आप जो सेब खाते हैं वह आया कहां से

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पुनः संशोधित सोमवार, 26 नवंबर 2018 (12:24 IST)
- मर्सिडीज़ हटन

ठंडी हवाओं ने तियान शान पर्वत श्रृंखला की बर्फीली चोटियों को अपने आगोश में ले लिया था। अब वह ऊंचे दरख़्तों से फुसफुसा रही थी। ट्रेकिंग क्लब कज़ाखस्तान के गाइड एलेक्सी रास्पोपोल ने डैशबोर्ड पर लगे थर्मामीटर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, "ठंड है।"

हम उसके 4x4 में बैठकर कज़ाखस्तान के दूसरे सबसे बड़े शहर अल्माटी से निकल रहे थे। आगे घनी धुंध छाई थी। टर्गेन गोर्ज में लगभग दो घंटे गाड़ी चलाने के बाद हमने गाड़ी छोड़ दी और पैदल आगे बढ़ते रहे।


चढ़ाई मुश्किल नहीं थी। लेकिन चुभती हवाओं ने मेरी अंगुलियों को सुन्न कर दिया था और मैं ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था। पिछले 30 साल से यहां आने वाले लोगों को गाइड कर रहे रास्पोपोव से मैंने उस जगह के बारे में पूछा जहां हम चल रहे थे।

रास्पोपोव ने सोवियत संघ के विघटन, प्रदूषण और सिकुड़ते ग्लेशियर का ज़िक्र करते हुए कहा, "यह जगह काफ़ी बदल गई है।" किर्गिस्तान तक फैले तियान शान पर्वतों के ट्रांस-इली अलाटाऊ सेक्शन की तलहटी में कभी जंगली मालस सिवेर्सी के पेड़ भरे रहते थे। अब ये विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह बदलते समय का सबूत है।

उजड़ गए जंगल
रूसी वैज्ञानिक निकोलाई वाविलोव ने 1929 में पहली बार मालस सिवेर्सी को रूसी सेब मालस डोमेस्टिका के पुरखे के रूप में पहचाना था। तब यहां के जंगल घने थे और सेब की फसल भरपूर थी। कज़ाख़स्तान की तत्कालीन राजधानी अलमाटी की अपनी यात्रा के बारे में वाविलोव ने लिखा था, "शहर के चारों तरफ़ पहाड़ों की तलहटी में जंगली सेब को देखा जा सकता है।"


"कोई भी अपनी आंखों से देख सकता है कि इस ख़ूबसूरत जगह से खेती किए जाने वाले सेब की उत्पत्ति हुई है।" प्रजातियों की उत्पत्ति के केंद्र के बारे में वाविलोव के अपने विचार थे। वह मानते थे कि जहां सबसे ज्यादा आनुवंशिक विविधता मिले, वही उत्पत्ति का केंद्र है।

सभी घरेलू सेब अल्माटी में उत्पन्न हो सकते हैं, वाविलोव की इस टिप्पणी की पुष्टि आधुनिक जेनेटिक्स ने भी की है। अमेरिका के कृषि विभाग (USDA) में रिसर्च प्लांट फिजियोलॉजिस्ट गेल वॉक कहते हैं, "मालस सिवेर्सी के जंगलों से कभी इसके बीज, पौधे या टहनी निकाले गए थे और कहीं और लगाए गए थे।"


कुछ मामलों में इन पौधों को दूसरे क्षेत्रों में उगने वाले जंगली सेब की प्रजातियों के साथ संकरित कराया गया होगा। माना जाता है कि सिल्क रोड से होने वाले व्यापार ने इस फल को दूर-दूर तक पहुंचा दिया। अंत में यूरोपीय उप-निवेशवादियों ने इसे उत्तर अमेरिका पहुंचाया।

वाविलोव ने वैज्ञानिक रूप से पहली बार सेब का रिश्ता अलमाटी से जोड़ा, लेकिन वह सेब पर इस क्षेत्र के प्रभाव को देखने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे। रास्पोपोव ने किसी बच्चे की मुट्ठी के बराबर हरे रंग का एक सेब मुझे देते हुए बताया, "अल्माटी को अल्मा-अटा कहा जाता था। इसका मतलब है सेब का पिता।"


