बर्फी : फिल्म समीक्षा

बर्फी
समय ताम्रकर|
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बैनर : ईशाना मूवीज़, यूटीवी मोशन पिक्चर्स
निर्माता : सिद्धार्थ राय कपूर, रॉनी स्क्रूवाला
निर्देशक : अनुराग बसु
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा, इलियाना डीक्रूज, सौरभ शुक्ला, आशीष विद्यार्थी
सेंसर सर्टिफिकेट : यू * 2 घंटे 30 मिनट रेटिंग : 3.5/5

हास्य में करुणा और करुणा में हास्य, यह महान चार्ली चैपलिन के सिनेमा का मूलमंत्र है। इससे प्रेरणा लेकर पूरे विश्व में कई फिल्में बनी हैं। खुद राज कपूर पर चार्ली का गहरा प्रभाव रहा है और उनके सिनेमा में यह झलकता है। ‘बर्फी’ भी चैपलिन सिनेमा से प्रभावित है, खासतौर पर बर्फी/मर्फी का किरदार जो राज कपूर के पोते रणबीर ने निभाया है।
चार्ली चैपलिन की फिल्मों में संवाद नहीं हुआ करते थे। बिना संवाद के गहरी बात चैपलिन बयां कर देते और सभी अपने मतलब निकाल लेते, शायद इसीलिए निर्देशक अनुराग बसु ने भी अपने हीरो को बोलने और सुनने में असमर्थ तथा हीरोइन को मंदबुद्धि बताया है। हीरो-हीरोइन ने पूरी फिल्म में अंगुली पर गिनने लायक शब्द बोलेंगे, लेकिन उनके अंदर क्या चल रहा है इसे अनुराग बसु ने इतने बेहतरीन तरीके से पेश किया है कि सारी बातें बिना कहे समझ आ जाती हैं।
इन दिनों सिल्वर स्क्रीन पर ग्रे और ब्लैक किरदार का बोलबाला है और नि:स्वार्थ भावनाएं और निश्चल प्रेम नजर नहीं आता। बर्फी में ये सब बातें अरसे बाद देखने को मिली हैं और इन्हें देख ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा याद आ जाता है जिसमें भले लोग नजर आते थे।

बर्फी (रणबीर कपूर) और झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) साधारण इंसान भी नहीं हैं क्योंकि उनमें शारीरिक और मानसिक विकलांगता है। श्रुति (इलियाना डीसूजा) में कोई कमी नहीं है। इन तीनों के इर्दगिर्द जो कहानी गढ़ी गई है वो भी साधारण है। दरअसल किरदार पहले सोच लिए गए और फिर कहानी लिखी गई, लेकिन बर्फी को देखने लायक बनाता है अनुराग बसु् का निर्देशन, सभी कलाकारों की एक्टिंग और सशक्त किरदार।
कहानी कहने की अनुराग की अपनी शैली है। उनकी फिल्मों में कहानी अलग-अलग स्तर पर साथ चलती रहती है जिसे वे आपस में लाजवाब तरीके से गूंथ देते हैं। काइट्स और मेट्रो में हम यह देख चुके हैं और बर्फी में भी उन्होंने इसी शैली को अपनाया है। लेकिन जरूरी नहीं है कि यह शैली सभी को पसंद आए।

फिल्म में 1972, 1978 और वर्तमान का समय दिखाया गया है। सभी दौर की कहानी साथ चलती रहती है, जिसे कई लोग सुनाते रहते हैं। इस वजह से यह फिल्म देखते समय दिमाग सिनेमाघर में साथ लाना पड़ता है।
दार्जिलिंग में रहने वाला बर्फी एक ड्राइवर का बेटा है और उसे सम्पन्न परिवार की श्रुति (इलियाना) चाहती है, जिसकी सगाई किसी और से हो चुकी है। श्रुति यह बात अपनी मां (रूपा गांगुली) को बताती है। मां द्वारा अपनी बेटी को समझाने वाला जो दृश्य बेहतरीन है।

