देश के सबसे बड़े उर्दू नाट्य उत्सव, नागपुर में इस बार होंगे 45 से ज़्यादा नाटक

उर्दू नाटकों के लेखक-निर्देशक इक़बाल नियाज़ी से वरिष्ठ पत्रकार शकील अख़्तर की बातचीत

मुंबई के इक़बाल नियाज़ी पिछले 38 सालों से उर्दू नाटकों के लिए काम कर रहे हैं। किरदार अकादमी उनकी ऐसी संस्था है, जो अब तक 200 से ज़्यादा नाटकों के प्रॉडक्शन कर चुकी है। उनके 6 हज़ार से ज़्यादा शोज़ हुए हैं। नियाज़ी को उनके समर्पित काम के लिए ग़ालिब अवॉर्ड समेत कुल 42 अवॉर्ड मिल चुके हैं। उन्हें उर्दू ही नहीं, मराठी और कई हिन्दी थिएटर से जुड़े मंचों ने भी सम्मानित किया गया है। वे नाटकों को लेकर अब तक 4 किताबें लिख चुके हैं। पर शोध के साथ उनकी कुछ और किताबें प्रकाश्य है। एक बार फिर वे महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी के साथ पांच दिवसीय उर्दू नाट्य महोत्सव की तैयारी में जुटे हैं। नागपुर में यह नाट्य उत्सव 25 से 30 सितंबर के बीच होने जा रहा है। इस उत्सव के बहाने उनके उर्दू नाटकों के लिए किए जा रहे काम पर बातचीत:


सितम्बर के महीने में आप एक बार फिर महाराष्ट्र राज्य उर्दू साहित्य अकादमी के उर्दू नाट्य उत्सव का आयोजन करने वाले हैं, इस बार इस आयोजन की क्या ख़ासियत रहने वाली है?
इस बार नागपुर में 25 से 30 सितंबर तक चलने वाल इस उत्सव में 45 नाटकों का मंचन होगा। यह सभी नाटक एकांकी होंगे। इसमें पूरे महाराष्ट्र के ड्रामा ग्रुप्स भाग लेंगे। सभी नाटक उर्दू में होंगे। भले ही नाट्य समूह मराठी हों, हिन्दी या गुजराती हों लेकिन उनका मंचन उर्दू में होना चाहिए। अच्छी बात ये है कि ग़ैर उर्दूभाषी समूह भी इसमें सआदत हसन मंटो, इस्मत चुग़ताई, कृष्णचन्द्र जैसे लेखकों की कहानियों पर नाटक पेश करते हैं। इस उत्सव का समन्वयन हमारा किरदार नाट्य अकादमी करता है। 5 दिन चलने वाले इस उत्सव में हर दिन 7-8 नाटकों के मंचन होते हैं।

आज उर्दू के साथ बाकी भाषाओं में भी अच्छे नाटकों की कमी महसूस की जा रही है, इसके लिए आप क्या कर रहे हैं?
महाराष्ट्र उर्दू अकादमी ने यह तय किया है कि इन नाटकों का प्रकाशन उर्दू और हिन्दी दोनों में किया जाएगा। हम कोशिश कर रहे हैं कि बीते 5 सालों में हुए सभी नाटकों में श्रेष्ठ 100 नाटकों का एक संकलन प्रकाशित कर सकें। इस पर काम चल रहा है इसलिए हम हर नाटक की वीडियोग्राफी करते हैं।

5 साल पहले किरदार अकादमी यह उत्सव करता था, तब आप इसका वित्तीय प्रबंधन कैसे करते थे?
पहले हम यह उत्सव करते थे, तब हम भोपाल, लखनऊ, दिल्ली या महाराष्ट्र से जहां से भी संस्थाएं नाटक लेकर आती थीं, उनके रहने, भोजन और मंचन का पूरा प्रबंध करते थे। इसके लिए हम स्थानीय संस्थाओं, साहित्य अकादमी और उर्दू साहित्य के प्रति लगाव रखने वाले कुछ शख्सियतों से मदद लेते थे। 4 साल हमने यह काम किया लेकिन पिछले 5 साल से यही काम हम अब उर्दू साहित्य अकादमी के साथ कर रहे हैं। इस भागीदारी का फर्क भी पड़ा है। पहले इस उत्सव में मुश्किल से 10-15 नाटक हो पाते थे लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 45 नाटकों के मंचन तक पहुंच गई है। यह एक बड़ी बात है।

