मोदी बने सत्ता के सौदागर

कांग्रेस ने खोया ज्यादा, पाया कम

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वर्ष 2007 राजनीति के क्षेत्र में कई घटनाओं का साक्षी बना। कांग्रेस को उत्तराखंड, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में सत्ता गँवाना पड़ी, जिसका दर्द अब उसे अगले विधानसभा चुनाव तक सालता रहेगा। भाजपा के लिए जरूर यह वर्ष सुकून दे गया, क्योंकि तीन राज्यों में उसने सत्ता का स्वाद चखा, वहीं गुजरात में लगातार चौथी बार उसने सरकार बनाई।

उत्तरप्रदेश में मायावती ने 'सोशल इंजीनियरिंग' के जरिये राज्य को 15 साल बाद स्थिर सरकार दी। गुजरात में लगातार तीसरी बार राजतिलक करवाकर नरेन्द्र मोदी ने साबित कर दिया कि वे वाकई 'सत्ता के सौदागर' हैं।

भगवा ब्रिगेड की धूम : वर्ष 2007 भगवा ध्वजवाहक भारतीय जनता पार्टी के लिए खुशियों भरा रहा। उत्तराखंड में कांग्रेस को हराकर उसने सत्ता में वापसी की। पिछले चुनाव में 36 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस को सिर्फ 21 सीटें ही मिल सकीं। उसे राज्य की सत्ता से हाथ धोना पड़ा। जनरल (सेनि) भुवनचंद्र खंडूरी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।

भाजपा को दूसरी खुशी पंजाब में मिली, जहाँ उसने शिरोमणि अकाली दल के सहयोग से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया। कैप्टन अमरिंदरसिंह को सत्ता से बेदखल कर शिअद नेता प्रकाशसिंह बादल राज्य के मुखिया बने।

वर्षांत भी भाजपा के लिए खुशी का संदेश लेकर आया, जब हिमाचल में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर भगवा फहराया। यहाँ उसने 41 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। दूसरी ओर अपने गढ़ गुजरात में वह पुन: सत्ता पर काबिज हुई। यहाँ तमाम पूर्वानुमानों को झुठलाते हुए उसने विजयश्री का वरण किया। मीडिया की आलोचनाओं और अपनी ही पार्टी के बागियों को दरकिनार करते हुए नरेन्द्र मोदी ने 182 सदस्यीय विधानसभा में 117 सीटें हासिल कर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इसके साथ ही पार्टी में मोदी का कद बढ़ा और वे दूसरी पंक्ति के नेताओं में शीर्ष पर दिखाई देने लगे हैं।

वाजपेयी की विदाई : पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी का राजनीति से संन्यास निश्चित ही भाजपा के लिए बड़ा झटका हो सकता है
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क्योंकि वाजपेयी ही पार्टी एवं सहयोगी दलों में एकमात्र सर्वमान्य नेता हैं। हालाँकि पार्टी ने भावी प्रधानमंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी को आगे किया है, परंतु अपनी कट्‍टर हिन्दुत्ववादी छवि के चलते अटलजी जैसे सर्वमान्य नेता वे शायद ही बन पाएँ।


सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके वाजपेयी के सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन को उनकी ही पंक्तियों 'हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा' में समेटा जा सकता है। जनसंघ के सदस्य से भारत का प्रधानमंत्री बनने तक उन्होंने कभी धैर्य (हार) नहीं खोया और पूरे समय भगवा ध्वज के तले बने रहे अन्यथा लंबे समय तक सत्ता से दूर रहकर वे कई पार्टियाँ बदल चुके होते। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते अन्य दलों के नेताओं से उनके मतभेद भले ही रहे हों पर मनभेद (रार) कभी नहीं रहे।

कांग्रेस भुलाना चाहेगी 2007 : कांग्रेस के लिए गुजरे वर्ष में अनुभव कुछ अच्छे नहीं रहे। उत्तराखंड और पंजाब की सत्ता उसे खोना पड़ी, वहीं उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का उसका ख्वाब इस बार भी 'दूर की कौड़ी' ही साबित हु्आ। पार्टी सुप्रीमो सोनिया गाँधी और 'युवराज' राहुल गाँधी की सभाएँ और रोड-शो भी उसकी ताकत में इजाफा नहीं कर पाए।

