एक ब्रेक के बाद

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प्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार अलका सरावगी का नया उपन्यास 'एक ब्रेक के बाद' आधुनिक दौर की कथा कहते हुए हमें इंसान के बुनियादी सरोकारों के करीब ले जाता है। इसका कथानक कॉरपोरेट जगत के आसपास बुना गया है, लेकिन यह विभिन्न विषयों-मुद्दों पर एक अलग दृष्टि से चर्चा करता चलता है, जो लेखक की दृष्टि है।

इसी दृष्टि ने निहायत बारीकी से वर्तमान समय की पड़ताल कर उसकी विभिन्न परतें हमारे सामने रख दी हैं। इसीलिए कॉर्पोरेट जगत की इस कथा में कॉरपोरेट कल्चर के साथ वर्तमान में बदलते जा रहे रिश्ते, दौड़भाग, जीवन-दर्शन को भी बड़ी खूबसूरती से पिरोया गया है। अलका सरावगी सशक्त रचनाकार हैं, इसलिए कथा में उन्होंने बड़ी सुघड़ता से वैचारिक सूत्र रचने में सफलता हासिल की है। उदाहरण के तौर पर मैनेजमेंट की सोच को एक महत्वपूर्ण पात्र यूँ प्रस्तुत करता है-
'मेरे पास जब भी आदमी सिर्फ कोई समस्या लेकर आता है, मैं उसे कमरे से बाहर निकल जाने के लिए कहता हूँ। उस समस्या को निपटाने के कम-से-कम दो तरीके या सुझाव मुझे समस्या के साथ-साथ चाहिए। ...यह मेरा काम नहीं है कि मैं समस्या का हल खोजूँ। यह उसका काम है।'

इसी तरह एक चतुर मैनेजर अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को यह बात समझाने की कोशिश करता है-

'बजाय इसके कि हम दुनिया को समझाएँ कि कोई कंपनी सामाजिक दायित्व इसलिए उठा रही है क्योंकि उसका दिल अचानक अपनी बैलेंस-शीट बढ़ाने की जगह देश में गरीबी, गैर-बराबरी और प्रदूषण मिटाने पर आ गया है, बुद्धिमानी की बात यह है कि दुनिया को असलियत बताई जाए। पूरी नहीं, तो कम-से-कम इतनी असलियत कि वह बाकी के झूठ पर भी यकीन कर ले।'

इसी तारतम्य में अलका ने मालिक-नौकर के पेचीदा रिश्तों को भी बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया है, जो पल-प्रतिपल बदलते रहते हैं। बॉस और अधीनस्थ के बारे में भी टिप्पणी पढ़ने काबिल है, जिसके माध्यम से बताया गया है कि अति आज्ञाकारी माना जाने वाला कर्मचारी अपने बॉस के बारे में क्या सोचता है।

कोई व्यक्ति चाहे कुछ हासिल कर ले, अगर उसने अपनी भावनाएँ कहीं बचा रखी हैं, तो वह कभी न कभी दोबारा अपने अंदर छुपे इंसान को तलाश कर ही लेता है। यह इंसान हर समय जूझता रहता है, 'हर आदमी का अपना नरक है जिसमें बहुत सारी उम्मीदें हैं, हजारों शिकायतें हैं और मरी-दबी इच्छाएँ हैं। कोई चाहकर भी किसी का नरक कम नहीं कर सकता।'

अपने पहले उपन्यास 'कलि कथा : वाया बायपास' से बतौर उपन्यासकार अपनी पहचान बना लेने वाली अलका सरावगी की यह कृति भाषा के स्तर पर भी कुछ अलग है। इसकी भाषा कॉर्पोरेट जगत की भाषा है। जगह-जगह होने वाला अँगरेजी शब्दों का इस्तेमाल इसे सत्य के ज्यादा निकट पहुँचाता है।

उपन्यास का अंत भावुक कर देने वाला है। वह संदेश देता है कि इंसान चाहे कुछ कर ले, इंसान जैसा कुछ रखने वाला, उसके भीतर सदा जीवित रहता है। मैनेजमेंट का माहिर गुर्गा, सारी दुनिया घूम आने वाला भट्ट अपने मित्र की मौत पर करुण रुदन करता है
  'मेरे पास जब भी आदमी सिर्फ कोई समस्या लेकर आता है, मैं उसे कमरे से बाहर निकल जाने के लिए कहता हूँ। उस समस्या को निपटाने के कम-से-कम दो तरीके या सुझाव मुझे समस्या के साथ-साथ चाहिए      


ऐसा रुदन जो दिल से बस फूट पड़ता है, किसी अत्यंत आत्मीय के लिए। यहीं उसे 'जगत मिथ्या' भी समझ आता है। उसे लगता है कि वाकई दुनिया भर की सुविधाएँ जुटाने के लिए अपने मन की करते जाने के अलावा भी कोई अन्य संसार है, ऐसा संसार जो इस सबसे विशाल है और अति व्यापक भी।

एक तरह से बंजर विषय पर लिखे गए इस उपन्यास में मानव मन की इन्हीं गुत्थियों की चर्चा विभिन्न माध्यमों के द्वारा चलती रहती है। कोरी कथा के बजाय विचार पढ़ने वालों के लिए यह रचना एक अच्छा तोहफा है।

पुस्तक : एक ब्रेक के बाद
लेखिका : अलका सरावगी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन,
1बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
ND|
जावेद आल
नई दिल्ली-2


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