'सेब का पिता'
वह चटपटा, मीठा और कुरकुरा सेब था। उसे हमारे सामने खड़े किसी पेड़ की डाली से नहीं तोड़ा गया था। सेब का सीज़न होने पर इन पेड़ों में सभी आकार, स्वाद और बनावट के सेब लगते हैं। लेकिन सभी खाने योग्य नहीं होते।

रास्पोपोव ने मेरे हाथ में जो सेब रखा था, उसे सेब के बागान में उगाया गया था। दुखद यह है कि इंसान के यही प्रयास जंगली सेबों के कुदरती ठिकाने को बर्बाद कर चुके हैं। इन विचारों के बावजूद मैंने दूसरा सेब ले लिया। रास्पोपोव कहे जा रहे थे, "कज़ाख के लोगों, अलमाटी के लोगों को सेब पर बहुत गर्व है। यह यहीं से आता है।"


सेब पर यह अभिमान पूरे शहर में दिखता है। बिलबोर्ड पर अलमाटी की टैग लाइन- हज़ार रंगों वाला शहर- के साथ सेब की तस्वीर दिखती है। धूसर सड़कों पर लाल रंग के ये बिलबोर्ड सेब के अलावा किसी और चीज़ का प्रचार नहीं करते।

कज़ाखस्तान के सबसे बड़े कला संग्रहालय कास्तेयेव स्टेट म्यूजियम ऑफ़ आर्ट्स में लगे तेल चित्रों और धातु की मूर्तियों में भी सेब दिखते हैं। इमारतों की दीवारों को बड़े पैमाने पर सेब के चित्रों से सजाया गया है। शहर के प्रमुख आकर्षण केंद्र कोक टोबे माउंटेन पर ग्रेनाइट पत्थर का एक विशाल फव्वारा लगा है, जो सेब की आकृति का है।


मेहमानों को पहाड़ की चोटी पर ले जाने केबल कार तक जाने के रास्ते में मैंने सोवियत काल की एक वोल्गा कार की तस्वीर खींचने के लिए धीरज रखकर इंतज़ार किया। पीले रंग वाली इस कार को प्लास्टिक के सेबों से सजाया गया था। इसके नंबर प्लेट पर लिखा था- "मुझे अल्माटी से प्यार है।"

सेब ही सेब
अलमाटी के ग्रीन बाज़ार में ठंड के बावजूद लोगों की भीड़ है। यहां सेब को रंग, बनावट और आकार के हिसाब से छांटकर सजाया गया है। दुकानदार ने चखने के लिए करीने से काटकर सेब के टुकड़े दिए। उसने रूसी भाषा में अभिवादन किया और मैं 'स्पासिबा' कहकर धन्यवाद दिया।


जिस तरह मालस सिवेर्सी आधुनिक सेब का पूर्वज है, वैसे ही ग्रीन बाज़ार कज़ाख व्यंजनों का ग्राउंड ज़ीरो है। यहां के हर गलियारे में देश के पाक इतिहास के अलग तत्व मिलते हैं। एक कोना घोड़ों के मांस को समर्पित है। कभी घुमक्कड़ रहे कज़ाखस्तान के लोग इस जानवर को पवित्र समझते हैं और इसके मांस को मिठाई जैसा मानते हैं।

यहां कई कोरियाई दुकानें भी हैं। 1910 में चोसुन राजवंश ख़त्म होने के बाद कोरिया के लोग रूस आए थे, जहां से 1937 में स्टालिन ने उनको खदेड़ दिया। तब वे मध्य एशिया में बस गए।

यहां आप जितने तरह के अचार के बारे में सोच सकते हैं, वह सभी उपलब्ध हैं। उनको सौंफ़ के साथ सजाकर रखा गया है। किसी देश के प्रमुख व्यंजनों को बनाने के लिए जो भी चाहिए वह सब यहां है। मध्य एशिया में चावल से बनने वाले व्यंजन पुलाव को सभी देशों ने अपना लिया है।

कज़ाख़स्तान में पुलाव में सेब भी डाला जाता है। भेड़ के मांस, गाजर और प्याज़ के साथ सेब को अतिरिक्त मिठास के लिए डाला जाता है। इस क्षेत्र ने मालस डोमेस्टिका को तो खुशी-खुशी अपना लिया है, लेकिन कज़ाखस्तान का जंगली सेब निश्चित रूप से उपेक्षित हो गया है।


