राजस्थान का घना अभयारण्य

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सचिन शर्मा

मैं बचपन से ही जंगलों, वन्यजीवों और पक्षियों को देखने का शौकीन रहा हूँ। जब भी मौका मिलता है तब मैं उनके बीच समय गुजारने के लिए चल पड़ता हूँ। यूँ तो इन दिनों आप जिस भी जंगल में जाएँगे वहाँ पक्षियों से रूबरू होने का मौका मिलेगा। लेकिन अगर आपको सिर्फ पक्षी देखने हैं, बहुतायत में देखने हैं, हजारों-लाखों की संख्या में देखने हैं तो इसके लिए राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान से अच्छी जगह कोई नहीं। इस उद्यान को "घना" पक्षी अभयारण्य भी कहते हैं। वैसे मैं अपने पिता के साथ बचपन में एक बार इस अभयारण्य को देख चुका हूँ लेकिन तब की बातें मेरे जेहन में कुछ धुँधली पड़ गई थीं।

मैंने नए सिरे से इस खूबसूरत अभयारण्य को देखने की ठानी। मैं अभयारण्य पर अखबार के लिए एक लेख भी लिखना चाहता था इसलिए मैंने अपने इस टूर के लिए तैयारी की और चल पड़ा। घना आगरा से केवल ५६ किमी दूर है। आगरा से जयपुर पहुँचाने वाली मुख्य सड़क पर ही यह अभयारण स्थित है। दिल्ली-आगरा-जयपुर पर्यटन त्रिकोण में आने के कारण यहाँ देशी-विदेशी सैलानियों का ताँता लगा रहता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश के बाद शुरू होता है और पूरी सर्दियों तक चलता है। वजह यह है कि बारिश में पूरे उद्यान में फैले तालाब और मैदान पानी से भर जाते हैं और वहाँ प्रवासी और अप्रवासी पक्षियों के झुंड जमा हो जाते हैं। ये झुंड आसमान में, पेड़ों पर, यहाँ तक कि वहाँ की सड़कों पर चलते हुए भी नजर आते हैं।
सब जगह सिर्फ पक्षी ही पक्षी दिखते हैं। इस २९ वर्ग किमी क्षेत्र में फैले अभयारण्य में पक्षियों की २३० से भी ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं और इसी विशेषता के कारण १९८५ में इसे यूनेस्को द्वारा प्राकृतिक विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया था।

वापस यात्रा पर आते हैं। जब मैं घना पहुँचने वाला था तो बहुत दूर से ही पक्षियों की चहचहाट सुनाई पड़ने लगी थी। चारों तरफ हरियाली की चादर और पानी में किल्लोल करते हुए विभिन्न प्रजाति के पक्षी। उद्यान के अंदर स्थित नहर में नाव में बैठकर लंबी सवारी भी की जा सकती है। यहाँ कई जलाशय हैं। उन जलाशयों की ओर देखते ही मन प्रसन्नता से भर उठा। घने वृक्ष (जैसा कि नाम है घना), घास के मैदान और भोजन की पर्याप्त व्यवस्था ही पक्षियों को यहाँ खींच लाती है। जिधर नजर जाती हजारों-लाखों पक्षी एक साथ दिखाई पड़ रहे थे।
पेड़ पक्षियों के भार से झुके पड़ रहे थे। हर पेड़ पर अलग तरह के पक्षी। घना मूलतः साइबेरियाई सारस के प्रवास के लिए प्रसिद्ध है, जो हजारों किलोमीटर की यात्रा करके यहाँ सर्दियाँ गुजारने आते हैं। लेकिन पिछले लगभग एक दशक से ये नहीं आ रहे हैं। वैज्ञानिक इसके पीछे कई कारण बता रहे हैं। लेकिन इन सारसों को छोड़कर बारिश के बाद कई प्रकार के पक्षी यहाँ का रुख करते हैं। भारतीय सारस भी यहाँ बहुतायत में मिलते हैं।
घना को घूमने का सबसे अच्छा तरीका तो पैदल घूमना ही है। लेकिन अगर आपके पास समय कम है तो इसे रिक्शा या फिर बैटरी चलित गाड़ी से भी घूमा जा सकता है। मैंने इस उद्यान को दोनों वाहनों से घूमा। पेट्रोल या डीजल चलित वाहनों का यहाँ प्रवेश वर्जित है क्योंकि उनके शोर से पक्षियों को परेशानी हो सकती है।

घना में आपको कई जगह रुककर पक्षियों को देखने का मौका मिलेगा। इसके लिए बस एक शानदार दूरबीन की जरूरत होती है, जो दूर बैठे पक्षियों को भी आपके बिल्कुल पास ला दे। पक्षी हमें अपने ज्यादा पास नहीं आने देते ना, इसलिए। पक्षियों के अलावा भी घना उद्यान में बहुत कुछ है। वहाँ चीतल, सांभर, जंगली सूअर, सियार, लाल मुँह के बंदर आदि पाए जाते हैं। इसके अलावा वहाँ 'पाइथन लैंड' नामक एक जगह भी है।
जहाँ आपको पेड़ों पर झूलते-लटकते अजगर दिख जाएँगे। कुछ साल पहले तो घना में एक बाघिन भी आ गई थी जो वहाँ कई साल रहने के बाद दुनिया को गुडबाई कह गई थी। उसने कभी किसी मनुष्य को परेशान नहीं किया। मैंने घना का चप्पा-चप्पा घूमा है। वहाँ के गाइडों के साथ तो मेरी दोस्ती हो गई थी। उन्होंने मुझे पक्षियों के बारे में कई अनोखी जा‍नकारियाँ दीं। घना के कुओं के शीतल जल का स्वाद आज भी मुझे महसूस होता है। उस दौर के बाद भी मैं घना कई बार गया और उस उद्यान के ऊपर खूब लिखा। यह मेरा वादा है कि एक बार घूमने के बाद घना के अनुभव को आप जिंदगी भर याद रखेंगे।


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