रोड रेज गंभीर मनोविकार

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा| पुनः संशोधित मंगलवार, 4 सितम्बर 2007 (16:41 IST)
सड़क पर गाड़ियों की टक्कर होने पैदल यात्रियों के साथ टकरा जाने या ठीक से गाड़ी चलाने की नसीहत देने पर ही वाद-विवाद इतना तेज हो गया कि कुछ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

सुनने मे भले ही यह बात अजीब लगे, लेकिन रोड रेज की यह समस्या यातायात नियंत्रकों के लिए परेशानी बनती जा रही है।

राजधानी दिल्ली में पिछले दो माह में रोड रेज अखबारों की सुर्खी बने रहे। इस रोड रेज ने कुछ लोगों की जान ले ली। यह कोई हिंदी फिल्म का दृश्य नहीं है, बल्कि हकीकत है कि सड़क पर कोई हादसा होने पर इससे जुड़े किसी व्यक्ति को या कुछ लोगों को इतना अधिक गुस्सा आ जाता है कि वह सामने वाले की निर्दयतापूर्वक जान ही ले लेते हैं।
मनोवैज्ञानिकों की मानें तो रोड रेज वास्तव में इंटर मिटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑडर (आईईडी) है और यह एक गंभीर बायोकैमिकल प्राब्लम है। जाने-माने मनोविज्ञानी डॉ. राजेश सागर कहते हैं कि रोड रेज को केवल तीव्र गुस्सा या बदसलूकी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नजरअंदाज करने पर यह समस्या और अधिक खतरनाक हो सकती है।
उन्होंने बताया कि इस मनोविकार का मुख्य कारण मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन होना है। हालाँकि यह असंतुलन कुछ ही देर के लिए होता है, लेकिन इससे व्यक्ति हिंसक हो उठता है। डॉ. राजेश के अनुसार इस मनोविकार का इलाज संभव है, लेकिन इसे लोग समझ नहीं पाते।

उन्हें लगता है कि उनका गुस्सा तेज है। आम तौर पर मनोविकारों का पता नहीं चल पाता इसलिए लोग इसका इलाज भी नहीं कराते हैं। सही बात तो यह है कि मनोविकारों को लोग गंभीरता से नहीं लेते।
मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन की वजह से होने वाला यह विकार इतना भयानक होता है कि व्यक्ति हिंसक हो उठता है। वह आवेश में किसी की जान भी ले सकता है। हर 20 में से एक व्यक्ति आईईडी का शिकार होता है। महिलाओं की तुलना में पुरुष इस मनोविकार के शिकार अधिक होते हैं।

मनोवैज्ञानिक डॉ. समीर पारेख कहते हैं कि इस अनियंत्रित गुस्से को दवाओं और मनोवैज्ञानिक तरीके से रोका जा सकता है। सबसे पहले यह देखना होता है कि गुस्सा क्यों आया। फिर इस पर नियंत्रण सीखना होता है।
उन्होंने कहा कि आज लोगों की व्यस्तता और तनाव इतना अधिक हो गया है कि छोटी सी बात पर गुस्सा आ सकता है। अपनी ही समस्याओं ने हमें संवेदनहीन बना दिया है और हम दूसरों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते। रोड रेज के बढ़ते मामलों का एक कारण यह भी है।

डॉ. पारेख ने कहा कि दिल्ली जैसे महानगरों में आईईडी के मामले अधिक उजागर हो जाते हैं क्योंकि यहाँ की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बार टकराव की नौबत आती है। सामान्य व्यक्ति टकराव को सामान्य तौर पर लेता है, लेकिन आईईडी के शिकार व्यक्ति आपा खोकर हिंसक हो जाते हैं।
डॉ. राजेश के अनुसार ऐसे लोगों को मनोवैज्ञानिकों की मदद लेनी चाहिए। डॉ. राजेश के अनुसार इस मनोविकार का इलाज संभव है, लेकिन इसे लोग समझ नहीं पाते। उन्हें लगता है कि उनका गुस्सा तेज है। आम तौर पर मनोविकारों का पता नहीं चल पाता इसलिए लोग इसका इलाज भी नहीं कराते हैं। सही बात तो यह है कि मनोविकारों को लोग गंभीरता से नहीं लेते।

मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन की वजह से होने वाला यह विकार इतना भयानक होता है कि व्यक्ति हिंसक हो उठता है। वह आवेश में किसी की जान भी ले सकता है। हर 20 में से एक व्यक्ति आईईडी का शिकार होता है। महिलाओं की तुलना में पुरुष इस मनोविकार के शिकार अधिक होते हैं।
मनोवैज्ञानिक डॉ. समीर पारेख कहते हैं कि इस अनियंत्रित गुस्से को दवाओं और मनोवैज्ञानिक तरीके से रोका जा सकता है। सबसे पहले यह देखना होता है कि गुस्सा क्यों आया। फिर इस पर नियंत्रण सीखना होता है।

उन्होंने कहा कि आज लोगों की व्यस्तता और तनाव इतना अधिक हो गया है कि छोटी स‍ी बात पर गुस्सा आ सकता है। अपनी ही समस्याओं ने हमें संवेदनहीन बना दिया है और हम दूसरों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते। रोड रेज के बढ़ते मामलों का एक कारण यह भी है।
डॉ. पारेख ने कहा कि दिल्ली जैसे महानगरों में आईईडी के मामले अधिक उजागर हो जाते हैं क्योंकि यहाँ की भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बार टकराव की नौबत आती है। सामान्य व्यक्ति टकराव को सामान्य तौर पर लेता है, लेकिन आईईडी के शिकार व्यक्ति आपा खोकर हिंसक हो जाते हैं। डॉ. राजेश के अनुसार ऐसे लोगों को मनोवैज्ञानिकों की मदद लेनी चाहिए।


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