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जब धर्मेन्द्र ने ईसबगोल खाकर भरा था पेट

बात गरम-धरम के संघर्ष के दिनों की है। हट्टे-कट्टे दिन भर निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर लगाते और रात को कमरे पर आकर सो जाते। यह कमरा वे अपने दोस्त के साथ शेअर करते थे। पैसे बचाने के लिए धर्मेन्द्र बस या ट्रेन में सफर नहीं कर पैदल ही चलते थे। 
एक बार हालत ये हो गई कि धर्मेन्द्र के पास खाने के भी पैसे नहीं बचे। दिन भर मीलों चलने के बाद वे रूम पर पहुंचे और भूख के मारे बुरा हाल हो रहा था। सामने टेबल पर धर्मेन्द्र के दोस्त ने रखा हुआ था। दोस्त बाहर गया हुआ था। धर्मेन्द्र ने भूख मिटाने के लिए ईसबगोल की भूसी ही खा ली। पूरा डिब्बा चट कर गए। 
 
सुबह हालत खराब हो गई। धर्मेन्द्र और उनका दोस्त डॉक्टर के यहां पहुंचे और सारा मामला बताया। तब डॉक्टर ने कहा कि इन्हें भरपूर खाना खिलाओ, यही इनका इलाज है। 
 
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