार हैं। चूंचा पात्र बेहद लोकप्रिय हुआ है इसलिए उन्हें अच्छा खासा फुटेज भी दिया गया है जिसका इस्मेमाल वरुण ने बखूबी किया है। पुलकित सम्राट, मंजोत सिंह और अली फज़ल ने अपना-अपना काम बखूबी किया है, हालांकि इन्हें वरुण की तुलना में कम अवसर मिले हैं। ऋचा चड्ढा और पंकज त्रिपाठी बेहतरीन कलाकार हैं और इनके लिए पहले से निभाए गए कैरेक्टर्स को आगे ले जाने में कोई परेशानी नहीं हुई।

बहुत ज्यादा उम्मीद लेकर न जाया जाए तो समय काटने के लिए 'फुकरे रिटर्न्स' एक ठीक-ठाक फिल्म है।

निर्माता : फरहान अख्तर, रि‍तेश सिधवानी
निर्देशक : मृगदीप सिंह लाम्बा
कलाकार : रिचा चड्ढा, पुलकित सम्राट, वरुण शर्मा, मंजोत सिंह, अली फज़ल, पंकज त्रिपाठी
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 21 मिनट
रेटिंग : 2.5/5

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