मंदी के दौर में महा रिटर्न जय मंत्र

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कमल शर्मा

सही तरीके और सही मात्रा में शेयर आधारित फंडों का चयन निवेशक के लिए लंबे समय के लक्ष्यों के मामले में अति महत्त्वपूर्ण है।

अब इस तरीके और मात्रा के साथ जुड़े 'सही' के पुछल्ले से निबटने के लिए पेशेवर सलाहकार की शरण में जाना आसान उपाय है, लेकिन अपनी गाढी कमाई की पूँजी को जोखिमभरे में निवेशित करने का इरादा करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातें खुद भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। इससे एक तो आत्मविश्वास बढता है और दूसरे सचेतता आती है जो कि रुपए-पैसे के मामले में सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही जरूरी है।
1- सबसे पहले अपनी जोखिम क्षमता का आकलन करें। यह निवेश के अनुभवों, आपके दृष्टिकोण और भावनात्मक दृढ़ता पर आधारित होता है। जोखिम उठाने की क्षमता और इच्छा दो अलग-अलग चीजें हैं, यह याद रखना बहुत जरूरी है। जोखिम क्षमता के आधार पर ही निवेश की अति सुरक्षित या सामान्य सुरक्षित या आक्रामक रणनीति बनाना चाहिए। अति सुरक्षित नीति जहाँ पूँजी की सुरक्षा को सर्वोच्च सुनिश्चित करती है, वहीं रिटर्न के मामले में कमजोर भी साबित होती है जबकि आक्रामक रणनीति बेहद अच्छे रिटर्न भी दिला सकती है और आपकी कुल पूँजी को डुबो भी सकती है। इस लिहाज से मध्य का मार्ग ज्यादा लोगों को रास आता है, यानी संतुलित जोखिम के साथ संतुलित रिटर्न।
2- बाजार में तेजी के समय कम कीमत वाले शेयरों की कीमत से आकर्षित होकर खरीदारी करना तब खतरनाक साबित होता है, जब मूल्यांकन सटीक न किया गया हो। 'वैल्यू इन्वेस्टिंग' का मंत्र अनेक बार वॉरेन बफेट का नाम ले-लेकर दोहराया जाता है, लेकिन खरीदारी के वक्त इसे भुला देने वाले लोगों की तादाद भी बहुत ज्यादा है, जो बाद में किंकर्त्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में पहुँचते देखे गए हैं। कीमत का आय से अनुपात भी बहुप्रचलित तरीका है। माना कि एक शेयर 1000 और दूसरा 10 रूपए का बिक रहा है, लेकिन पहली कंपनी की प्रति शेयर आय 200 रुपए है तो इसका पी/ई हुआ 5, और अगर दूसरी कंपनी की प्रति शेयर आय 1 रुपया है, तो इसका पी/ई हुआ 10, इसका मतलब यह कि दूसरा वाला शेयर पहले की तुलना में दूना महँगा है।
3- मुक्त नकदी प्रवाह जानना जरूरी है। यह जानना जरूरी है कि कंपनी द्वारा दिखाया जा रहा लाभ कंपनी के पास नकदी के रूप में है और कहीं ऋण खातों में ही समायोजित तो नहीं हो रहा है।

4- हालाँकि कंपनी की अतीत की गतिविधियाँ भविष्य पर असर डालती हैं, लेकिन शेयर का भावी मूल्य कंपनी की भावी योजनाओं, रणनीतियों और बाजार परिस्थितियों पर ज्यादा निर्भर होगा, न कि इस पर कि पहले कंपनी क्या करती रही। इसलिए भावी संभावनाओं को पहचानने की कोशिश ज्यादा से ज्यादा की जानी चाहिए।
5- कुछ भी थोक में न खरीदें। बाजार का भविष्य कोई नहीं जानता और अच्छा और बुरा समय कभी भी सर्वदा के लिए समाप्त नहीं होता, इसलिए अनुशासित निवेश की बात की जाती है, ताकि जोखिम का समयकाल से तालमेल बैठाया जा सके।

6- यद्यपि विविधीकरण आवश्यक है, लेकिन ढेरों योजनाओं में एक साथ निवेश करके अति विविधीकरण के अपने दुष्परिणाम भी देखे गए हैं। ब्लू-चिप बड़ी कंपनियों, मझोली संभावनाशील कंपनियों और छोटी, लेकिन बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों के बीच एक संतुलन के साथ अपने छोटी, मध्यम और लंबी अवधि के निवेश लक्ष्यों के बीच जिसने अपने पोर्टफोलियो को सही तरह से व्यवस्थित कर लिया, वही असली खिलाड़ी साबित होता है।
7- हरसंभव प्रयास करके शेयरों में वही पूँजी लगाई जानी चाहिए, जिसकी आवश्यकता एक लंबे समय तक कम से कम चार-पाँच साल तक न पड़ने वाली हो। लंबी अवधि, बाजार की अनिश्चित अस्थिरता से निबटकर आपके लिए बेहतरीन रिटर्न की फसल तैयार करती है।

8- बेचने का कोई सर्वमान्य मुहूर्त नहीं होता। कभी भी, जब आपको जरूरत हो बेचिए, लेकिन यह ध्यान में रखिए कि समय का जो लक्ष्य आपने निवेश करते समय तय किया था, वह अगर पूरा किया जा सका है, तो निर्णय अधिक सटीक होगा।
इन छोटी-मोटी, सीधी-सादी बातों को ध्यान में रखना न तो पिछड़ापन है, न ही फिजूल की दिमागी कसरत। याद रखिए, भविष्य की ठीक-ठीक पैमाइश कर सकने वाला कोई टूल न बना है, न बनेगा। अनुशासित रहकर सामान्य नियमों का पालन करने से ही आप अपने पोर्टफोलियो को एक कमाऊ और वफादार साथी में तब्दील कर सकते हैं और वर्तमान जैसे बाजार के कितने ही हिचकोलों से निबटकर मुस्करा सकते हैं।

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