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गोविंदा का आखिरी दांव...अब नहीं तो कभी नहीं...

हीरो से कैरेक्टर रोल करने की बात स्वीकार करना किसी भी हीरो के लिए अत्यंत ही मुश्किल होता है। हीरो के रूप में अपने करियर की संध्या में खड़े अभिनेता के लिए यह बात स्वीकारना मुश्किल हो जाता है कि उसका समय अब गया। हीरो के रूप में उसे ऑफर आने कम हो जाते हैं और कैरेक्टर रोल के ऑफर्स बढ़ जाते हैं। बहुत समय लगता है हीरो की केंचुली उतार फेंकने में। कई कलाकार असमंजस में ही बहुत वक्त लगा देते हैं। गोविंदा भी इसी दुविधा से लगातार जूझ रहे हैं। 
 
एक समय उनके नाम पर फिल्म देखने वालों की भीड़ जमा हो जाती थी। उनका एकमात्र ध्येय था कि उनकी फिल्म दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करे और उन्हें फिल्म देखने के बाद इस बात की तसल्ली हो कि पैसा वसूल हो गया। जनता की नब्ज को उन्होंने पकड़ कर दनादन कई सफल फिल्में दे डालीं। चूक यह हो गई कि बदलते समय को वे भांप कर अपने अंदर वे परिवर्तन नहीं ला पाए। 


 
मल्टीप्लेक्स के उदय के कारण अचानक एक नया दर्शक वर्ग उभरा। उनकी पसंद अलग थी। गोविंदा, सनी देओल, अनिल कपूर, सुनील शेट्टी जैसे अभिनेता को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। अक्षय कुमार, अजय देवगन बदलते समय को भांप गए और बदलते दौर के साथ खुद में बदलाव कर वे लंबी पारी खेल गए। 
 
भरी दोपहर में ही गोविंदा का करियर ठहर गया और उन्हें कुछ सूझा ही नहीं। ऐसी आंधी चली कि उनका सब कुछ उजड़ गया। आसपास खड़ी भीड़ छंट न जाए इसलिए उन्होंने राजनीति का दामन थाम लिया। चुनाव लड़ा और जीत गए। पांच साल फिल्म इंडस्ट्री से दूर हो गए। राजनीति में जाकर समझ में आया कि यहां तो उनसे भी बड़े अभिनेता है। साथ ही ग्लैमर वर्ल्ड का चस्का एक बार लग जाए तो आसानी से नहीं छूटता। राजनीति छोड़ कर फिल्मों में आए, लेकिन मुश्किल और बढ़ गई। उनके साथी निर्देशक भी आउटडेटेट हो गए। पार्टनर, भागमभाग जैसी फिल्मों में सेकंड लीड रोल निभाए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 
 
पत्नी सुनीता ने सलाह दी कि कैरेक्टर रोल करो। किल दिल, हैप्पी एंडिंग जैसी कुछ फिल्में कर डाली जो बुरी तरह फ्लॉप रही। गोविंदा ने इसका अर्थ ये लिया कि कैरेक्टर रोल में उन्हें पसंद नहीं किया जा रहा है, लिहाजा फिर हीरो बन गए। 'आ गया हीरो' नामक फिल्म रच डाली जो रिलीज के लिए तैयार है। कहा ये जा रहा है कि ये गोविंदा की एक पुरानी फिल्म है जो बन कर तैयार थी, लेकिन रिलीज नहीं हो पाई। अब गोविंदा इसे नए सिरे से रिलीज कर रहे हैं। अपने आपको एक और अवसर दे रहे हैं। 
ये गोविंदा का आखिरी दांव है। अब नहीं तो कभी नहीं। फिल्म नहीं चली तो दूसरा अवसर उन्हें शायद ही मिले। फिल्म का ट्रेलर देख लगता है कि फिल्म चलना मुश्किल है। अस्सी के दशक की बी ग्रेड फिल्मों जैसी यह लगती है। 
 
गोविंदा नि:संदेह बेहतरीन अभिनेता हैं। थोड़ा भ्रमित हो गए हैं, वरना उन्हें अभी भी अच्छे अवसर मिल सकते हैं। उन्हें हीरो बनने का इरादा छोड़ना होगा और कुछ अच्छी भूमिकाओं की तलाश करना होगी। वे अभी भी उसी तरह का सिनेमा करना चाहते हैं जैसे अपने शिखर दिनों में किया करते थे। ने उन्हें एक बेहतरीन फिल्म ऑफर की थी जिसे महेश मांजरेकर निर्देशित करने वाले थे। यह कलात्मक फिल्म थी, लेकिन गोविंदा ने यह कह कर इसे ठुकरा दिया कि यह उनकी तरह का सिनेमा नहीं है। 
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