किरदार अकादमी की शुरुआत आपने कब की थी?
38 साल पहले मैंने अपने 3 राइटर दोस्तों के साथ मिलकर यह संस्था बनाई थी। 1980 में कॉलेज के ज़माने में इसकी शुरुआत हुई थी। इसमें मेरे अलावा असलम परवेज़, असलम ख़ान और डॉ. कासिम इमाम इसमें शामिल थे। बाद में असलम खान फिल्मों में, असलम परवेज़ नादिरा बब्बर के नाट्य समूह और डॉ. कासिम प्रोफेसर हो गए। उनका शायरी की तरफ रुख हो गया। उनके संस्था से चले जाने के बाद मैंने 1982 से अकेले ही इस ग्रुप को संभालना शुरू किया। मैंने खुद ही ड्रामा तैयार करने, वर्कशॉप आयोजित करने और नाटकों के मंचन का काम शुरू किया। मेरा पहला नाटक का नाम था- 'कुत्ते'। इकबाल मजीद साहब के लिखे इस पहले ही नाटक को लोगों ने काफी पसंद किया। यह एक पॉलिटिकल सटायर था। इसके हमने 8-10 शोज़ किए।



लेकिन ऐसा कौन सा ड्रामा था जिसने किरदार अकादमी को पूरी तरह से स्थापित कर दिया?
वो नाटक था- 'और कितने जलियांवाला बाग...' असल में ये पहले वन एक्ट प्ले था, लेकिन मैंने इसे फुल लेंथ ड्रामा में बदल दिया। किस्मत से इस नाटक को 1989 में साहित्य कला परिषद, दिल्ली की तरफ से नाट्य लेखन प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला। हिन्दी, पंजाबी, मराठी जैसे करीब 200 नाटकों में से मेरे को चुना गया था। जनवरी 1990 में साहित्य कला परिषद के आमंत्रण पर नाटक का श्रीराम सेंटर में हमने शो किया। नाटक के लेखन के साथ उसका निर्देशन भी मैंने किया था। तब से यह नाटक लगातार खेला जाता रहा। अब तक इस नाटक के 800 शोज़ उर्दू और मराठी में हम कर चुके हैं जबकि उसी नाटक को लोगों ने तमिल, पंजाबी, गुजराती, अंग्रेज़ी में अनूदित कर मंचित किया है। यह एक सोशियो पॉलिटिकल ड्रामा है, जो आज भी प्रासंगिक है।

किरदार अकादमी के मंच से अब तक आप कितने प्रॉडक्शन कर चुके हैं?
किरदार अकादमी के अपने समूह के ज़रिए 200 प्रॉडक्शंस कर चुके हैं। इसमें छोटे और बड़े सभी नाटक और कार्यक्रम शामिल हैं। 200 प्रॉडक्शंस के हम 6 हज़ार से ज़्यादा शोज़ कर चुके हैं। इनमें उर्दू ही नहीं, हमने हिन्दी और मराठी नाटक भी किए हैं। हम अपने शोज़ दिल्ली, लखनऊ, हैदराबाद जैसे शहरों से लेकर सिंगापुर तक कर चुके हैं। मेरे लिखा एक और नाटक है- 'ये किसका लहू है, कौन मरा?' इसके अब तक 80 शोज़ हो चुके हैं। यह नाटक मुंबई बम धमाकों पर आधारित है। इसमें 3 पात्र हैं- एक मुस्लिम, गुजराती और मराठी, जो अपना दर्द बयान करते हैं। नाटक पैगाम देता है कि ब्लास्ट करने वालों का कोई धर्म नहीं होता, ऐसे लोगों की वजह से इंसानियत ही शर्मसार होती है। एक बात और, हमने एक ज़माने में मुंबई के कई इलाकों में जागरूकता अभियान से जुड़े नुक्कड़ नाटक भी किए हैं। हमने 100 से ज़्यादा नुक्कड़ नाटक किए हैं। इनमें ऐसे कई ज्वलंत मुद्दे रहे, जो समाज को जगाने के लिए बहुत ज़रूरी थे।

