रामनगर की रामलीला का आकर्षण आज भी बरकरार

होता है प्राचीन परंपराओं का पालन

वार्ता|
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की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के में दो सौ साल पुरानी रामलीला में आज भी प्राचीन परंपराओं का पालन होता है। गंगा के दूसरे तट पर बसा समूचा रामनगर इन दिनों राममय है, वहां धर्म एवं आध्यात्म की सरिता बह रही है।

रामलीला प्रेमियों से पूरा क्षेत्र पटा हुआ है। एक महीने तक चलने वाले ऐसे अनूठे सांस्कृतिक अनुष्ठान का आयोजन विश्व में अन्यत्र कहीं शायद ही होता हो। इलेक्ट्रॉनिक एवं आधुनिकता के इस युग में भी इस आयोजन में हजारों दर्शक इस रामलीला के मुरीद है। इसका आकर्षण आज भी बरकरार है।

बढती अपसंस्कृति-भौतिकतावाद एवं पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से ऊब चुके लोगों को यहां आध्यात्मिक शांति मिलती है। पूर्व बनारस रियासत के महाराजाओं और उनकी विरासत संभाल रहे उत्तराधिकारियों ने आज भी रामलीला का प्राचीन स्वरूप बनाए रखा है। तामझाम-ग्लैमर की दुनिया से अछूती इस रामलीला को सम्पूर्ण विश्व पटल पर एक अलग पहचान मिली है।
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रामलीला के दर्शक और रामनगर का स्वरूप एवं माहौल भले ही बदला हो लेकिन रामलीला बिल्कुल नहीं बदली है। पात्रों की सज्जा-वेशभूषा, संवाद-मंच आदि सभी स्थलों पर गैस और तीसी के तेल की रोशनी, पात्रों की मुख्य सज्जा का विशिष्ट रूप, संवाद प्रस्तुति के ढंग और लीला का अनुशासन ज्यों का त्यों बरकरार है।
यहां की रामलीला में आज भी बिजली की रोशनी एवं लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होता और न ही भडकीले वस्त्र तथा आभूषण का प्रयोग होता है।

विधि निषेधों की परम्परा का अक्षरशः पालन शायद इस रामलीला की बडी़ धरोहर है। विशाल मुक्ताकाश, लीला स्थल के पास सजे सजाए हाथी पर लगे पारम्परिक नक्कासी वाले हौदे पर सवार होकर काशी नरेश हर रोज उपस्थित होते हैं एवं यात्रा की संवाद-ध्वनि बखूबी उनके पास पहुंचती है।
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प्राय: हर प्रसंग के लिए पृथक-पृथक लीला स्थल निर्धारित है। लगभग चार किलोमीटर की परिधि में अयोध्या, जनकपुर, लंका, अशोक वाटिका, पंचवटी आदि स्थान है जो रामचरित मानस में वर्णित है। लीलाप्रेमियों का अनुशासन, शांति, समर्पण, लीला के प्रत्येक प्रसंग को देखने तथा नियमित आरती दर्शन की ललक बनाएं रखती है। अल्हड़पन और मौजमस्ती के साथ श्रद्धा-भक्ति एवं समर्पण का ऐसा दुर्लभ वातावरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला का लिखित इतिहास तो नहीं है, लेकिन किंवदंतियों के अनुसार इसकी शुरुआत महाराज उदित नारायण सिंह के शासन काल सन् 1776 में हुई थी। उन्होंने मिर्जापुर जिले के एक व्यापारी की उलाहना पर रामलीला शुरू की थी।

लीला के पांच स्वरूपों राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता समेत प्रमुख पात्र आज भी ब्राह्मण जाति के होते हैं। इनकी उम्र 16 साल से कम होनी चाहिए। चेहरे की सुन्दरता, आवाज की सुस्पष्टता और गले की मधुरता का संगम जिस किशोर में होता है, वही मुख्य मात्र के लिए योग्य माना जाता है। चूंकि यहां लाउडस्पीकर का प्रयोग नहीं होता इसलिए तेज बोलने की क्षमता जांचने के लिए संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण कराया जाता है।
पात्रों के चयन पर अंतिम स्वीकृति परम्परागत ढंग से कुंवर अनंत नारायण सिंह देते हैं। मुख्य पात्र तैयारी के बाद संन्यासी जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। घर-परिवार से मिलने की मनाही होती हैं। यहां प्रशिक्षण का काम दो व्यास कराते हैं।

काशी नरेश जहां सजे-सजाए हाथी पर लीला स्थल के अंतिम छोर से रामलीला देखते हैं, वहीं आज भी भक्त साधु, राम-सीता, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न को पारम्परिक रुप से अपने कंधे पर लेकर चलते हैं। यहां पर भजन-कीर्तन करते तथा नाचते-गाते भक्तों को देखा जा सकता है। इस अनूठी रामलीला को देखने के लिए बडी़ संख्या में विदेशी भी आते हैं जो अपने कैमरों में हर दृश्य को कैद करते हैं।
रामलीला के पात्रों के वस्त्र तो कई प्रकार के होते हैं, लेकिन राजसी वस्त्रों पर तो आंखें नहीं टिकतीं। सोने-चांदी के काम वाले वस्त्र राज परिवार की सुरक्षा में रखे जाते हैं। लीला में प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र भी रामनगर के किले में रखे जाते हैं। राजसी वस्त्रों और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित स्वरूपों के मेकअप में कोई रसायनयुक्त सामग्री का उपयोग नहीं होता।
रामनगर की रामलीला वर्षों से भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है, लेकिन रामलीला के कई स्थलों की दुर्दशा और बढ़ते अतिक्रमण से रामलीला प्रेमी दुखी हैं। लीला स्थलों के आसपास के पेड़ों को काटकर कॉलोनियों का निर्माण हो रहा है।

रामनगर की रामलीला को मिलने वाला सरकारी अनुदान भी बहुत कम है। संस्कृति एवं पर्यटन विभाग भी इसके प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा है। रामलीला में भाग लेने वाले पात्रों का पारिश्रमिक बहुत ही कम है, जिससे किशोरों में पात्र बनने के लिए कम उत्साह दिखाई देता है। (वार्ता)

 

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