शमी पूजन

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रघु राजा को भी सीमोल्लंघन करने का प्रसंग आया था। रघु राजा के पास वरतंतु का शिष्य कौत्स आश्रम के लिए गुरुदक्षिणा के रूप में सुवर्ण की चौदह करोड़ मुद्राएँ लेने के लिए आया था। सर्व दक्षिणादान देकर शरद के मेघ की तरह रघु राजा रिक्त बन गया था। रघु राजा को लगा कि एक वेदविद्याव्रत स्नातक गुरुदक्षिणा के लिए आकर रिक्त हाथों मेरे आँगन से वापस लौटे तो मेरी सात पीढ़ियाँ लज्जित होंगी। यह अपयश मैं नहीं लूँगा।

रघु ने कुबेर, जो हमेशा धनसंग्रह कर ही बैठा है, उसको सीमोल्लंघन का 'अल्टिमेटम' दिया। घबराकर कुबेर ने शमी वृक्ष पर सुवर्ण मुद्राओं की वर्षा की। शमी वृक्ष ने वैभव दिया। इससे उसका पूजन होने लगा। पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र शमी के वृक्ष पर छिपा रखे थे, इससे भी माहात्म्य बढ़ा है।

रघु ने शमी वृक्ष पर वर्षा के रूप में पड़ी हुई सुवर्ण मुद्राएँ कौत्स को दी। चौदह करोड़ से ज्यादा मैं नहीं लूँगा। ऐसा कौत्स ने आग्रह रखा और 'तेरे निमित्त ये आई हैं इसलिए शेष मेरे कोष में नहीं रखी जाएँगी' ऐसी आग्रह रघु ने रखा था। वैभव न लेने का आग्रह सिर्फ भारत में ही शायद देखने को मिलेगा। शेष सुवर्ण मुद्राएँ लोगों द्वारा लुटा दी गईं।
सुवर्ण मुद्राओं के प्रतीक के रूप में आज भी के बाद शमी के पत्ते परस्पर एक-दूसरे को देते हैं। जो वैभव मिला है वह मैं अकेला नहीं भोगूँगा, हम साथ में भोगेंगे, हम बाँटकर खाएँगे। कैसा उदात्त भाव है।

दशहरे का दिन यानी समाज में रही हुई दीन, हीन लाचार और भोग की वृत्ति को संहारने के लिए कटिबद्ध होने का दिन। धन और वैभव को बाँटकर भोगने का दिन। बाह्य शत्रु के साथ-साथ अंदर बैठे षड्रिपु पर विजय प्राप्त करने के लिए कृतनिश्चयी बनने का दिन! दशहरा यानी वीरता का वैभव, शौर्य का श्रृंगार और पराक्रम की पूजा! दशहरा यानी भक्ति और शक्ति का पवित्र मिलन।


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