'फाँसी नहीं दी गई थी तात्या टोपे को'

नई दिल्ली| भाषा|
भारत में 1857 में हुए के अग्रणी नेता तात्या टोपे के बारे में भले ही इतिहासकार कहते हों कि उन्हें अप्रैल 1859 में फाँसी दी गई थी, लेकिन उनके एक वंशज ने दावा किया है कि वे एक जनवरी 1859 को लड़ते हुए शहीद हुए थे।

तात्या टोपे से जुड़े नए तथ्यों का खुलासा करने वाली किताब ‘तात्या टोपेज ऑपरेशन रेड लोटस’ के लेखक पराग टोपे ने बताया मध्यप्रदेश के शिवपुरी में 18 अप्रैल 1859 को तात्या को फाँसी नहीं दी गई थी, बल्कि गुना जिले में छीपा बड़ौद के पास अंग्रेजों से लोहा लेते हुए एक जनवरी 1859 को तात्या टोपे शहीद हो गए थे।

उन्होंने बताया इस बारे में अंग्रेज मेजर पैजेट की पत्नी लियोपोल्ड पैजेट की किताब 'कैम्प एंड कंटोनमेंट ए जनरल ऑफ लाइफ इन इंडिया इन 1857-1859' के परिशिष्ट में तात्या टोपे के कपड़े और सफेद घोड़े आदि का जिक्र किया गया है और कहा कि हमें रिपोर्ट मिली की तात्या टोपे मारे गए।
उन्होंने दावा किया तात्या टोपे के शहीद होने के बाद देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अप्रैल तक तात्या टोपे बनकर लोहा लेते रहे। पराग ने बताया कि तात्या टोपे उनके पूर्वज थे। उनके परदादा के सगे भाई थे तात्या टोपे।

हालाँकि प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. बिपिन चंद्र ने अपनी किताब ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ में लिखा है, ‘‘तात्या टोपे ने अपनी इकाई के साथ अप्रैल 1859 तक गुरिल्ला लड़ाई जारी रखी, लेकिन एक जमींदार ने उनके साथ धोखा किया और अंग्रेजों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया।’’
जामिया मिलिया विवि में इतिहास के प्रोफेसर रिजवान कैसर ने बताया इतिहास बताता है कि तात्या टोपे को पकड़ लिया गया और मिलिट्री कोर्ट में सुनवाई के बाद 18 अप्रैल 1859 को उन्हें शिवपुरी में फाँसी दे दी गई थी।

पराग ने दावा किया कि मैंने इस किताब में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दो प्रतीक चिन्ह ‘लाल कमल’ और ‘रोटी’ के रहस्य को भी सुलझाने की कोशिश की है।
उन्होंने बताया अंग्रेजी सेना की एक कंपनी में चार पलटन होती थीं। एक पलटन में 25 से 30 भारतीय सिपाही होते थे और पलटन का अधिकारी सूबेदार होता था, जो किसी भारतीय को अंग्रेजी सेना में मिलने वाला सबसे बड़ा पद होता था।

उन्होंने बताया विद्रोह से छह महीने पहले दिसंबर 1856 में सभी पलटन को ‘लाल कमल’ भेजा जाता था और मैदान में पलटन को पंक्तिबद्ध करके सूबेदार कमल की एक पंखुड़ी निकालता था और उसे सैनिक पीछे वालों को देते थे और सभी पंखुड़ियाँ निकालकर पीछे वाले को दे देते थे।
अंत में केवल डंडी बच जाती थी, जिसे वापस लौटा दिया जाता था। उन्होंने बताया डंडी से पता चलता था कि अंग्रेजी सेना की कुल कितनी पलटन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में विद्रोहियों के साथ है और लड़ने वालों की संख्या कितनी है।

पराग ने दूसरे प्रतीक चिन्ह ‘रोटी’ के बारे में बताया कि चार से छह चपातियाँ गाँव के मुखिया या चौकीदार को पहुँचाई जाती थीं। इसके टुकड़ों को पूरे गाँव में बाँटा जाता था, जिसके जरिये संदेश दिया जाता था कि सैनिकों के लिए अन्न की व्यवस्था करना है।
उन्होंने कहा कि यह पहली लड़ाई थी, जिसमें चिर विरोधी मुगल और मराठा एक साथ लड़े इसलिए यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम है। इस संग्राम के लिए तात्या टोपे ने कालपी के कारखाने में अस्त्र शस्त्र तैयार कराए थे और इसमें नाना साहब एवं बाइजाबाई शिंदे की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

उन्होंने बताया कि इस किताब को लिखने का विचार उन्हें आमिर खान की फिल्म ‘मंगल पांडे’ देखने के बाद आया। उन्होंने बताया कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तात्या टोपे को लिखे गए 125 पत्र ‘खत ए शिकस्त’ में संग्रह किए गए हैं। (भाषा)

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