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क्या आईएस के 'जिन्न' के लिए सऊदी जिम्मेदार है?

पुनः संशोधित बुधवार, 23 दिसंबर 2015 (11:07 IST)
क्या खुद को कहने वाले चरमपंथी संगठन के विकास के लिए जिम्मेदार है?
 
यह आम धारणा है कि इस्लाम का कट्टरपंथी रूप वहाबी विचारधारा सऊदी अरब में ही फला फूला और रियासत ने इसे जिस तरह मदद की, उससे चरमपंथ को बढ़ावा मिला। लेकिन सऊदी अरब इन दोनों ही आरोपों को सिरे से खारिज करता है। इसने इस्लामिक स्टेट से लड़ने के लिए चरमपंथ विरोधी फ्रंट बना लिया है।
पांच विशेषज्ञों ने इस पर अपनी राय साझा की है।
प्रोफेसर बर्नार्ड हायकल। ये प्रिंसटन विश्वविद्यालय के ट्रांसरीजनल स्टडी ऑफ द कंटेपरेरी मिडिल ईस्ट, नॉर्थ अमेरिका और एशिया के निदेशक हैं। इनका मानना है कि इस्लामिक स्टेट की धार्मिक विचारधारा सीधे तौर पर वहाबी विचारधारा से जुड़ी हुई है।
 
ये कहते है, 'इस्लामिक स्टेट की धार्मिक विचारधारा सीधे-सीधे ‘जिहादी सलाफ़ी मत’ से निकली है। इसके अनुयायी बिल्कुल कठोर हैं और वे हर उस मुसलमान की निंदा करते हैं, जो उनसे सहमत नहीं है। वे ऐसा कर हिंसा को विचारधारा के माध्यम से उचित ठहराते हैं।'
 
उनके मुताबिक़, मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब सलाफ़ी परंपरा के थे। वे अरब के धार्मिक सुधारक थे और उन्होंने जो आंदोलन खड़ा किया, उससे एक राज्य का निर्माण हुआ।
 
वे कहते हैं, 'उनका मानना था कि मुसलमान इस्लाम के ‘सच्चे’ संदेश से भटक गए हैं, वे ठीक से नमाज तक नहीं पढ़ते, वे जिस तरह प्रार्थना करते हैं, उससे इस्लाम का उल्लंघन ही होता है।'
 
हायकल कहते हैं, 'कई लोगों ने वहाबी के खिलाफ लिखना शुरू किया, उनका मानना था कि वहाबी पर्याप्त पढ़े लिखे नहीं थे। पर अंत में वे 1744 में सऊदी अरब के राज परिवार से किसी तरह जुड़ गए। इसका काफी मजबूत और दूरगामी असर पड़ा।'
 
उन्होंने बीबीसी से कहा, 'वहाबी विचारधारा पर बना पहला सऊदी राज्य उनके विचारों से काफ़ी सहमत था क्योंकि उसने उसके बल पर ही 18वीं और 19वीं सदी में लगभग पूरा अरब जगत जीत लिया।'
वो आगे कहते हैं, 'वे एक शहर को जीतने के बाद वहां इस्लामी शिक्षक तैनात कर देते थे, किताबें छपवाते थे और उसके मुताबिक ही शिक्षा देते थे। अब इस्लामिक स्टेट उसी किताब का इस्तेमाल कर रहा है।'
 
प्रोफेसर मदवी अल रशीद. ये लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के मध्य पूर्व केंद्र में विजिटिंग प्रोफेसर हैं। इनका मानना है कि वहाबी विचारधारा से इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ।
 
वे कहते हैं, 'जब तक वहाबी विचारधारा मानने वाले यह कहते थे कि लोगों को सऊदी राजा के आदेशों का पालन करना चाहिए, अल सऊद परिवार उनसे खुश था।'
 
उन्होंने बताया, '1960 और 1970 के दशक में अरब में क्रांतिकारी विचारधारा तेजी से फैल रही थी। सऊदी परिवार को लगा कि वहाबी विचारधारा उसके खिलाफ एक कारगर औजार है।' 
 
वे आगे कहते हैं, 'सुलतान फहद ने 1980 के दशक में कुरान छापने के लिए एक प्रेस लगवा दिया, यहां छपी किताबें दुनिया के कोने कोने में मुफ्त भेजी जाती थीं। उन्होंने इस्लाम की शिक्षा देने के लिए अल मदीना विश्वविद्यालय की स्थापना करवा दी।'
 
