बेहतर रिटर्न मिलेगा अस्‍त्र-शस्‍त्र कंपनियों में

WD|
-कमल शर्मा
भारत सरकार ने अब हथियारों की बढ़ती माँग को देखते हुए इस क्षेत्र को भी निजी खिलाड़ियों के लिए खोलने की जो घोषणा की है, वह बेहतर निवेश और रिटर्न चाहने वालों के लिए अच्‍छा मौका है। असल में सफल निवेशक वह है जो आने वाले समय के उन उद्योगों में निवेश करता रहे जहाँ रिटर्न अधिक मिलने की उम्‍मीद हो।
शेयर बाजार में एक खास बात यह देखने को मिलती है की हर नई तेजी के समय पिछली तेजी की कुछ कंपनियाँ छूट जाती हैं और कुछ ऐसी कंपनियाँ अगली तेजी में चमक जाती हैं जिनके बारे में हर निवेशक अनुमान नहीं लगा पाता। यही हालत उद्योगों की होती है। मसलन कुछ अरसे पहले पावर सेक्‍टर की ओर किसी का ध्‍यान नहीं था, लेकिन अब हर निवेशक पावर सेक्‍टर से जुड़ी कंपनियों को अपने पोर्टफोलियो में रखना चाहता है।
शेयर बाजार में अगली तेजी की अब जो लहर चलेगी, उसमें दो उद्योग उभरकर आएँगे। ये हैं शीपयार्ड और हथियार उद्योग। भारत में अब तक हथियार उद्योग पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में रहा है, लेकिन अब इसमें बढ़ती निवेश जरूरत की वजह से निजी क्षेत्र की भागीदारी शुरू हो रही है। समूची दुनिया में हथियार की बढ़ रही दौड़ से हथियार बनाने वाली कंपनियों में किया गया निवेश आने वाले दिनों में बेहद फायदेमंद होगा।
अर्नस्‍ट एंड यंग ने दुनियाभर में हो रहे सैन्‍य खर्च पर जारी अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2040 तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा बाजार होगा, जबकि चीन एशिया में सेना पर खर्च करने वाला प्रमुख देश होगा जबकि इसराइल जो कि भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा भागीदार है, के रूस से आगे निकल जाने की संभावना है। वर्ष 2010 तक भारत और रूस के बीच प्रतिरक्षा कारोबार दस अरब अमेरिकी डॉलर का रहेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया में मिलेट्री हार्डवेयर का आयात करने वाला सबसे बड़ा देश होगा। रिपोर्ट में उम्‍मीद जताई गई है कि भारत रक्षा उत्‍पादन और घरेलू उत्‍पादन क्षमताओं को विकसित करने में आत्‍मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ेगा।

अर्नस्‍ट एंड यंग के साझीदार कुलजीत सिंह का कहना है कि हथियार के मामले में भारत में चीन के बाद बड़ी कारोबारी संभावनाएँ हैं। भारत का रक्षा खर्च वर्ष 2004-05 से वर्ष 2007-08 के बीच प्रतिरक्षा खर्च की सालाना औसत वृद्धि दर आठ फीसदी रही। भारत का वर्ष 2007-08 में प्रतिरक्षा बजट 960 अरब रुपए का था, जिसमें 44 फीसदी हिस्‍सा नए हथियार, प्रणालियाँ और इक्विपमेंट खरीदने के लिए रखा गया।
भारत ने वर्ष 2005-06 में छह अरब डॉलर से अधिक के मिलेट्री हार्डवेयर आयात किए। भारत के बाद दूसरे विकासशील देशों में सबसे ज्‍यादा हथियार खरीदने वालों में सउदी अरब और चीन रहे। इन दोनों देशों ने दो से तीन अरब डॉलर के सौदे किए। रूस भारत को हर साल डेढ़ अरब डॉलर के हथियार बेचता है और इसराइल एक अरब डॉलर के हथियार बेचता है। यानी इसराइरूस से ज्‍यादा पीछे नहीं है।
भारत रक्षा के क्षेत्र में अपनी 70 फीसदी जरूरत के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है और केवल 30 फीसदी जरूरत निजी क्षेत्र के माध्‍यम से पूरी करता है। सरकार का इरादा वर्ष 2010 तक अपनी 70 फीसदी प्रतिरक्षा जरूरतों को घरेल स्रोतों से पूरा करने का है। देश में हथियारों के मामले में निजी क्षेत्र की भागीदारी को तेजी से बढ़ाया जा रहा है।

देश में इस समय निजी क्षेत्र के लिए रक्षा बाजार 70 करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। भारत में रक्षा उद्योग में निजी क्षेत्र की बढ़ाई जा रही भागीदारी के बाद इस बाजार में बढ़ोतरी हो रही है। भारत मिलेट्री हार्डवेयर के निर्यात पर भी ध्‍यान दे रहा है। इनमें रशियन-भारतीय क्रूज मिसाइल्‍स सहित राइफल्‍स, रॉकेट और राडार का निर्यात शामिल है। यह निर्यात पड़ोसी देशों के साथ तीसरी दुनिया के देशों को किया जाएगा। हालाँकि भारत हथियारों का निर्यात अपनी पसंद के देशों को ही करना चाहता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2006 में दुनियाभर का सैन्‍य खर्च 1204 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जो पूर्व वर्ष की तुलना में 3.5 फीसदी अधिक था। इस खर्च में अमेरिका की हिस्‍सेदारी सर्वाधिक थी, जिसने आतंक के खिलाफ युद्ध के नाम पर बड़ी राशि खर्च की।

अमेरिका का यह खर्च इराक और अफगानिस्‍तान के पीछे हुआ है। हमारे देश में महिन्द्रा एंड महिन्द्रा, लार्सन एंड टुब्रो, टाटा सहित अनेक औद्योगिक घराने रक्षा क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। अत: इन कंपनियों में निवेश करना लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न के लिए फायदेमंद होगा।
*यह लेखक की निजी राय है। किसी भी प्रकार की जोखिम की जवाबदारी वेबदुनिया की नहीं होगी।


और भी पढ़ें :