श्रुति को उसकी मां ऐसी जगह ले जाती है जहां कुछ लोग लकड़ी काटते रहते हैं। उसमें से एक की ओर इशारा कर मां कहती है कि जवानी में वे उसे चाहती थी, लेकिन यदि उसके साथ शादी करती तो ऐशो-आराम और सुविधा भरी जिंदगी नहीं जी पाती।
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इस तरह के कई शानदार दृश्य फिल्म में हैं, जिसमें क्लाइमेक्स वाले दृश्य का उल्लेख जरूरी है। अनाथालय में झिलमिल को ढूंढते हुए बर्फी आता है, लेकिन वो उसे नहीं मिलती। जब वह श्रुति के साथ वापस जा रहा होता है तब पीछे से झिलमिल उसे आवाज लगाती है, लेकिन सुनने में असमर्थ बर्फी को पता ही नहीं चलता कि उसकी पीठ पीछे क्या हो रहा है।
श्रुति यह बात अच्छे से जानती है कि यदि बर्फी को झिलमिल का पता लग गया तो वह बर्फी को खो देगी। यहां पर श्रुति की प्रेम की परीक्षा है कि वह स्वार्थी बन चुप रहेगी या उसके लिए अपने प्रेमी की खुशी ही असली प्यार है और वह बर्फी को यह बात बता देगी। फिल्म की कहानी से थोड़ी छूट लेकर यह सीन लिखा गया है, लेकिन ये फिल्म का सबसे उम्दा सीन है।
फिल्म के पात्र आधे-अधूरे हैं, लेकिन इससे फिल्म बोझिल नहीं होती। साथ ही उनके प्रति किसी तरह की हमदर्दी या दया उपजाने की कोशिश नहीं की गई है। फिल्म में कई-कई छोटे-छोटे दृश्य हैं, जिनमें हास्य होने के साथ-साथ यह बताने की कोशिश की गई है कि बर्फी को अपनी कमियों के बावजूद किसी किस्म की शिकायत नहीं है और वह जीने का पूरा आनंद लेता है।

झिलमिल का कैरेक्टर स्टोरी में जगह बनाने में काफी समय लेता है और यहां पर फिल्म थोड़ी कमजोर हो जाती है, लेकिन धीरे-धीरे फिल्म में फिर पकड़ आ जाती है। उसके अपहरण वाले किस्सा थोड़ा लंबा हो गया, यदि यहां फिल्म को थोड़ा एडिट कर दिया जाए तो इससे फिल्म में चुस्ती आ जाएगी। इसके अलावा भी कहानी में कुछ कमियां हैं, लेकिन इन्हें इग्नोर किया जा सकता है।
ने बहुत जल्दी एक ऐसे एक्टर के रूप में पहचान बना ली है जिसके लिए रोल सोचे जाने लगे हैं। वे हर तरह के जोखिम उठाने और प्रयोग करने के लिए तैयार हैं। संवाद के बिना अभिनय करना आसान नहीं है, लेकिन रणबीर ने न केवल इस चैलेंज को स्वीकारा बल्कि सफल भी रहे। बर्फी की मासूमियत, मस्ती और बेफिक्री को उन्होंने लाजवाब तरीके से परदे पर पेश किया है। श्रुति के घर अपना रिश्ता ले जाने वाले सीन में उनकी एक्टिंग देखने लायक है।
कमर्शियल और मीनिंगफुल सिनेमा में संतुलन बनाए रखना प्रियंका चोपड़ा अच्छे से जानती हैं। जहां एक ओर वे ‘अग्निपथ’ करती हैं तो दूसरी ओर उनके पास ‘बर्फी’ के लिए भी समय है। ग्लैमर से दूर एक मंदबुद्धि लड़की का रोल निभाकर उन्होंने साहस का परिचय दिया है। कुछ दृश्यों में तो पहचानना मुश्किल हो जाता है कि ये प्रियंका है। प्रियंका की एक्टिंग भी सराहनीय है, लेकिन उनके किरदार को कहानी में ज्यादा महत्व नहीं मिल पाया है। रणबीर और प्रियंका जैसे कलाकारों की उपस्थिति के बावजूद इलियाना डिक्रूज अपना ध्यान खींचने में सफल हैं। उनका रोल कठिन होने के साथ-साथ कई रंग लिए हुए है, और इलियाना ने कोई भी रंग फीका नहीं होने दिया है। में उनका कदम स्वागत योग्य है। एक पुलिस ऑफिसर के रूप में सौरभ शुक्ला टिपिकल बंगाली लगे हैं। उनके साथ सभी कलाकारों ने अपने-अपने रोल बखूबी निभाए हैं।
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रवि वर्मन ने दार्जिलिंग और कोलकाता को खूब फिल्माया है और सभी कलाकारों के चेहरे के भावों को कैमरे की नजर से पकड़ा है। फिल्म के गीत अर्थपूर्ण हैं, लेकिन उनकी धुनें ऐसी नहीं है कि तुरंत पसंद आ जाएं। हो सकता है कि ये धीरे-धीरे लोकप्रिय हों।
यह बर्फी बेहद स्वादिष्ट है और इससे कोई नुकसान भी नहीं है। ‘बर्फी’ देखना यानी अच्छी फिल्मों को बढ़ावा देना है।


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