प्रोफेसर मदवी के मुताबिक, 'वहाबी विचारधारा निश्चित तौर पर इस्लाम का असहिष्णु रूप है। यह एक स्थानीय परंपरा है जो समय से पहले ही पूरी दुनिया में फैल गई है। यह एक क्रांतिकारी भाषा है, जो लोगों को इस्लाम के नाम पर अत्याचार करने के लिए प्रेरित करती है।'
 
वे कहते हैं, 'सलाफ़ी मत मुख्य रूप से सऊदी अरब में ही माना जाता है। वहां इस्लाम के दूसरे मतों के प्रति ज्यादा रुझान इसलिए भी नहीं है कि इसके जरिए राजनीतिक हिंसा को आसानी से कुचला जा सकता है। सऊदी अरब के धार्मिक प्रतिष्ठान ने इस्लाम के दूसरे मतों के प्रति कोई खास भेदभाव नहीं किया है।'
 
वे कहते हैं, 'मैंने लोगों से यह कहते सुना है कि मुसलमान इस्लामिक स्टेट की निंदा नहीं करते, चरमपंथ के खिलाफ खड़े नहीं होते। सच तो यह है कि सिर्फ इसी साल सऊदी अरब में 1,850 लोगों को इस्लामिक स्टेट के सदस्य होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया है।'
 
वे आगे कहते हैं, 'सऊदी अधिकारी पैसे उगाही के इस्लामिक स्टेट के तौर तरीकों से चिंतित हैं। उन्होंने दानदाताओं से ट्विटर पर कहा कि वे स्काइप पर संपर्क करें। उनसे प्रीपेड कार्ड खरीद कर उसका नंबर उन्हें देने को कहा ताकि पैसे का भुगतान आसानी से किया जा सके। इसी साल सऊदी अरब ने आईएस विरोधी वित्त समूह की अध्यक्षता अमेरिका और इटली के साथ मिल कर की।'
 
मोहम्मद याहया। ये लंदन स्थित सऊदी अरब दूतावास में राजनीतिक सलाहकार हैं।
इनका कहना है कि इस्लामिक स्टेट को गंभीर खतरा तो सऊदी अरब से ही है।
 
उनके मताबिक, यह आरोप बेबुनियाद है कि आईएस को सऊदी अरब से पैसे मिलते हैं।
वे कहते हैं, 'इस्लामिक स्टेट को वित्तीय मदद न मिले, इसके लिए सऊदी अरब ने कठोरतम उपाय किए हैं। पैसे बाहर भेजने की सख्त निगरानी की जाती है। कुछ लोग इससे बच निकलने में कामयाब हुए हैं, पर वहां कठोरतम व्यवस्था की गई है।'
 
उनके मुताबिक, 'इस्लामिक स्टेट को अपने आप को उचित ठहराने के लिए जिस किसी विचारधारा की जरूरत पड़ेगी, वे अपना लेंगे। यह जरूरी नहीं कि वे वहाबी विचारधारा पर ही निर्भर रहें।'
 
मैथ्यू लेविट। ये वाशिंगटन इंस्टीच्यूट फॉर निअर ईस्ट पॉलिसी में चरमपंथ विरोधी विभाग के निदेशक हैं। इनका मानना है कि इस्लामिक स्टेट वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर है।
 
वे कहते हैं, 'इस्लामिक स्टेट को अपने बजट का निहायत ही छोटा हिस्सा काफी ज्यादा पैसे वाले लोगों से मिलता है। किसी समय में उसे सऊदी अरब से पैसे मिलते थे, पर अब रियाद ने इससे किनारा कर लिया है।'
 
उनके मुताबिक, 'आईएस इराक में अल कायदा के अपने शुरुआती दिनों से ही पैसों के मामले में आत्मनिर्भर रहा है। साल 2006 में अनुमान लगाया गया था कि अल कायदा इराक सालाना 70 मिलियन से 200 मिलियन डॉलर तक का इंतजाम कर लेता है। उससे बरामद कागजात से पता चलता है कि उसके पैसों का आधा से कम हिस्सा ही बाहरी देशों से आता है।'

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