खो रहा है बचपन

आकांक्षा यादव

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ये दौलत भी ले लो
ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो का सावन
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी।


किसी गीतकार द्वारा लिखी गई ये पंक्तियाँ बचपन की महत्ता को दर्शाती हैं। बचपन एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ जाति- धर्म- क्षेत्र कोई मायने नहीं रखते। बच्चे ही राष्ट्र की आत्मा हैं और इन्हीं पर अतीत को सहेज कर रखने की जिम्मेदारी भी है। बच्चों में ही राष्ट्र का वर्तमान रूख करवटें लेता है तो इन्हीं में भविष्य के अदृश्य बीज बोकर राष्ट्र को पल्लवित-पुष्पित किया जा सकता है।


दुर्भाग्यवश अपने देश में इन्हीं बच्चों के शोषण की घटनाएँ नित्य-प्रतिदिन की बात हो गई हैं और इसे हम नंगी आँखों से देखते हुए भी झुठलाना चाहते हैं- फिर चाहे वह निठारी कांड हो, स्कूलों में अध्यापकों द्वारा बच्चों को मारना-पीटना हो, बच्चियों का यौन शोषण हो या अनुसूचित जाति व जनजाति से जुड़े बच्चों का स्कूल में जातिगत शोषण हो। हाल ही में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से नई दिल्ली में आयोजित प्रतियोगिता के दौरान कई बच्चों ने बच्चों को पकड़ने वाले दैत्य, बच्चे खाने वाली चुड़ैल और बच्चे चुराने वाली औरत इत्यादि को अपने कार्टून एवं पेंटिंग्स का आधार बनाया।


यह दर्शाता है कि बच्चों के मनोमस्तिष्क पर किस प्रकार उनके साथ हुए दुर्व्यवहार दर्ज हैं, और उन्हें भय में खौफनाक यादों के साथ जीने को मजबूर कर रहे हैं।


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यहाँ सवाल सिर्फ बाहरी व्यक्तियों द्वारा बच्चों के शोषण का नहीं है बल्कि घरेलू रिश्तेदारों द्वारा भी बच्चों का खुलेआम शोषण किया जाता है। हाल ही में केन्द्र सरकार की ओर से बाल शोषण पर कराए गए प्रथम राष्ट्रीय अध्ययन पर गौर करें तो ५३.२२ प्रतिशत बच्चों को एक या उससे ज्यादा बार यौन शोषण का शिकार होना पड़ा, जिनमें ५३ प्रतिशत लड़के और ४७ प्रतिशत लड़कियाँ हैं। २२ प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ गम्भीर किस्म और ५१ प्रतिशत ने दूसरे तरह के यौन शोषण की बात स्वीकारी तो ६ प्रतिशत को जबरदस्ती यौनाचार के लिये मारा-पीटा भी गया।


सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि यौन शोषण करने वालों में ५० प्रतिशत नजदीकी रिश्तेदार या मित्र थे। शारीरिक शोषण के अलावा मानसिक व उपेक्षापूर्ण शोषण के तथ्य भी अध्ययन के दौरान उभरकर आए। हर दूसरे बच्चे ने मानसिक शोषण की बात स्वीकारी, जहाँ ८३ प्रतिशत जिम्मेदार माँ-बाप ही होते हैं। निश्चिततः यह स्थिति भयावह है। एक सभ्य समाज में बच्चों के साथ इस प्रकार की स्थिति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।


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बालश्रम की बात करें तो आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक भारत में फिलहाल लगभग ५ करोड़ बाल श्रमिक हैं। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी भारत में सर्वाधिक बाल श्रमिक होने पर चिन्ता व्यक्त की है। ऐसे बच्चे कहीं बाल-वेश्यावृत्ति में झोंके गये हैं या खतरनाक उद्योगों या सड़क के किनारे किसी ढाबे में जूठे बर्तन धो रहे होते हैं या धार्मिक स्थलों व चौराहों पर भीख माँगते नजर आते हैं अथवा साहब लोगों के घरों में दासता का जीवन जी रहे होते हैं।

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