अल्लाह का नूर बरसाने वाली गायकी

ND
बुलंद गहरी मीठी पंजाबी आवाज वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब से मुंबई में सन्‌ 1959-60 में मुलाकात हुई थी। इस संक्षिप्त मुलाकात को आज भी मैं दिल से लगाए बैठा हूँ। खाँ साहब हमेशा इस बात पर जोर देते रहते थे कि रियाज के साथ, तासीर (असर) बेहद जरूरी है।

पाकिस्तानी पंजाब के मशहूर शहर लाहौर के पास स्थित गाँव केसुर में 1902 में जन्मे बड़े गुलाम अली खाँ ने मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति संगीत से ही प्राप्त की थी और यही कारण था कि उनके बोलचाल और हावभाव से यह जाहिर हो जाता था कि यह शख्सियत संगीत के प्रचार-प्रसार के लिए धरती पर अवतरित हुई है।

बात 1964 की है जब आकाशवाणी ने उद्‍घोषकों के लिए दिल्ली में वर्कशॉप का आयोजन किया था। प्रतिदिन नामचीन व्यक्ति हम लोगों का ज्ञानार्जन करने के लिए आते थे। इनमें ठाकुर जयदेवसिंह ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब के बारे में कुछ संस्मरण सुनाए थे।

ठाकुर साहब ने बताया कि जब पहली बार खाँ साहब के पास रिकॉर्डिंग के लिए गए तो उन्होंने मना कर दिया था। काफी मान मनौव्वल के बाद खाँ साहब ने सहमति दे दी पर रिकॉर्डिंग के लिए रात्रि का समय दिया और यह भी कहा कि वे स्टुडियो में रिकॉर्डिंग नहीं करेंगे।

नियत समय पर खाँ साहब आ गए। उनके लिए बरामदे में रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की गई थी और इस बात का विशेष ख्याल रखा गया था कि बाहर की कोई भी आवाज खाँ साहब को परेशान न करे।

खाँ साहब ने राग जयजयवन्ती गाया जिसमें 'झिलमिल झिलमिल तरसे नूरा' यह बंदिश गाई थी। खाँ साहब को गाते देख यूँ लग रहा था मानो अल्लाह का नूर बरस रहा हो। इसके बाद उन्होंने ठुमरी 'नैना मोरे तरस गए' गाई थी।

रिकॉर्डिंग के बाद खाँ साहब का इंटरव्यू भी लिया गया। उन्होंने एक बात काफी खूबसूरत कही थी कि इन्सान के पास सुर तो पहले से मौजूद थे बस उसे देखने वाला कोई नहीं था। जैसे ही उसने सुरों को पहचाना, उसका सुरों से साक्षात्कार करना खुदा के दीदार करने जैसा लगा। खाँ साहब ने 1957 में भारत की नागरिकता हासिल की थी।

मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में फय्याज खाँ साहब ने भी काफी बेहतरीन प्रस्तुतियाँ दीं और उसके बाद बड़े गुलाम अली खाँ साहब ने भी प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के पश्चात फय्याज खाँ साहब ने उनसे कहा कि कार्यक्रम बहुत अच्छा रहा, तुम तो पंजाब के शेर हो। इस पर खाँ साहब बोले कि क्यों पंजाब का ही क्यों, मैं हिन्दुस्तान का शेर नहीं हूँ?

खाँ साहब किंवदंती गायक थे। गायन से ऐसा मोहजाल बुनते कि आपको उसमें उलझना ही है। मुगले आजम फिल्म में गाने के लिए उन्होंने एक गाने के 25 हजार रुपए माँग लिए थे क्योंकि वे फिल्म में गाना नहीं चाहते थे। निर्देशक के. आसिफ ने 25 हजार रुपए देना स्वीकार कर लिया जबकि उस जमाने में लता मंगेशकर और मो. रफी को एक गाने के पाँच सौ रुपए से भी कम मिलते थे।

खैर, खाँ साहब से एक बार इंदौर में भी मुलाकात हुई थी जब वे एक शादी में भाग लेने के लिए छत्रीबाग आए। वर्तमान में खाँ साहब की गायकी को पंडित अजय चक्रवर्ती और पंडित जगदीश प्रसाद आगे बढ़ा रहे हैं।

उनके गाए ख्याल भजन सुदामा मंदर देख डरे, हरि ॐ तत्सत और मीठी ठुमरियाँ प्रेम अगन जिया, का करुँ सजनी, नैना मोरे तरस रहे, याद पिया की आए, बाजूबंद खुल- खुल जाए आज भी ताजा जान पड़ती हैं।

हैदराबाद के नवाब जहीरयारजंग के बशीरबाग महल में चाँदनी और रेशम की शोभा वाली उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज 25 अप्रैल 1968 को सो गई और बीते युग के पटियाला घराने का एक सुरीला एपिसोड समाप्त हो गया।

ND|
- स्वतंत्रकुमार ओझउस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का नाम सामने आते ही एक रौबदार चेहरा और भारी भरकम शरीर का कलाकार याद आ जाता है। स्थूल काया, सुंदर चमकीली आँखें और मूँछें ऐसी कि बदन भी शरमा जाए।
सोचता हूँ कि वर्तमान के युवा जो संगीत को जानते हैं उनके लिए खाँ साहब का संगीत सुनना अपने आप में दिव्य अनुभव है जिसके कारण उन्हें इनसाइक्लोपीडिया में मुर्की, गमक, बोलतान, आस, खटका, ठुमरी और कण आदि के शब्द खोजना तो नहीं पड़ेंगे।

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :