नजमा हेपतुल्ला का राजनीतिक सफर

नई दिल्ली (वार्ता)| वार्ता|
सौम्य, मृदुल एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली डॉ. नजमा हेपतुल्ला भारतीय राजनीति में उन चंद महिला राजनीतिज्ञों में से हैं जिन्होंने योग्यता के बल पर अपना एक मुकाम बनाया है।

13 अप्रैल 1940 को मध्यप्रदेश के भोपाल मे जन्मी डॉ. हेपतुल्ला को राजनीति बिरासत में मिली है। रिश्ते में मौलाना अबुल कलाम आजाद की नातिन हेपतुल्ला ने एमएससी करने के बाद हृदय रोग विज्ञान में पीएचडी प्राप्त की पर राजनीति में दिलचस्पी के कारण वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ी रहीं और जमीनी स्तर पर काम करती रहीं।

मुंबई प्रदेश कांग्रेस कमेटी की महासचिव और उपाध्यक्ष रहीं हेपतुल्ला 1980 से राज्यसभा की सदस्य हैं। वह 1985 से 1986 तथा 1988 से जुलाई 2007 तक राज्यसभा की उपसभापति रहीं इस दौरान उन्होंने सदन की कार्यवाही का कुशल संचालन किया और वह सत्तापक्ष तथा विपक्ष में भी लोकप्रिय बनी रहीं। लेकिन श्रीमती सोनिया गाँधी से उनके रिश्तों में आई खटास के बाद वह भाजपा में शामिल हो गई। इस समय वह राज्यसभा में भाजपा की सांसद है।
तीन बेटियों की माँ और सफल वैवाहिक जीवन बिता रही डॉ. हेपतुल्ला भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की अध्यक्ष भी रहीं। सन 2002 में उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस का उम्मीदवार बनाए जाने की भी चर्चा चली, पर वह उम्मीदवार नहीं बनाई गईं। उसके बाद वह कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट रहने लगी और धीरे-धीरे राजग के निकट आने लगीं।

सन 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा का दामन पकड़ लिया। वे जुलाई 2004 में दोवारा राज्यसभा के लिए भाजपा की टिकट पर चुनी गईं। वे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी बनाई गईं।
राजनीतिक गलियारों में यह कहा जाता रहा है कि अगर डॉ. हेपतुल्ला कांग्रेस में होती तो वे अपनी योग्यता के आधार पर उपराष्ट्रपति पद के लिए स्वाभाविक उम्मीदवार होती। भाजपा में शामिल होने के बाद यह भी माना जाने लगा था कि उपराष्ट्रपति पद के लिए वही पार्टी की स्वाभाविक प्रत्याशी होंगी।

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