गुजरात चुनाव में भी कांग्रेस को मुँह की खानी पड़ी। मोदी के गुजराती भाषणों का मुकाबला सोनिया की टूटी-फूटी हिन्दी के भाषण नहीं कर पाए। उनकी सभाओं में भीड़ तो जुटी पर यह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो सकी। इतना ही नहीं जिन-जिन क्षेत्रों में श्रीमती गाँधी की सभाएँ हुईं, वहाँ कांग्रेस को पूर्व की तुलना में कम सीटें ही हासिल हुईं। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की सभाएँ भी कांग्रेस में जान नहीं फूँक सकीं।

कांग्रेस के लिए इस वर्ष यह संतोष की बात रही कि वह जैसे-तैसे गोवा में अपनी सरकार बना सकी। दूसरी ओर हरियाणा में पार्टी में दरार
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भविष्य के लिए गलत संकेत दे गई। यहाँ पार्टी के दिग्गज नेता भजनलाल ने कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी का गठन ‍कर लिया। हालाँकि फिलहाल राज्य की हुड्‍डा सरकार को कोई खतरा नहीं है।


राहुल का राजतिलक : कांग्रेस की युवा ब्रिगेड के लिए जरूर यह वर्ष खुशी का हो सकता है, क्योंकि पिछली पंक्ति में बैठने वाले राहुल गाँधी अधिकृत तौर पर पार्टी 'युवराज' घोषित कर दिए गए। इससे यह भी संकेत मिलता है कि कांग्रेस के अगले प्रधानमंत्री वे हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में निश्चित ही वे अपने युवा साथियों को ही वरीयता देंगे, जिनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, संदीप दीक्षित, जतिन प्रसाद आदि प्रमुख हैं। साथ ही ये सभी काबिल भी हैं।

मायावती की महिमा : मायावती यूँ तो पहले भी उत्तरप्रदेश की मुख्‍यमंत्री रह चुकी हैं, परंतु इस बार उनकी 'सोशल इंजीनियरिंग' का करिश्मा
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ही रहा कि यह दलित महिला स्पष्ट बहुमत के साथ देश के सबसे बड़े राज्य की सिरमौर बनी। 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार' का नारा देने वाली मायावती ने इस बार करीब 139 उच्च वर्ग के लोगों को बसपा का टिकट दिया। दलित और सवर्ण वोटों ने 'हाथी' के माथे पर 'तिलक' लगाया और मायावती की ताजपोशी के साथ ही गत 15 वर्षों से चली आ रही गठबंधन राजनीति का भी अंत हो गया।


वर्ष 2007 केन्द्र सरकार के ‍‍लिए भी सुखद नहीं रहा। परमाणु करार के चलते प्रधानमंत्री वर्षभर वामपंथी दलों के प्रहार झेलते रहे और करार को अंजाम तक नहीं पहुँचा सके। गुजरात में हार के बाद तो करार के लागू होने की संभावनाएँ क्षीण होती ही नजर आ रही हैं। नंदीग्राम मामले में बंगाल में सत्तारूढ़ वाममोर्चा सरकार सालभर बैकफुट पर रही। उसे चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। राजस्थान और महाराष्ट्र में भी सत्तारूढ़ दलों को बागियों से दो-चार होना पड़ा।

आगामी वर्ष भी राजनीतिक क्षेत्र के लिए काफी उठापटक भरा होगा। खासकर भाजपा के लिए वर्ष 2008 काफी चुनौतीपूर्ण होगा, क्योंकि इस वर्ष मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे। इन राज्यों की सत्ता बचाना उसके ‍लिए आसान नहीं होगा। इन राज्यों में उसके पास मोदी जैसा कोई करिश्माई नेतृत्व जो नहीं है। कांग्रेस भी सत्ता में वापसी के लिए पूरे जोर-शोर से प्रयास करेगी।

जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, कर्नाटक, मणिपुर, त्रिपुरा और नगालैंड में भी इसी वर्ष चुनाव होंगे। सभी प्रमुख दलों का लक्ष्य इन राज्यों की सत्ता हासिल करना होगा। दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में फिलहाल कांग्रेस का शासन है, वहीं कर्नाटक में भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू है।

वृजेन्द्रसिंह झाला|

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