आप उर्दू नाटकों का ही मंचन करते हैं, इसमें किस तरह की दिक्कतें आती हैं?
हम नाटक उर्दू या हिन्दुस्तानी भाषा में करते हैं, मगर खालिस उर्दू के उच्चारण को लेकर दिक्कतें आती हैं। असल में हमारी अकादमी में हर भाषा और समुदाय के कलाकार काम करते हैं। उनमें से कई उर्दू से बिलकुल भी वास्ता नहीं रखते। हम उन्हें ट्रेंड करते हैं, भाषा के संस्कार देते हैं। आज फिल्म और संगीत के क्षेत्र में काम कर रहे कई एक्टर और सिंगर हैं, बेहतर उर्दू और एक्सप्रेशन के लिए हमें याद करते हैं। मैं खुद निजी तौर पर 200 से ज़्यादा कलाकारों को उर्दू सिखा चुका हूं।

लेकिन जब आप उर्दू ड्रामा फेस्टिवल के लिए किसी से सहायता की बात करते हैं तब क्या होता है?
अक्सर शक की निगाह से देखा जाता है, पूछा जाता है, भाई नाटक में कोई ग़लत कंटेंट या विचार तो नहीं है? तब हम उन्हें समझाते हैं, उर्दू हिन्दुस्तानी समस्याओं से अलग भाषा नहीं है। यह भी भारत की आम समस्याओं और समाज के साथ ज़िंदगी के बारे में बात करती है। जहां तक ग़लत विचार व्यक्त करने की बात है, तो वो किसी भी भाषा में कोई भी कर सकता है। मतलब एक तरह से पूर्वग्रसित मानसिकता काम करती है। इन पूर्वाग्रहों या सोच की कमी की वजह से इस भाषा के भविष्य को लेकर मन उदास भी होता है।

इस मामले में एक किस्सा याद आता है। एक बार दिनेश ठाकुर ने नाटक 'तुगलक' का मंचन किया। कर्नाटक के इस नाटक का बी.वी. कारंत ने उर्दू में तर्जुमा किया था। खालिस उर्दू होते हुए भी इसके पोस्टर पर लिखा गया था- हिन्दुस्तानी ज़ुबान में 'तुगलक'। तब मैंने अंकुर साहब से पूछा कि आपने उर्दू ड्रामा क्यों नहीं लिखा? तब उन्होंने कहा- ऐसा लिखने से कुछ लोग समझेंगे कि इसमें फारसी जैसी कोई सिर पर से जाने वाली बात है, जैसे कि कमाल अमरोही की फिल्म- 'रज़िया सुल्तान' के न चलने की एक वजह फारसी के इस्तेमाल की बात कही गई थी। तो ऐसी बातें भी हैं।

किरदार अकादमी के अपने कितने कलाकार हैं, जो लगातार इसमें काम करते रहते हैं?
हमारे ग्रुप में 50 से ज़्यादा कलाकार हैं। इसमें सभी तरह के कलाकार हैं, बैक स्टेज से लेकर एक्टर तक। सभी को हम हर शो के हिसाब से पेमेंट भी करते हैं। राशि 500 रुपए ही हो लेकिन हर शो के लिए पैसे ज़रूर देते हैं। इसके अलावा उनके लिए कन्वेंस और रिहर्सल में खाना-पीना भी करते हैं। यह बात मैंने अपने गुरु हबीब तनवीर साहब से सीखी थी। उन्होंने मुझे तालीम दी थी कि कलाकार का हक़ कभी मत मारो, उनकी मेहनत का कम सही लेकिन सिला ज़रूर दो। भले आपके पैसे से कलाकार का किचन न चलता हो, लेकिन उसका मान ज़रूर रखा जाना चाहिए।

