पत्थर की बावड़ी

एक पत्थर की बावड़ी (दक्षिण-पूर्व समूह)

Gopachal
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को एक पत्थर की बावड़ी क्षेत्र (दक्षिण-पूर्व समूह) कहा जाता है। यह स्थान फूलबाग गेट के पास है। सड़क से किले की दीवार तक, जहाँ यह स्थान है, 2 फर्लांग से अधिक चढ़ाई है। चढ़ाई में थकान आ जाती है। मार्ग पक्का है। किले की प्राचीर से बाहरी हिस्से में एक कोने में पत्थर में खुदी हुई प्राकृतिक बावड़ी है, जिसमें प्रति समय शीतल एवं मीठा पानी निरंतर अज्ञात स्रोत से आता रहता है।

यह लगभग 20 फुट लंबी और इतनी ही गहरी है। इस बावड़ी के बाईं-दाईं दिशा में गुफाएँ हैं। बाईं दिशा वाली गुफाएँ पहुँच के बाहर होने से उनके बारे में कुछ ज्ञात नहीं हो सका। दाहिनी दिशा में दुर्ग के बाहर पहाड़ी की चट्टानों में विशाल अवगाइना वाली पद्मासन एवं खड़्‌गासन तीर्थंकर प्रतिमाएँ गुफा के अंदर पहाड़ में बनाई गई हैं। मूर्ति कला की दृष्टि से यह समुन्नत एवं महत्वपूर्ण है। लगभग 2 फर्लांग के बीच में यह क्षेत्रफैला हुआ है। यहाँ की मूर्तियाँ कलापूर्ण, सुघड़ एवं सुंदर हैं। कुशल कारीगरों द्वारा निर्मित की गई हैं। मूर्तियों का सौष्ठव, अंग विन्यास और भाव व्यंजना कलाकारों की मूक निपुणता के साक्षी हैं।

मूर्तियों के अभिषेक के लिए पत्थर काटकर सीढ़ी बनाई गई है। 9 मूर्तियों के आगे ऊँची दीवार उठाकर और मूर्तियों के ऊपर शिखर बनाकर मंदिर का स्वरूप दिया गया है। मूर्ति के पीछे भांडल, सिर के ऊपर चन्दोवा छत में और हाथों में कमल बने हैं। प्रत्येक मूर्ति के दोनों ओर गजलक्ष्मी सूँड में कलश लिए अभिषेक करते दिखाई पड़ते हैं।

गुफा नं. 1- भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासन मूर्ति 9 फुट फण सहित व चौड़ाई साढ़े सात फुट, फण की ऊँचाई सवा दो फुट, फण के आजू-बाजू हाथी हैं।
दशा- चेहरा, हाथ विकृत, खंडित दशा
पाद पीठ पर 5 पंक्ति में प्रतिमा की पूरी चौड़ाई में मूर्ति लेख

प्रथम पंक्ति- सिद्धेभ्यः श्री श्रीमतरंग श्री स्याद्वाद मोघ लाछनम्‌। जीया त्रैलोक्य नाथ शासनम्‌ जिन शासनम्‌ स्वस्ति सम्वत्‌ 1525 वर्षे चैत्र सुदी 15 मूलसंघे सरस्वती गच्छे बलाकार गणे श्री कुन्दकुन्दाचार्यान्वये आम्नाय भट्टारक श्री प्रभाचंद्र देवा ततो पट्टे भट्टारक श्री पद्मनंदी देवा भट्टारक श्रुतचंद देवा।

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द्वितीय पंक्ति- तत्पट्टे भट्टारक श्री जिनचंद्र यतीश्वरा तत्पट्टे भट्टारक श्री सिंहकीर्ति यतीश्वरा तेषाम्‌ उपदेशात्‌ श्री गोपाचल महादुर्गे श्री तोमरान्वये महाराजाधिराज श्री कीर्तिसिंह विजयराजे। ...सिद्ध प्रतिष्ठा श्री इक्ष्वाकु वंशोन्दवा गोलारोड ति मद्ये संघातिपति पम ॥श्री॥

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