जीने का अधिकार, कर्तव्य

pravasi kavita
ND
औरा कुछ नहीं होगा
न भुनभुनाता हुआ कीड़ा
न काँपती हुई पत्ती
न कोई गुर्राता हुआ पशु, बदन चाटता हुआ पशु
न कुछ गर्म न कुछ कुसुमित
न कुछ तुषाराच्छादित। न उज्ज्वल, न सुगन्धित
न मधुमासी फूल से स्पन्दित कोई छाया
न वर्फ़ का फर डाले कोई वृक्ष
न चुम्बन से रंजित कपोल
न कोई सन्तुलित पंख, हवा को चीरता पंख
न कोमल मांसल खण्ड, न संगीत भरी बाँह
न कुछ मूल्यहीन, न विजय योग्य, न विनाश योग्य
न बिखरने वाला, न संगठित होने वाला
अच्छे के लिए, बुरे के लिए
न रात, प्रेम या विश्राम की भुजाओं में सोई हुई
न एक आवाज़ आश्वासन की, न भावाकुल मुख
न कोई निरावृत उरोज, न फैली हुई हथेली
न अतृप्ति न सन्तोष
न कुछ ठोस न पारदर्शी
न भारी न हलका
न नश्वर न शाश्वत
पर मनुष्य होगा
कोई भी मनुष्य
मैं या और कोई
यदि कोई तो फिर कुछ नहीं होगा।

WD|
- पाल इल्यासमकालीन काव्य का महत्ताम व्यक्तित्व। अतियथार्थवादी धारा का नेता
साभार - गर्भनाल


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