हबीब तनवीर साहब से आप कैसे जुड़े?
असल में नाटकों के प्रति मेरा लगाव मुंबई में हबीब तनवीर के नाटकों को देखकर ही हुआ। 'चरणदास चोर', 'हिरमा की अमर कहानी', 'आगरा बाज़ार' जैसे मैंने उनके नाटक देखे थे। यह उस वक्त के दौर की बात है, जब पृथ्वी थिएटर नया-नया बना था तथा तब वहां 10 रुपए की टिकट हुआ करती थी। हबीब साहब के नाटकों की लोक नाट्य शैली मुझे बेहद प्रभावित करती थी। उस ज़माने में मुझे किसी ने सलाह दी कि क्यों न मैं हबीब साहब के काम पर रिसर्च करूं। मैंने यह काम शुरू किया। तब तक हबीब साहब भोपाल आ गए थे। मैंने उन पर 5 साल तक काम किया। अब वह काम एक किताब की शक्ल में हम पब्लिश करने जा रहे हैं। वैसे मेरी 4 किताबें छप गई हैं। एक समीक्षाओं और उर्दू नाटकों की किताब भी आ रही है।

देश में उर्दू के लिए कई बड़ी संस्थाएं काम कर रही हैं, लेकिन आपकी संस्था की तरह ही उर्दू नाटकों और साहित्य के लिए सक्रिय रूप से काम करने वाली कितनी संस्थाएं हैं?
हिन्दुस्तान में उर्दू नाटकों और साहित्य के लिए देश में 50 से ज़्यादा सरकारी और ग़ैरसरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। मुंबई, महाराष्ट्र, दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, हैदराबाद में कई संस्थाएं हैं। भोपाल में 'कलाकार ग्रुप' काफी अच्छे नाटक करता रहा है। उसके भारत भवन में शोज़ होते हैं। कोलकाता में अज़हर आलम हैं, जो एक लिटिल थेस्पियन नाम से एक ग्रुप चलाते हैं। दिल्ली में मुहम्मद काज़िम, डॉ. सईद आलम, अनीस आज़मी हैं। ये लोग काफी काम कर रहे हैं। दिल्ली, भोपाल की उर्दू अकादमी का भी अपना ड्रामा फेस्टिवल होता है। कोलकाता में प. बंगाल उर्दू अकादमी है, वो भी ड्रामा फेस्टविल करते हैं।

लेकिन कई ग़ैर उर्दू संस्थाएं भी उर्दू नाटकों और साहित्य के लिए अपना योगदान दे रही हैं?
हां यह बहुत ही अहम और अच्छी बात है। ऐसी बहुत सी हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगाली संस्थाएं हैं, जो उर्दू नाटकों के लिए बहुत ही बढ़िया काम कर रही हैं। उन्होंने उर्दू के कई अच्छे नाटक किए हैं। इसके उलटे उर्दू वालों से आप कहेंगे कि क्या उन्होंने मराठी या दूसरी भाषाओं में काम किया है, तो वो कहेंगे कि हमें दूसरी भाषाएं बोलने में दिक्कत होती है। मिसाल के लिए मुंबई में पूर्वा नरेश नाम की एक थिएटर डायरेक्टर हैं। उनकी संस्था 'आरंभ' ने उर्दू के दो नाटकों के शोज़ किए हैं। एक 'उमराव जान' और दूसरा अमीर खुसरों के जीवन पर। इसी तरह यहां पर गुजराती संस्थाएं है। मराठी की एक संस्था है, जो ग़ालिब पर काम कर रही है।


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