आईसीयूएन (ICUN) रेड लिस्ट में मालस सिवेर्सी को संकट में बताया गया है। इसकी तादाद घट रही है। इस सूची को आखिरी बार 2007 में बनाया गया था। आवासीय और व्यावसायिक विकास, खेती और जंगल कटाई से बचे-खुचे जंगल पर भी ख़तरा है।

इटली के स्लो फूड फाउंडेशन (Slow Food Foundation) ने कल्चर्स ऑफ़ रेजिस्टेंस नेटवर्क (Cultures of Resistance Network) की मदद से ट्रांस-इली अलाटाऊ तलहटी में सेब के पेड़ों को बचाने के कुछ कदम उठाए हैं। यहां के जंगलों में जाने के लिए मेहमानों को परमिट लेना पड़ता है।


कल्चर्स ऑफ़ रेजिस्टेंस नेटवर्क की डायरेक्टर इरा ली कहती हैं, "स्लो फूड ने बार-बार यह दिखाया है कि हम जो खाते हैं उन पर ध्यान देना सिर्फ़ अमीरों का शौक नहीं है।"

"यह एग्रोइकोलॉज़ी के मॉडल को बढ़ावा देने के बारे में है, जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले और सिर्फ़ मुनाफे की फिक्र करने वाली कॉरपोरेट कृषि का विकल्प देते हैं। हमें पहले से कहीं अधिक वैकल्पिक मॉडल की ज़रूरत है।"


बीज की रक्षा
वाविलोव जब पहली बार अल्माटी आए थे तब क्या उन्होंने ऐसी विनाशकारी मानवीय गतिविधियों के बारे में सोचा होगा, इस बारे में अनुमान लगाना असंभव है। फिर भी इस दूरदर्शी वैज्ञानिक ने मालस सिवेर्सी प्रजाति के सेब को बचाने के लिए और भविष्य में अकाल के किसी ख़तरे को दूर करने के लिए बीजों को जमा किया।

उन्होंने लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) में दुनिया के पहले जीन बैंक को 2,50,000 बीज, फल और जड़ों का संग्रह दिया। 1941 से 1944 के बीच लेनिनग्राद की घेराबंदी के दौरान जीन बैंक में काम करने वाले वनस्पति वैज्ञानिकों ने भूख से मरना कबूल किया, लेकिन उन्होंने जमा किए हुए बीज नहीं खाए।


वाविलोव भी भूख से मरे। सत्ता में बैठे लोगों की नाराज़गी के बाद उनको गुलग की क़ैद में रखा गया था। गनीमत है कि उनकी विरासत बची हुई है। उसे वाविलोव इंस्टीट्यूट ऑफ़ प्लांट इंडस्ट्री (VIR) का नाम दिया गया है। यह जीन बैंक रूस में अपनी तरह का इकलौता संस्थान है।

यहां के राई, जौ और जई आनुवांशिकी संसाधन विभाग के प्रमुख इगोर लॉसकुटोव कहते हैं, "हम वाविलोव के सिद्धांतों और तरीकों के मुताबिक संग्रह, मूल्यांकन, रखरखाव और उपयोग करते हैं।"


"हम आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने और क्षरण को रोकने पर काम कर रहे हैं। वीआईआर (VIR) न सिर्फ़ रूस बल्कि पूरी मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण है।"


वॉक इससे सहमत हैं, "मूल पैदाइशी इलाके में मिलने वाली जंगली प्रजातियां हमेशा महत्वपूर्ण होंगी। फिर भी जीन बैंक इन प्रजातियों तक लोगों की पहुंच बढ़ाते हैं और वे अप्रत्याशित परिस्थितियों में आंशिक बैकअप का काम कर सकते हैं।"

अल्माटी के सेब के जंगलों के बारे में हम उम्मीद करते हैं कि ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियां कभी ना आएं। आधुनिक सेब के जन्मस्थान में वाविलोव, उनके साहसी सहकर्मियों और समकालीन लोगों के काम इस शहर की कहानी में एक फुटनोट की तरह हैं।


उनके काम को सेलिब्रेट करने और अचानक लगी भूख को शांत करने के लिए मैं सड़क किनारे लगे एक स्टॉल में दाखिल हो गया। मैंने एक हरे और लाल रंग का चितकबरा सेब खरीदा, जो बहुत ही स्वादिष्ट था।

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